Sunday, 20 September 2020

Be Positive: How and How: Patanjali guides you

#उत्तिष्ठत_जाग्रत:

उत्तिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरानिबोधत्। 
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति।।
-कठोपनिषद 

यह स्वामी विवेकानंद का अत्यंत प्रिय मंत्र था। बहुत से लोग समझते हैं कि उनके द्वारा रचित मंत्र है। लेकिन ऐसा नहीं है। यह कठोपनिषद से उद्धरित है। 

उत्तिष्ठत जाग्रत : उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य क्या सोया हुवा है? जो उसे कह रहे हैं कि उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य तो प्रतिदिन 6 से 8 घण्टे सोता है। उसके अतिरिक्त समय में जगा हुवा है। उठा हुवा है। कुछ न कुछ कर रहा है। तो फिर ऐसा क्यों कहा ? 

वस्तुतः जैसा हमारा जीवन है, उसमें हम सोए सोये ही जीते हैं। रात में भी सोते सोते सपने देखते हैं। दिन में भी सपने देखते हैं - दिवास्वप्न। मुंगेरीलाल के हसीन सपने। हसीन सपने सिर्फ मुंगेरीलाल ही नहीं देखता। हम समस्त लोग मुंगेरीलाल की तरह ही सपने देखते हैं। लेकिन इसका हमें बोध ही नहीं है कि हम सदैव सपने देखते रहते हैं। सोते सोते और जागते। इसका बोध तब होगा यदि अपने मन को देख सकोगे तब। एक इच्छा मन में उभरी। उसके उपरांत उसको पूरा करने की योजनाएं मन में चलने लगीं। सब हवा में है। इच्छा भी और उसको पूर्ण करने की योजना भी। आप घर से आफिस जाने के लिए निकले अपनी गाड़ी में। और आफिस पहुंचते पहुंचते आपने अपने मन मे सैकड़ो योजनाएं बनाये और रद्द किया। कब आफिस पहुंच गए। पता भी न चला। कितनी योजनाएं मन मे बनी यह भी याद नहीं रहा। आपने गाड़ी भी ड्राइव किया और सपने भी बुनते रहे। ऐसा ही न हो रहा है। 

तुलसीदास ने कहा-
"मोहनिशा जग सोवनहारा।
देखत सपना विविध प्रकारा।।
कृष्ण ने कहा -" या निशा सर्वभूतेषु जागर्ति तस्य संयमी"। 

इसी को कहा जा रहा है। उत्तिष्ठत जाग्रत। उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। बेहोशी का जीवन मत जियो। अब भी समय है। कबीर कहते हैं :
कहैं कबीरदास कब से बही।
जब से चेता तब से सही। 

जन्म के समय भी तुम्हे होश नहीं था। मृत्यु के समय भी बेहोश रहोगे। बीच में बचा जीवन। वह भी बेहोशी में बिता दोगे क्या। इसलिए उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। 

प्राप्य - जो प्राप्त करने योग्य है। क्या प्राप्त करने योग्य है इस जीवन में? बचपन से ही हम बच्चों को सपने में जीने का, सपने देखने का शिक्षण और प्रशिक्षण देना शुरू कर देते हैं। #Dream_Big। बड़े सपने देखो। महत्वाकांक्षा पालो। आकांक्षा भी नहीं। महत्वाकांक्षा। 
बच्चा अभी विद्यालय की देहरी भी नहीं डांक भी नहीं पाया था कि माता पिता अडोसी पड़ोसी पूंछने लगते हैं कि क्या बनोगे? महत्वाकांक्षा का बीज बो दिया बच्चे के अंदर। सपने बो दिए गए उसके मन में। असंतुष्टि के बीज रोप दिया गया। तृष्णा के बीज उसके मन मे बो दिया गया। 

अब बच्चा लग गया जीवन के अंधी दौड़ में। गला काट प्रतियोगिता। अब बनेगा कुछ। जो है वह नहीं रह जायेगा। आवरण चढ़ने लगेगा उस पर। मुखौटा धारण करेगा। बनने की दौड़ में लगा तो बन गया डॉक्टर इंजीनियर आईएएस पी सी एस, थानेदार, ठीकेदार। अब उसे चाहिए धन मान सम्मान। डॉक्टर बना था सेवा करने के लिए। आईएएस बना था देश सेवा करने लिये। लेकिन बनते ही, सेवा पीछे रह गयी। धन कमाने की दौड़ में सम्मिलित हो गया। शादी व्याह प्रेम मोहब्बत बाल बच्चे की दौड़ में सम्मिलित हो गया। धन भी अब संतुष्ट नही कर सका उसको। अब उसे चाहिए राजनीति में जाने के लिए पार्टी का टिकट। लोक प्रतिष्ठा चाहिए उसे। लोग पहचाने सम्मान दें। प्रयागराज जैसे छोटे शहर में चुनाव का मौसम आते ही आठ दस डॉक्टर कुर्ता पजामा गांठकर टिकटार्थियों की लाइन में लग जाते हैं। 

धन और पद कमाते ही उसका मद सर पर चढ़कर बोलने लगता है।
शराब तो उतर जाती है कुछ घण्टे बाद। धन और पद का मद 24 ×7× 375 चढ़ा रहता है। मद बना है मद्य से। मद्य अर्थात शराब। पद का मद देखिये किसे तरह चढ़ता है।
प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं।
को नर अस जन्मा जग माहीं।
- रामचरित मानस। 

