Monday 2 November 2015

#‎इरफान_हबीब‬ विद्वान ‪#‎मध्यकालीन_इतिहासकार ‬ हैं : इन इतिहासकारों का झूठा सच ? आधारहीन संदर्भों का इतिहास /

#‎एखलाक_सिंड्रोम_सीरीज‬ :
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‪#‎इरफान_हबीब‬ एक आलिम फाजिल व्Lविद्वान इतिहासकार हैं जो ‪#‎मध्यकालीन_इतिहास‬ के एक बहुत बड़े हस्ताक्षर हैं।
मध्यकालीन मतलब तुर्को अफगानों और अरबो के भारत में घुसपैठ बनाने का दौर ।
फ़िलहाल इनके खुद के द्वारा संकलित पुस्तक के अंक : एक के ‪#‎प्रौद्योगिक_परिवर्तन_और_समाज‬ , जिसको इन्होंने खुद लिखा है ,उसकी ‪#‎असलियत‬ और लेखक के ‪#‎अकलियत‬ की समीक्षा कल करेंगे ।
लेकिन आज जैसा कि कल मैंने लिखा था कि इनके इसी पुस्तक के प्रथम अद्ध्याय में संदर्भित ‪#‎अलुबरनीज_इंडिया‬ के उस सच का खुलासा करूंगा जो उसने 1030 AD में लिखा था , और जिसको ये आज तक आपसे छूपाये बैठे हैं ।
आपको तय ये करना है कि ये झूंठे हैं या शजीशकर्ता या बहुरूपिये ?
कल मैंने लिखा था -- " एक मजेदार रिफरेन्स इन्होंने ‪#‎अलुबेरनी‬ के ‪#‎इंडिया‬ का दिया हुवा है । पेज नो 12 पर । देखें ।
"600-1200 ई. के मध्य शुद्र मुख्य रूप से किसान थे ।(22) यद्यपि इनके कुछ हिस्से औद्योगिक कलाओं और शिल्पों के साथ साथ अन्य धंधों में भी लगे थे ।यह माना गया है (13) ( किस में ग्रन्थ ने माना था ?) कि शुद्र प्रारंभिक काल में मुख्यतः ‪#‎दास‬ और मजदूर थे , उनका किसानों में रूपांतरण भारत में सामन्तवाद के विलय के द्रिस्टीकोण से एक महत्वपूर्ण घटना थी। वैश्यों और शूद्रों के स्तर तक नीचे ले आने की प्रवृत्ति के चिन्ह आरंभिक काल (कब से शुरू हुवा ये काल ??) में देखे जा सकते हैं , वह इस काल में काफी जोर पकड़ चुकी थी "।(24)
22 और 23 के रिफरेन्स में ‪#‎मुझे‬ ‪#‎रूचि‬ नही है ।
मुझे मात्र रूचि है रिफरेन्स no #24 में ।
24. ई. सी. साको (स. और अ.) अलबरनीज इंडिया (लंदन 1910 ), 101
मेरे पास इस पुस्तक की जो प्रति उपलब्ध है वो है Berlin August 4, 1888 की । अनुवादक का नाम है EDWARD SACHAU .