 एक डीएम,  जो बचपन मे फैजाबाद पैसेंजर से आता था इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने, अब उन्ही लोगों को घास पात समझने लगता है, जिनके बीच से आया था। इसी को कहा जा रहा है बेहोशी में जीना, सपने में जीना। मद्य उतरती ही नहीं उसके मस्तिष्क से। 
ला पिला दे साकिया पैमाना पैमाने के बाद।
होश की बातें करेंगे होश में आने के बाद। 
पैमाने पर पैमाना पिये चला जा रहा है मनुष्य। धन का पैमाना, पद का पैमाना। होश है ही नहीं। बेहोश है व्यक्ति। 
पूरा जीवन बनने में, मुखौटा पहने हुए, असंतुष्टि में व्यतीत हो गया। तुष्टि क्या है इसका स्वाद भी न चखा। 

और इसी तरह एक समय आता है कि जिंदगी की शाम आ जाती है। बेहोशी में जन्मे, बेहोशी में जिये, बेहोशी में मर गए। होश क्या है इसका स्वाद ही न चखा जीवन में। 

क्या यही प्राप्य था जीवन का? क्या यही अभीष्ट था जीवन का। बच्चे को सिखाते गए कि होश से काम करो। ध्यान से काम करो। लेकिन ध्यान क्या है, होश क्या है इसको न सिखाया। सिखाते कैसे? स्वयं भी तो बेहोश ही जीवन जी रहे थे। 

तो मंत्र कह रहा है : प्राप्य वरानिबोधत। 
प्राप्य क्या है? प्राप्त करने योग्य क्या है? वह सद्गुरु जिसने बोध को प्राप्त किया हो। जिसने बोध को जाना हो ऐसा पुरूष। जिसने जागरण की कला जाना हो ऐसा सद्गुरु। वही प्राप्य है। वही बता सकेगा कि जागरण क्या है, होश क्या है, बोध क्या है। जिसने जाना है वही सिखा सकेगा यह कला। 

कबीर कहते हैं : कर्म करे निष्काम रहे जो ऐसी जुगति बतावे सो सद्गुरु कहावे। हर व्यक्ति सद्गुरु नहीं हो सकता। जो प्रवचन दे निष्काम कर्म का वह लेकिन युक्ति नहीं जानता है उसकी। वह है पंडित। वह सद्गुरु नहीं है। सद्गुरु तो वही है जो उसकी युक्ति सिखाता हो।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति। 
कवयो अर्थात सद्गुरु ऋषि - जिसने उस बोध को प्राप्त किया है। जो जाग्रत है। वह बताता है कि उस बोध को प्राप्त करने का पथ बड़ा दुर्गं है। कठिन है। असम्भव नहीं। कठिन - तीक्ष्ण क्षुरे के धार पर चलने जैसा कठिन। क्षुरे की धार पर चलना हो तो बेहोशी में नही चल सकते। पैर कट जाएगा। अत्यंत होश में ही , अत्यंत बोध के साथ ही क्षुरे की धार पर चलना संभव हो सकता है। 

©त्रिभुवन सिंह

उत्तिष्ठत जाग्रत :

#उत्तिष्ठत_जाग्रत:

उत्तिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरानिबोधत्। 
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति।।
-कठोपनिषद 

यह स्वामी विवेकानंद का अत्यंत प्रिय मंत्र था। बहुत से लोग समझते हैं कि उनके द्वारा रचित मंत्र है। लेकिन ऐसा नहीं है। यह कठोपनिषद से उद्धरित है। 

उत्तिष्ठत जाग्रत : उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य क्या सोया हुवा है? जो उसे कह रहे हैं कि उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य तो प्रतिदिन 6 से 8 घण्टे सोता है। उसके अतिरिक्त समय में जगा हुवा है। उठा हुवा है। कुछ न कुछ कर रहा है। तो फिर ऐसा क्यों कहा ? 

वस्तुतः जैसा हमारा जीवन है, उसमें हम सोए सोये ही जीते हैं। रात में भी सोते सोते सपने देखते हैं। दिन में भी सपने देखते हैं - दिवास्वप्न। मुंगेरीलाल के हसीन सपने। हसीन सपने सिर्फ मुंगेरीलाल ही नहीं देखता। हम समस्त लोग मुंगेरीलाल की तरह ही सपने देखते हैं। लेकिन इसका हमें बोध ही नहीं है कि हम सदैव सपने देखते रहते हैं। सोते सोते और जागते। इसका बोध तब होगा यदि अपने मन को देख सकोगे तब। एक इच्छा मन में उभरी। उसके उपरांत उसको पूरा करने की योजनाएं मन में चलने लगीं। सब हवा में है। इच्छा भी और उसको पूर्ण करने की योजना भी। आप घर से आफिस जाने के लिए निकले अपनी गाड़ी में। और आफिस पहुंचते पहुंचते आपने अपने मन मे सैकड़ो योजनाएं बनाये और रद्द किया। कब आफिस पहुंच गए। पता भी न चला। कितनी योजनाएं मन मे बनी यह भी याद नहीं रहा। आपने गाड़ी भी ड्राइव किया और सपने भी बुनते रहे। ऐसा ही न हो रहा है। 

तुलसीदास ने कहा-
"मोहनिशा जग सोवनहारा।
देखत सपना विविध प्रकारा।।
कृष्ण ने कहा -" या निशा सर्वभूतेषु जागर्ति तस्य संयमी"। 

इसी को कहा जा रहा है। उत्तिष्ठत जाग्रत। उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। बेहोशी का जीवन मत जियो। अब भी समय है। कबीर कहते हैं :
कहैं कबीरदास कब से बही।
जब से चेता तब से सही। 

जन्म के समय भी तुम्हे होश नहीं था। मृत्यु के समय भी बेहोश रहोगे। बीच में बचा जीवन। वह भी बेहोशी में बिता दोगे क्या। इसलिए उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। 

प्राप्य - जो प्राप्त करने योग्य है। क्या प्राप्त करने योग्य है इस जीवन में? बचपन से ही हम बच्चों को सपने में जीने का, सपने देखने का शिक्षण और प्रशिक्षण देना शुरू कर देते हैं। #Dream_Big। बड़े सपने देखो। महत्वाकांक्षा पालो। आकांक्षा भी नहीं। महत्वाकांक्षा। 
बच्चा अभी विद्यालय की देहरी भी नहीं डांक भी नहीं पाया था कि माता पिता अडोसी पड़ोसी पूंछने लगते हैं कि क्या बनोगे? महत्वाकांक्षा का बीज बो दिया बच्चे के अंदर। सपने बो दिए गए उसके मन में। असंतुष्टि के बीज रोप दिया गया। तृष्णा के बीज उसके मन मे बो दिया गया। 

अब बच्चा लग गया जीवन के अंधी दौड़ में। गला काट प्रतियोगिता। अब बनेगा कुछ। जो है वह नहीं रह जायेगा। आवरण चढ़ने लगेगा उस पर। मुखौटा धारण करेगा। बनने की दौड़ में लगा तो बन गया डॉक्टर इंजीनियर आईएएस पी सी एस, थानेदार, ठीकेदार। अब उसे चाहिए धन मान सम्मान। डॉक्टर बना था सेवा करने के लिए। आईएएस बना था देश सेवा करने लिये। लेकिन बनते ही, सेवा पीछे रह गयी। धन कमाने की दौड़ में सम्मिलित हो गया। शादी व्याह प्रेम मोहब्बत बाल बच्चे की दौड़ में सम्मिलित हो गया। धन भी अब संतुष्ट नही कर सका उसको। अब उसे चाहिए राजनीति में जाने के लिए पार्टी का टिकट। लोक प्रतिष्ठा चाहिए उसे। लोग पहचाने सम्मान दें। प्रयागराज जैसे छोटे शहर में चुनाव का मौसम आते ही आठ दस डॉक्टर कुर्ता पजामा गांठकर टिकटार्थियों की लाइन में लग जाते हैं। 

धन और पद कमाते ही उसका मद सर पर चढ़कर बोलने लगता है।
शराब तो उतर जाती है कुछ घण्टे बाद। धन और पद का मद 24 ×7× 375 चढ़ा रहता है। मद बना है मद्य से। मद्य अर्थात शराब। पद का मद देखिये किसे तरह चढ़ता है।
प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं।
को नर अस जन्मा जग माहीं।
- रामचरित मानस। 

 एक डीएम,  जो बचपन मे फैजाबाद पैसेंजर से आता था इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने, अब उन्ही लोगों को घास पात समझने लगता है, जिनके बीच से आया था। इसी को कहा जा रहा है बेहोशी में जीना, सपने में जीना। मद्य उतरती ही नहीं उसके मस्तिष्क से। 
ला पिला दे साकिया पैमाना पैमाने के बाद।
होश की बातें करेंगे होश में आने के बाद। 
पैमाने पर पैमाना पिये चला जा रहा है मनुष्य। धन का पैमाना, पद का पैमाना। होश है ही नहीं। बेहोश है व्यक्ति। 
पूरा जीवन बनने में, मुखौटा पहने हुए, असंतुष्टि में व्यतीत हो गया। तुष्टि क्या है इसका स्वाद भी न चखा। 

और इसी तरह एक समय आता है कि जिंदगी की शाम आ जाती है। बेहोशी में जन्मे, बेहोशी में जिये, बेहोशी में मर गए। होश क्या है इसका स्वाद ही न चखा जीवन में। 

क्या यही प्राप्य था जीवन का? क्या यही अभीष्ट था जीवन का। बच्चे को सिखाते गए कि होश से काम करो। ध्यान से काम करो। लेकिन ध्यान क्या है, होश क्या है इसको न सिखाया। सिखाते कैसे? स्वयं भी तो बेहोश ही जीवन जी रहे थे। 

तो मंत्र कह रहा है : प्राप्य वरानिबोधत। 
प्राप्य क्या है? प्राप्त करने योग्य क्या है? वह सद्गुरु जिसने बोध को प्राप्त किया हो। जिसने बोध को जाना हो ऐसा पुरूष। जिसने जागरण की कला जाना हो ऐसा सद्गुरु। वही प्राप्य है। वही बता सकेगा कि जागरण क्या है, होश क्या है, बोध क्या है। जिसने जाना है वही सिखा सकेगा यह कला। 