इरफ़ान हबीब साहब सम्पादित पुस्तक में ऊपर वर्णित रिफरेन्स no 24 ,जो कि शूद्रों और किसानों के बारे में लिखा है , मेरे पास उपलब्ध प्रति में तो लिखा नहीं है।
इतिहास के विद्वान अगर इस रिफरेन्स को ‪#‎अलुबेरनीज_इंडिया‬ में दिखा सकें तो मैं आभारी हूँगा ।"
https://www.facebook.com/tribhuwan.singh.908
अभी तक किसी ने इस पर न तो टिपपड़ी की है न विरोध जताया है , और न ही हबीब साहब को सही या गलत साबित किया है /
अब मैं आपको #अलुबेरनीज_इंडिया के उस लेखन से ‪#‎मुखातिब‬ करवाऊँगा जिसको ये मध्यकालीन इतिहास , लुटेरे तुर्को ,अरबो और मुग़लों के बारे मे भारतीयों के समझ और उनके बारे मे हिंदुओं के विचारों को परिलक्षित करता है /
अलुबेरनी का तात्कालिक समय में विदेशियों (मलेक्षों ) और हिंदुओं के बीच मतभेद के कारणों का वर्णन : 1030 AD :
अलुबेरनी का भारर्त ; एडवर्ड सचौ के अनुवादित पुस्तक से उद्धृत
1030
पेज 17-22
" किसी गंभीर विषय पर बात करने से पहले उसके बारे में पर्याप्‍त जानकारी होना चाहिए और इसके बिना भारतीयों के मूलभूत चरित्र को समझना मुश्किल है। पाठकों को अपने दीमाग में हमेशा ये बात रखनी चाहिए कि हिंदू हमलोगों से हर बात में जुदा हैं। ऐसी कई बातें हैं, जो मुसलमानों को हिंदुओं से अलग करती हैं।
पहला, हिंदू हर उन बातों में हमसे जुदा हैं, जो बाकी देशों में आम बात है। पहले भाषा की बात करते हैं। अन्‍य देशों की तरह यहां की भी भाषा अलग है और इसे समझने के लिए संस्‍कृत सीखना जरूरी है। पर, यह उतना आसान नहीं है। यहां एक ही चीज को कई नामों से संबोधित किया जाता है(पर्यायवाची) । एक ही शब्‍द का प्रयोग कई चीजों के लिए होेता है। किसी भी शब्द का अर्थ आप तब तक नही समझ सकते जब तक आपको पता न हो कि उस शब्द का प्रयोग किन संदर्भों में किया गया है और पूरे वाक्य में उस षंड के आगे और पीछे क्या लिखा हुवा है। हिंदू यद्यपि ढेर सारी भाषाओं की जानकारी के बारे में डींगे मारते हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि ये इनकी खामी है।
दूसरा , धर्म। धर्म के मामले में हिंदू हमसे एकदम अलग हैं। इनके विश्‍वास भी हमसे जुदा हैं और किसी भी ऐसी बात में विस्वास नहीं करते जिनमे हमे विस्वास है। धार्मिक मान्‍यताओं में बहुत ही मतभेद है। हिंदू शास्‍त्रार्थ करने में विश्‍वास करते हैं। इतना होने के बावजूद कभी भ्‍ाी धार्मिक विवादों में आत्‍मा, शरीर और संपत्ति दाव पर नहीं लगाते। न ही धर्म के नाम पर लूटमार ही करते हैं।इनका fanatism सिर्फ विदेशियों के खिलाफ है ।
वे लोग जिनकी मान्‍यताएं इनके खिलाफ हैं, खास कर विदेशी को ये "मलेच्‍छ" यानी अशुद्ध कहते हैं। इनके साथ ये कोई संबंध रखना पसंद नहीं करते हैं। न ही वैवाहिक संबंध, न खान पान या उठना-बैठना। हिंदुओं का मानना है कि ऐसा करते हुए वे भी अपवित्र या दूषित हो जाएंगे।
इतना ही नहीं, किसी भी विदेशी के छुए पानी और आग को ये अशुद्ध मानते हैं। जबकि, इन दो चीजों के बिना कोई घर नहीं रह सकता है। इसके अतिरिक्‍त वे अशुद्ध हुई चीजों को ग्रहण नहीं करते। यदि कोई व्‍यक्ति या वस्‍तु अशुद्ध हो गई है तो आपात परिस्थितियों में उसका शुद्धीकरण विशेष ढंग से किया जाता है।