कबीर कहते हैं : कर्म करे निष्काम रहे जो ऐसी जुगति बतावे सो सद्गुरु कहावे। हर व्यक्ति सद्गुरु नहीं हो सकता। जो प्रवचन दे निष्काम कर्म का वह लेकिन युक्ति नहीं जानता है उसकी। वह है पंडित। वह सद्गुरु नहीं है। सद्गुरु तो वही है जो उसकी युक्ति सिखाता हो।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति। 
कवयो अर्थात सद्गुरु ऋषि - जिसने उस बोध को प्राप्त किया है। जो जाग्रत है। वह बताता है कि उस बोध को प्राप्त करने का पथ बड़ा दुर्गं है। कठिन है। असम्भव नहीं। कठिन - तीक्ष्ण क्षुरे के धार पर चलने जैसा कठिन। क्षुरे की धार पर चलना हो तो बेहोशी में नही चल सकते। पैर कट जाएगा। अत्यंत होश में ही , अत्यंत बोध के साथ ही क्षुरे की धार पर चलना संभव हो सकता है। 

©त्रिभुवन सिंह

Sunday, 9 August 2020

मूलनिवासी:

इसाई मिशनरियों और शासन में ऊपरी तरह से तारतम्य नही था , लेकिन आतंरिक रूप से उनका उद्देश्य एक ही था - हिन्दुओ का धर्म परिवर्तन , भारत को लूटना , उसके घर घर पसरे गृह उद्योगों को नष्ट कर भारतीय समृद्धि को नष्ट कर इसे मेनचेस्टर से बने कपड़ो का एक बाजार बनाना , तथा हिन्दू समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में बांटना।
यदि इतिहास को ठीक से देखें तो ब्रिटिश शासन ने 1872 में जब जनगणना की तो बनवासी भारतीयों को एनिमिस्ट यानि प्रकृति पूजक या जीव जंतुओं का पूजक के रूप में अलग कर उनको भविष्य में ईसाइयत के लिए टारगेट किया जा सके । और वही हुवा भी । स्वतंत्र भारत में उनको ST के नाम से चिन्हित कर मूल हिन्दू समाज से अलग पहचान दी गयी । क्या पूरा हिन्दू समाज प्रकृति पूजक या जीव जंतु पूजक नही है ?
1991 तक भारत में हिन्दुओ की जनगणना 4 वर्ण के रूप में होती रही ।
लेकिन यदि हिन्दू समाज मात्र 4 वर्णों या वर्गों में रहता तो इसको विभाजित कर इसायत की ऒर लक्षित करना आसान होता ? 
शायद नहीं ।
इसीलिये 1901 में 3 वर्ण ब्रम्हाण क्षत्रिय वैश्य 3 वर्णों को 3 जातियों के रूप में चिन्हित किया गया और भारत के 2000 वर्षो से अर्थजगत के निर्माण करता रहे शूद्र कर्मी कुल परिवारों को हजारों जातियों में चिन्हित कर के  भारत की आधुनिक जाति व्यवस्था का निर्माण होता है । इस तरह 4 वर्णों को हजारों अलग अलग जाति समूहों में चिन्हित करने में सफल रहे। 
दूसरी तरफ इन बेरोजगोर लोगों का एक विशाल जान समूह 19 शताब्दी के उत्तरार्ध और 20वीं शताब्दी के शरुवात में 22 करोड़ जनसँख्या में से 2.5 से 3 करोड़ लोग भूंख से मर जाते हैं । और बाकी बचे लोग दयनीय स्थिति में जीने को बाध्य होते हैं। वरना कोरी और कोली जो सम्मानित वैश राजपूत की वंशज थे , जो बुनकरी का पेशा करते थे , उनको आज SC में किस तरह शामिल किया गया ?
या मुसहर जो नमक का उत्पादकर्ता था उसकी आज समाज में सबसे ज्यादा जर्जर स्थिति कैसे होती ?
खैर 1921 की जनसंख्या के समय एक नए शब्द को बिना परिभाषित किये जनगणना में स्थान दिया जाता है ? 
1928 में साइमन कमीशन ने डॉ आंबेडकर को इन्ही डिप्रेस्ड क्लास को परिभाषित करने का काम दिया गया ।
1932 में डॉ आंबेडकर ने लोथिअन कमिटी की रिपोर्ट सौंपते हैं जिनमे वे डिप्रेस्ड क्लास को अछूत घोसित करते हैं , और छूने योग्य व्यक्ति को भी अछूत घोसित करते हैं - Notional Untouchable ।
फिर 1936 में ऑप्रेससेड क्लास एक्ट आता है और इनकी सचेदुलिंग होती है यानि SC का जन्म ।
हमारे संविधान निर्माताओं को ये इसाई शाजिश समझ नही आई ।
परंतु परिणाम आपके सामने है ।
सारे ST को अलग चिन्हित कर उनको इसाई बना चुके है ।
SC इनके दूसरे टारगेट हैं और वहां पर भी वो सफल होते आये हैं। ढेर सारे तथाकथित दलित चिंतक इनके गूढ़ पुरुष यानि जासूस हैं ।
अगला टारगेट उनके OBC हैं जिसको BP मंडल ने मात्र 5 महीने के कठोर मेहनत से पूरे भारत का सर्वेक्षण करके तैयार किया था जिसमे कई राजघराने भी आज OBC में शामिल हैं ।

Wednesday, 17 June 2020

How to know your mind ?

#अंतर्यात्रा: #माइंड_को_जानें :

बहुत से लोग माइंड को समझने के इच्छुक प्रतीत होते हैं।
किसी भी चीज को जानने के दो तरीके हैं।
आधुनिक बायोलॉजिकल साइंस का तरीका:
न जाने हमसे कितने केचुओं और मेंढकों की हत्या करवायी गयी इनको जानने समझने के लिए, लेकिन आज लगता है कि व्यर्थ की हिंसा और हत्या मात्र थी वह सब। 

काट पीट कर किसी को मुर्दा बनाया जा सकता है, उसके मुर्दा अंग का अध्ययन किया जा सकता है। लेकिन क्या मुर्दे को पढ़कर जीवित को जाना जा सकता है? हाँ यदि उसका कोई बाजारू पक्ष्य है तो उसके अनुरूप उसका उपयोग किया जा सकता है। इसके अनेक दृष्टिकोण हो सकते हैं - पक्ष्य और विपक्ष दोनों तरफ। 

दूसरा तरीका है: प्राचीनतम वैदिक साइंस का तरीका। यहां बता देना उचित होगा कि आधुनिक मेडिकल साइंस आज तक माइंड के बारे में कयास मात्र लगा रहा है। किसी निश्चित निष्कर्ष पर आज तक नहीं पहुँच सका है।
 मैं मेडिकल स्टुडेंट हूँ। मेरी लिस्ट में अनेक डॉक्टर हैं, वे सहमत और असहमत दोनों हो सकते हैं। वे अपना पक्ष्य रख सकते हैं। मेडिकल साइंस में कम से कम पांच या छः शाखाएं हैं जो अपने अपने तरीके से माइंड का अध्ययन कर रहे हैं - न्यूरोलॉजी, न्यूरोसाइंस, न्यूरोसर्जरी, साइकाइट्री, साइकोलॉजी, न्यूरो immunology। लेकिन उनकी स्थित उन पांच अंधों जैसी हैं जो हांथी को टटोलकर हांथी का व्याख्यान करते है अपनी अपनी समझ के अनुसार। मजे की बात यह है कि ये आपस मे बैठकर एक दूसरे से बात भी नहीं करते, माइंड को संपूर्णता से समझने के लिए। लेकिन सबके अपने अलग अलग नेशनल और इंटरनेशनल फोरम हैं।

वैदिक साइंस का तरीका है - क्लोज ऑब्जरवेशन का। मुझे आपके बारे में जानना हो तो आपका पोस्टमार्टम करूं या आपके कृत्यों का अध्धयन करूं बारीकी से?

तो यही बात माइंड के बारे में भी लागू होती है। माइंड को जानना अर्थात अंतर्यात्रा। अंतर्यात्रा एक विधि है माइंड को जानने का। तो माइंड को जानना है तो अपने माइंड का अध्ययन कीजिये। 

फिर समस्या आ गयी कि माइंड का अध्ययन कैसे करें?

 आंख कान नाक मुंह स्पर्श सबके सब तो बाहर की सूचनाएं दर्ज करती हैं - जिसको माइंड रिकॉर्ड करता है। यह ऐसी ही बनी हुई हैं। बाहर की ओर बनी हैं इसलिए बाहर की तरफ जाना ही इनका धर्म है। बाहर अर्थात संसार की तरफ। लेकिन यह सब सूचनाएं एकत्रित होती हैं अंदर - माइंड में। 

तो फिर क्या किया जाय?  
भगवत गीता में इसका एक तरीका भगवान कृष्ण ने बताया है :
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणं आस्थित: योगधरणाम।।

सभी द्वार अर्थात - नाक कान आंख मुंह आदि को बन्द करके मन को हृदय में और प्राणवायु को सिर पर केंद्रित करके अपने को योग में स्थापित करना ही योग की स्थिति है। बुद्द्धि के स्तर इसे समझना है तो सरल बात, परंतु कठिन प्रतीत होती है। 

कठोपनिषद में इसका सरल उपाय बताया गया है - आवृत्तचक्षु:। 

आंख को बन्द करो। आंख को बन्द करते ही हम सीधे माइंड के संपर्क में आ जाते हैं। माइंड से संपर्क स्थापित हो जाय तो उस पर निगाह रखो। देखो कि क्या चल रहा है तुम्हारे मस्तिष्क में। उसमे देवता निवास कर रहा है या शैतान? जो स्वरूप तुम्हारा बाहर प्रदर्शित होता है, या जो मास्क लगाकर हम घूम रहे हैं वह अनावृत्त हो जाएगा। 

मेडिकल साइंस आज माइंड की तरंगों को बाहर से नाप सकता है जिनको वह ब्रेन वेव्स कहता है - अल्फा बीटा डेल्टा गामा थीटा। पांच तरह की वेव्स। 
वैदिक साइंस इसको कहता है चित्त की वृत्तियों की तरंग -  मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र निरुद्ध। दोनों के निष्कर्ष एक दूसरे से प्रायः मिलते हैं। 

लेकिन यह तरंगे मात्र उनकी फ्रीक्वेंसी बताती हैं अर्थात मस्तिष्क कितना भिन्ना रहा है यही बताती हैं - किसके बारे में लेकर भिन्ना रहा है यह मेडिकल साइंस अभी तक नहीं जान सका है। 

यदि साइंस हमारे दिमाग की खिड़की खोलकर यह जान सके कि हमारे माइंड में क्या क्या चल रहा है, और उस जानकारी को पब्लिक किया जा सके तो संत और शैतान का भेद खुल जायेगा। न जाने कितने संत शैतान निकलेंगे, और न जाने कितने शैतान संत। 