हिंदू किसी ऐसे व्‍यक्ति का स्‍वागत नहीं करते जो उनके बीच का नहीं हो। भले ही वो इनके धर्म की तरफ झुकाव ही क्‍यों न रखता हो। इस कारण से भी इनसे संबंध स्‍थापित करना दुरूह कार्य है। इसी वजह से हमारे और उनके बीच बड़ी खाई है।
तीसरा, स्थान। रहन सहन और तौर तरीके लिहाज से भी वे (हिन्दू) हमसे जुदा हैं। वे अपने बच्चों को हमारे ड्रेस और तौर तरीके से इस तरह डराते हैं, जैसे हम शैतान के औलादें हैं और हमारा रहन सहन उनकी अच्छाइयों और सभ्यता के एकदम विपरीत है। पर, ये बात हमें स्वीकार करनी चाहिए कि विदेशियों के प्रति अवमानना का यह भाव हर देश में देखा जा सकता है। मुझे याद है क़ि एक हिंदू ने कैसे हमसे बदल उतारा था।
हमारे देश से गए एक दुश्मन के हाथों एक हिन्दू राजा मारा गया। उसकी मृत्यु के बाद उसको पुत्र हुआ, जिसने बड़ा होकर राजगद्दी संभाली। उसका नाम सागर था। उस नवयुवक ने अपनी मां से अपने पिता के बारे में पूछा और सच जानने पर घृणा (और क्रोध ) से व्याकुल होकर दुश्मन राज्य में घुस गया और अपने बदले कि आग को ठंडा किया। हत्या करते करते जब वो थक गया तो उसने बाकी बचे हुए लोगों को जबरन हम लोगों की ड्रेस (वेश भूसा) पहनने को विवश किया, जिसका अर्थ ही था अपमानजनक दंड। जब मैंने ये सुना तो मैं उसका बड़ा आभारी हुआ कि वो इतना विशाल हृदय था कि उसने हम लोगों को भारतीय तौर तरीके अपनाने और भारतीय ड्रेस पहनने के लिए बाध्य नहीं किया।
चौथा, एक अन्य परिस्थिति ने भी हिन्दुओं और विदेशियों के बीच आपसे घृणा और विरोध को बढ़ावा दिया , वो था बुद्धिस्ट (सामनिया ) जो ब्राम्हणों को पसंद तो नहीं करते थे लेकिन उनके बहुत करीबी थे। प्राचीन काल में बौद्ध खुरासन पारसी (ईरान), इराक मोसुल और सीरिया के सीमान्त तक फैले हुए थे, लेकिन जब अजरबैजान से जरथ्रुस्ट वहां गया और बल्ख (BALKH में magism का उपदेश दिया तो वहां का राजा गुस्तस्य और उसके बेटे ISFENDIYAD को यह सिद्धांत पसंद आया। उसने इस धर्म का प्रसार ताकत और समझौता दोनों से पूरब और पशिम में किया और पूरे संरंजय में अग्नि के मंदिर चीन के सीमान्त से ग्रीक तक बन गये। उनके उत्तराधिकारी राजाओं ने जोरास्ट्रियन को स्टेट रिलिजन (ऑब्लिगेटरी ) घोषित किया। इस तरह पारसियों (फारस) और इराक के समस्त बौद्ध गायब हो गए और बाकि बौद्ध BALKH के पूर्व कि ओर माइग्रेट कर गए। अभी भी कुछ MAGIAN भारत में रहते हैं जिनको MAGA कहा जाता है। तभी से इन लोगों (हिन्दुओं ) के अंदर KHURASAN के प्रति घृणा भर गयी। लेकिन जब इस्लाम आया तो सारे पारसी बुरी तरह क़त्ल कर दिए गए (PERISHED )। मुस्लिम जब भारत में घुसने का प्रयास करने लगे तो हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति घृणा (Repugnance ) और बढ़ गई। उदाहरणस्वरूप मुहम्मद इब्न elkasim इब्न एल्मुनाब्बिह ( कासिम) सिंध कि ओर से घुसा और BAHMANWA और MULASTHANA (भमानवा और मूलस्थान ) नामक दो शहरों पर कब्ज़ा कर लिया और उनका नाम बदलकर अलमंसुरा और अलममुरा रख दिया फिर वो गांधार में घुसते हुए कश्मीर होते हुए कन्नौज तक गया ,कहीं तलवार के दम से कहीं समझौता करके उसने अपना निहितार्थ प्राप्त किया। इन घटनाओं ने उनके (हिन्दुओं के) दिल में गहरी नफरत भर दी।