कठोपनिषद का वह क्रांतिकारी मंत्र - आवृत्तचक्षु:, वाला यहाँ नीचे स्नैपशॉट में है। और अंतर्यात्रा का चार्ट भी। 

©त्रिभुवन सिंह 
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Fusion Science of Human Existence

#फ्यूज़न_साइंस_ऑफ_ह्यूमन_बीइंग :

प्रत्येक मनुष्य दो कोशिकाओं से निर्मित है -एक शुक्राणु और एक अंडाणु। यह हर बच्चा जानता है। 
Zygot बनता है इनसे। फिर मात्र तीन माह में ये लगभग 200 ट्रिलियन कोशिकाओं के समूह में बंट जाती है। सभी विशेषज्ञ कोशिकाएँ। कोई भी कोशिका सामान्य नहीं। हर कोशिका विशेषज्ञ। हर कोशिका लगभग अपने आप मे सम्पूर्ण। जो एक मनुष्य के शरीर मे घटता है वह सभी कोशिकाओं के अंदर घटता है - खाना पखाना, सांस लेना, मेटाबोलिज्म या उपापचय। 

जीव वैज्ञानिक इनका डेटा एकत्रित कर सकता है, कर लेता है - क्रोमोजोम से लेकर जीन तक - शूक्ष्म अध्ययन के द्वारा। और स्थूल अध्ययन के द्वारा मेडिकल साइंस जिसको हम लोग पढते हैं।

मेडिकल साइंस जेनेटिक साइंस आदि समझते हैं कि इतना ही जीव सम्पूर्ण होता है। मेडिकल या जेनेटिक साइंस प्रकृति या लौकिक संसार तक ही जा सकता है। फिजिकल अस्तित्व के ऊपर वह जा नहीं सकता। उसकी एक सीमा है। लेकिन वह समझता है कि यही अंतिम सीमा है।

लेकिन यदि सामान्य बुद्द्धि और जिज्ञासा हो तो इस मिथ को भंग किया जा सकता है। हम एक कोशिका अपने पिता से उधार लेते हैं और एक अपनी माता से । या दूसरी भाषा में कहें कि आनुवंशिकी विज्ञान (जेनेटिक साइंस) के अनुसार एक-एक कोशिका हमे अपने माता पिता से उपहार में मिली हैं। जिसने हम निर्मित होते हैं। लेकिन हमको जो भी चीज उपहार या उधार में मिलती है वह हमारी संपत्ति हो सकती हैं, हम नहीं हो सकते वह। लेकिन हमारा विबेक कहता है कि उसी में हम भी रहते हैं। 

ईशोपनिषद कहता है:
पूर्णमदम् पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णात पूर्णम् उदच्यते। 
पूर्ण वह भी है पूर्ण यह भी है। पूर्ण से पूर्ण निकलता है। 

तो यह पहली कैसे सुलझे कि उधार या उपहार में प्राप्त दो कोशिकाओं से बने इस स्थूल शरीर मे मैं कहाँ और कैसे रह रहा हूँ? 
सत्वं रजः तम इति गुणा: प्रकृति संभवा।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययं ।। 
- भगवतगीता
प्रकृति से उत्पन्न तीन गुण, सत रज तम मिलकर इस शरीर मे अविनाशी जीव को बांधते हैं। 

यह असेम्बली तैयार होती है - मां के गर्भ में। असेम्बली शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूँ कि इस शब्द से आप परिचित हैं। हर वस्तु आज असेंबल होती है। मनुष्य जैविक कंप्यूटर है। कृत्रिम कंप्यूटर (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) असेम्बल होता है, यह आप जानते हैं। 

तो जैविक कंप्यूटर की असेम्बली है मां का गर्भ। 
पिता और माता से मिला प्रकृति के तीन गुण - सत रज तम। जिसको जेनेटिक साइंस और मेडिकल साइंस समझ सकते हैं। अब इसमें असेंबली होनी होती है जीव की, जो आत्मा है और परमात्मा का अंश है। स्थूल प्रकृति और आत्मा के बीच का बन्धन बनाता है मन ( माइंड ) तथा पांच ज्ञानेन्द्रिया। ज्ञानेंद्रियों को भी विज्ञान ने समझ लिया है, लेकिन माइंड को अभी समझ नहीं सके हैं - माइंड एक तरह का सूक्ष्म भौतिक और अभौतिक के बीच के तरह का तत्व है। 

ममैवांशो जीवलोके जीवभूत सनातनः।
मनः षस्टाणि इन्द्रियाणि प्रकृति स्थाने कर्षति।।
- भगवतगीता

माता पिता से प्राप्त कोशिकाओं में हम प्रविष्ट होते हैं मन और पांच इंद्रियों के साथ। मन प्रकृति का हिस्सा है - आत्मा अलौकिक है, सनातन है, जबसे सृष्टि निर्मित हुयी है, तब से अस्तित्व में है - जो समस्त ऊर्जा का स्रोत है, लेकिन वह अकर्ता है। कुछ करता नहीं है। लेकिन सब कुछ उसी की उपस्थिति में घटती है। इसको वैज्ञानिक भाषा वालो को ऐसा समझाया जा सकता है। हमने एक तत्व सुना है - catalyst (उत्प्रेरक)। अनेकों जैविक और रसायनिक क्रियाएं तभी घटती हैं जब कैटेलिस्ट उपस्थित हो। वस्तुतः कैटेलिस्ट उसमें कुछ योगदान नहीं देता है - अकर्ता है। ठीक आत्मा को ऐसा ही समझा जा सकता है मोटा मोटा। 