तुर्कों से पहले कोई भी मुस्लमान काबुल और सिंधू नदी के आगे नहीं जा सका था। लेकिन, जब उनकी सामान्य डायनेस्टी ने गझवा पर कब्ज़ा किया तो सारी ताकत नासिर अब्दुल्ला सबुक्त्गिन के हाथ में आ गयी। इस राजकुमार ने अपना नाम अलग़ज़वा घोषित किया (अल-गज़ा का अर्थ है --- ) और अपना उद्देश्य हौली वॉर यानी जिहाद बनाया। अपने उत्तराधिकारियों के हितों को साधने हेतु भारतीय सीमान्त को कमजोर करने के लिए उसने सड़कें बनवायीं, जिन पर चलकर उसका बेटा यामीन अब्दुल्ला महमूद ने अगले तीस सालों के भीतर ही भारत पर आक्रमण किया। महमूद ने उस देश के वैभव (प्रोस्पेरिटी ) को नष्ट कर दिया और इतना भीषण अत्याचार (वंडरफुल एक्सप्लॉइट ) किया कि हिन्दू धूलधूसरित होकर बिखर गए। लेकिन ये बात उनके मस्तिस्क में सदा के लिए बैठ गयी, और यह कारण भी हिन्दू के अंदर सभी मुसलानों के प्रति घृणा का कारण बना। इस कारण से भी कि जिन इलाकों पर हमने कब्जा किया वहां से साइंस का नामोनिशान मिट गया (साइंस रिटायर्ड ) और वे लोग (साइंस के जानने वाले ) लोग उन स्थानों पर पलायित कर गए जहाँ हमारे हाथ अभी भी नहीं पहुंचे हैं। जैसे कि कश्मीर, बनारस या अन्य कोई जगह। उनके (हिन्दुओं ) और विदेशियों के बीच आपसी विरोध की खाद पानी राजनीती और धर्म से ही मिलती है।
पांचवां, कुछ अन्य कारण , जिनका वर्णन एक सतीरे जैसा लगता है -- उनका राष्टीय चरित्र उनके अंदर गहरे तक बैठा है और हर व्यक्ति में दिखाई देता है। हम सिर्फ ये कह सकते हैं कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। ------हिन्दू इस बात में यकीन रखते हैं कि उनके देश के जैसा न कोई देश है, न उनके राजाओं के जैसे कोई राजा है, और न ही उनके धर्म के जैसा कोई धर्म है, न विज्ञान के जैसा कहीं का विज्ञान। उनका ये मत है कि पूरी धरती पर उनके देश के जैसा कोई देश नहीं है और न ही उनके जैसे मनुस्य कहीं पाये जाते हैं। उनके जैसा ज्ञान और विज्ञान कि रचना अभी तक किसी अन्‍य नस्‍ल का मनुष्‍य नहीं कर पाया है।
उनका गर्व इतना उद्दीप्त है कि यदि तुम बताओ कि विज्ञान और विद्वान खुरासान या फारस में भी पाये जाते हैं तो वो सोचेंगे कि तुम धूर्त और झूठे दोनों हो। अगर ये दूसरे देशों में घूमें और लोगों से मिलें जुलें तो इनका विचार बदलेगा, क्योंकि इनके पूर्वज इनकी तरह संकीर्ण नहीं थे। उनके एक पूर्वज बरहमिहिर ने एक लेख में लिखा है जिसमे वो ब्राम्हणो (विद्वानों) का सम्मान करने कि बात कहते हैं ; "ग्रीक, यद्यपि अशुद्ध(impure ) हैं ,लेकिन उनका सम्मान करना चाहिए क्योंकि उनको विज्ञान की ट्रेनिंग मिली है, जिसमे वे दूसरों से आगे हैं , ( अगर इतना सम्मान उनका करना चाहिए जिन्हे विज्ञान की ट्रेनिंग मिली है ) तो उन ब्राम्हणों के बारे में क्या कहा जय जिनमें शुद्धता (purity ) और विज्ञान की ऊंचाई दोनों हैं।"

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