यह असेम्बली निर्मित होने के बाद दो कोशिकाओं का विभाजन शुरू होता है - और तीन माह में दो सौ ट्रिलियन कोशिकाओं मे विभाजित हो जाती हैं। इतने कम समय मे इतनी कोशिकाओं को निर्मित करने में कितनी बड़ी फैक्ट्री की आवश्यकता होगी, इसकी मात्र कल्पना की जा सकती है।
प्रकृति को स्त्री सूचक संज्ञा से संबोधित करते हैं हम। माया दुर्गा सीता काली आदि उन्हीं शक्तियों का नाम है जिससे यह जग निर्मित हुवा है। 

आदिशक्ति जेहिं जग उपजाया।
सो अवतरेहु मोर यह माया।।
- रामचरितमानस 

यह एक नया तरीका है अस्तित्व को समझने का।
आपको शायद पसंद आये। 

#Note: I hope few medical scientists and genetists will come to counter or hail this article. This is how we can establish value of our heritage in modern world, which is blind enough to accept anything in the name of science - Even Aryan Invasion hoax too, in the name of fake Science Indology.

©Singh Tri Bhuwan

Saturday, 13 June 2020

छुआछूत संक्रामक बीमारियों और भूंखमरी की उपज : ब्रिटिश दस्युओं का उपहार

#कोरोना_वायरस_से_भयभीत मूषक की तरह विश्व ने,  इसके प्रसार और इससे बचने हेतु,  #छुआछूत फैलाने और अपनाने को एक मात्र रास्ता बताया है।

मैंने प्रमाणों के साथ इस अफवाह का खंडन किया है कि छुआछूत का हिन्दू धर्म से कोई सम्बन्ध है। 

हिन्दू धर्म के दस अंग हैं जिन्हें धारण करना ही हिंदुत्व है:
धृति क्षमा दमो अस्तेयं शौच इन्द्रिय निग्रह।
धी विद्या सत्यं अक्रोधो दशकम् धर्म लक्षणम्।
- मनुस्मृति 6.91 

याज्ञवल्क्य ने भी धर्म की यही परिभाषा दिया है।

#शौच अर्थात सैनिटेशन और हाइजीन धर्म का लक्षण है। 

इसी की बात WHO भी कर रहा है। 
भारतीय सरकार भी यही काम करने की राष्ट्रीय योजना बना रही है। 

भारत को लूटने वाले दस्यु ईसाई उस समय भारत के शासक भी थे, जब करोड़ो भारतीय, उनके निरंतर 200 वर्षो के लूट के कारण,  1850 के बाद ऐसी स्थिति में आ गए कि उनको दो जून की रोटी भी मिलना मुश्किल हो गया। भारत को सभ्य बनाने आने का दावा करने वाले दस्युवों ने नमक तक पर इतना टैक्स लगा रखा था कि आम आदमी के लिए नून रोटी मिलना मुश्किल था। गांधी को राष्ट्रीय आंदोलन करना पड़ा। 

ऐसी परिस्थितियों में संक्रामक रोगों के कारण 1850 से 1900 के बीच 3 से 4 करोड़ भारतीयों की भुखमरी और संक्रामक रोगों से मृत्यु हुयी।
 
अकेले 1918 में इन्फ़्लुएन्ज़ा से 12.5 करोड़ लोग प्रभावित हुए, जिनमे से 1.25 करोड़ लोगों की मौत हो गयी। - विल दुरान्त The Case For India. 

इन संक्रामक रोगों से निबटने की किसकी जिम्मेदारी थी? सरकार की या समाज की? 
सरकार तो हिंदुओं को मारने में लगी थी - बीमारी से गोला बम बारूद से। 

"जलियांवाला बाग में दस हजार निहत्थे हिन्दुओ पर गोलीबारी बारे करके 3,600 लोगो को घायल करने और 1200 लोगों की हत्या करने वाले जेनरल डायर को हाउस लॉर्ड्स ने दोषी पाया, और हाउस ऑफ कॉमन्स ने दोषमुक्त पाया और उसको पेंशन देकर कार्यमुक्त किया। इस पुरस्कार को अपर्याप्त मानते हुए फ़ौजिवादियो ने चंदा एकत्रित करके उसे 150,000 ( डेढ़ लाख) डॉलर के साथ एक रत्नजड़ित तलवार भेंट किया"।
- विल दुरान्त The Case For India. P. 135-136

ये था चरित्र उन लोगों का जिनके ऊपर अपनी जनता को संक्रामक रोगों और भुखमरी से बाहर निकालने का उत्तरदायित्व था। 

समाज ने इन संकामक रोगों से लड़ने हेतु शुचिता ( शौच) की प्रथा अपनाया, जिसे #Untochability का नाम देकर हिन्दू धर्म के अंधविश्वास से जोड़ा गया। 

उनकी सहायता किया श्री भीम राव अम्बेडकर जी ने #लोथियन_समिति में अपनी रिपोर्ट देकर, जो सर्वदा असत्य और अफवाह पर आधारित थी। मैं चुनौती देता हूँ, समस्त वामियों और दलित चिंतको को इस रिपोर्ट के संदर्भ में शास्त्रार्थ करने हेतु।

आज इतिहास ने भारत ही नही, विश्व को उसी मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जब वह अंतराष्ट्रीय स्तर पर छुआछूत की नीति को एक राष्टीय और अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति की तरह अपनाने को बाध्य है। 

WHO ने इस कार्य के  लिए विभिन्न देशों को 19 मिलियन अमेरिकी डॉलर देने की घोषणा की है। 

बहुत से शब्द नग्रेजी में लिखे गए है इस प्लान में -
Quarantine
Containment.
Social distancing - key intervention.
Cluster containment.
Buffer zone - 5 किलोमीटर से लेकर जिले के चारो ओर अन्य जिलों तक। 

इन सबका हिंदी और अंग्रेजी में अर्थ निकालिए तो आपको यह रहस्य एकदम दर्पण की तरह स्पष्ट हो जाएगा।

©त्रिभुवन सिंह

Saturday, 19 October 2019

#चित्रगुप्त_डेकोडेड :

चित्रगुप्त एक पौराणिक चरित्र है, जो यमराज के यहां लोगों का डेटा मेन्टेन करते हैं। ऐसा लोग बोलते हैं। पुराण प्रतीकों की भाषा मे बात करते हैं।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारतीय इंटेलेकटुअल The Vinci Code के प्रतीकों पर तो सहज विस्वास कर लेते हैं, लेकिन पुराण के प्रतीकों को माइथोलॉजी बोलते हैं।
#कोलोनियल_हैंगओवर का असर है यह।
भारतीय सनातन सिद्धांत के अनुसार दैव ( गॉड ) जैसी कोई शक्ति नही है जो आपके प्रारब्ध को निर्धारित करती हो, जो आपको स्वर्ग या नरक में भेजती हो।
यह अब्राहमिक मजहब और रिलीजन का भारतीय मनस के ऊपर आरोपण है, यदि कोई भारतीय ऐसा समझता है तो।
दूसरी बात - यथा पिंडे तथा ब्रम्हांडे।
जो इस पिंड अर्थात शरीर में है, वही ब्रम्हांड में है। मनुष्य ब्रम्हांड का एक सैंपल है।
तो यमराज और चित्रगुप्त भी आपके इसी पिंड में रहते हैं। जिस दिन आप जन्म लेते हैं उसी दिन से दोनो सक्रिय हो जाते हैं। जन्म के साथ ही मृत्यु शुरू हो जाती है।
सृष्टि लय और प्रलय - ब्रम्हा विष्णु महेश यह तीन शक्तियां निरन्तर आपके अंदर काम करती रहती हैं।
विज्ञान भी सहमत हो गया है कि शरीर की नई नई कोशिकाएं, पुराने मृत कोशिकाओं को विस्थापित करती रहती हैं।
आप जो भी कर्म करते हैं -
" शरीर वाक मनोभि: यत कर्म आरभते नर:"- भगवतगीता
आप जितने भी कर्म शरीर वाणी और मन से करते हैं, उसी के अनुरुप इस जीवन मे आपको परिणाम मिलते हैं।
इसमे किसी भगवान को क्या लादना और लेना?
आप डॉक्टर बनने के लिए कर्म करोगे तो डॉक्टर बन जाओगे। वकील बनने के लिए कर्म करोगे तो वकील बन जाओगे। साधु या आर्य बनने की दिशा में कर्म करोगे तो साधु या आर्य बन जाओगे। असुर या अनार्य बनने के लिए कर्म करोगे तो असुर या अनार्य बन जाओगे।
लेकिन यह कर्म गुप्त चित्रों ( कोडेड या encripted messages ) के रूप में आपके मन मे संकलित रहते हैं - इसी को चित्र गुप्त कहा गया है पौराणिक कथाओं में।
आपके कर्म किसी तीसरे व्यक्ति को न याद हो लेकिन वह आपकी स्मृति में सदैव सुरक्षित रहती है। आपके मन की सारी बातें सिर्फ आपको पता होती हैं। आपकी पत्नी बेटा बेटी तक को नही पता होती आपके मन की बात।
और किसी भगवान को आपके मन से कुछ लेना लादना है नहीं। उसको तो आप तभी समझ पाएंगे जब आपके मन से समस्त कोडेड मैसेज विलुप्त हो जाएं।
आपके मन मे संकलित वासनाओं की संकलित डेटा के साथ जब आपकी मृत्यु होती है, अर्थात जब यमराज के काले भैंसे पर आप सवार होते हैं तो उसी घटना को मृत्य सम्पन्न होना कहते हैं। जैसे आप किसी समारोह के खत्म होने पर कहते हैं कि समारोह सम्पन्न हुवा।
आपके मन से संगृहीत encripted messages के अनुरूप आपको नया जीवन मिलता है जिसको प्रारब्ध या कर्म संस्कार भी कहते हैं। अब आप नए जीवन चक्र में प्रवेश करते हैं।
चित्रगुप्त का बस यही अर्थ है।
और यमराज का भी।
आपने कीड़ो की लाइफ साईकल पढ़ी है न।
उसमे अविस्वास करते हो ?
नही।
तो फिर इस जीवन मृत्य के साईकल में विस्वास क्यों नही करते?
पिछली पोस्ट पर उठी कुछ जिज्ञासाओं का उत्तर है यह पोस्ट।
तुलसीदास लिखते हैं :
नहिं कोऊ सुख दुख कर दाता।
निज कृत कर्म भोग सुनु भ्राता।।