Tuesday, 7 August 2018

#विचारक_या_थिंकर्स_एक_मानसिक_बंधुआ_मजदूर:

#विचारक_या_थिंकर्स_एक_मानसिक_बंधुआ_मजदूर:
आज एक भाई ने फिर लंबा चौड़ा व्याख्यान देते हुए आर्यन नश्ल का हवाला देते हुए व्याख्यान लिखा है।
विचार क्या हैं ?
विचार आपके द्वारा एकत्रित की गयी सूचनाओं के डेटा को अपने गुण और धर्म ( स्वभाव) के अनुसार फेंट कर निकाला गया निष्कर्ष है।
इसको आप एक साइकोलॉजिकल ड्रामा भी कह सकते हैं। हर व्यक्ति का अपना साइकोलॉजिकल ड्रामा होता है। इसीलिए वर्षो वर्ष साथ रहने के बाद भी एक ही तरह की सूचनाओं के संग्रह के बाद भी भाई भाई के विचार अलग अलग होते हैं।
इसलिए गुण धर्म तो बदलना संभव नही है। परंतु सूचनाओं की सत्यता प्रामाणिक है कि गढ़ी हुई है यह निश्चित तौर पर पता किय्या जा सकता है।
सूचना संकलन की सबसे बड़ी समस्या है - आपको शिंक्षा के माध्यम से वितरित की गयी सूचना, जिसको आप एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह अपने गुरु या पुस्तकों से एक सत्य की तरह ग्रहण करके, उससे अपना तादात्मिकरण ( आइडेंटिफिकेशन) कर लेते हैं।
मैं अरुण त्रिपाठी और उमेश सिंह जी के साथ कई बार प्रोफेसर अमर सिंह और प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा से मिलने गया हूँ। वे जिस युग के छात्र थे उसमे आर्यन इन्वेजन और संस्कृत को इंडो युरोपियन इंडो जर्मन भाषा के अफवाह को एक ज्ञान की तरह ग्रहण करते आये थे, पढ़ते पढ़ाते आये थे, और उसको सच मानते आये थे।
लेकिन मैने कभी भी इस उम्र में उनके भ्रम को तोड़ना ठीक नही समझा, यद्यपि लोगों ने उसकाया भी। क्योंकि उस उम्र में यदि यह भ्रम टूटे कि जिस अफवाह को हम सच मानकर पढ़ते पढ़ाते आये थे, वह एक अफवाह मात्र थी तो तकलीफ होती है।
इसीलिये कभी नही बताया कि यह थ्योरी कब की खारिज की जा चुकी है।
लेकिन आज भी जब कुछ विद्वानों को उसी अफवाह को सच मानकर इसको लिखते पढ़ते और वाह वाही पाते देखता हूँ तो लगता है कि भ्रम और अफवाह का इंद्रजाल अभी भी ज्ञान समझकर वितरित किया जा रहा है।
तो बात मूल विंदु पर।
कि लोग किस तरह सूचनाओं के बंधुआ मजदूर बन जाते है ?
यह एक सहज मानव स्वभाव है।
चिकित्सा के अपने स्वयम के और अपने निज गृह के अनुभव ( realization) से यह बात मैं जानता हूँ कि जब कभी किसी के जीवन मे उसके किसी प्रिय के साथ कुछ अनहोनी हो जाती है, और उसको बताया जाता है कि ऐसा हो गया तो उसकी प्रथम प्रतिक्रिया उसको नकारने की होती है। फिर वह बीमारी के स्वभाव के अनुकूल कई चिकित्सको से संपर्क करता है कि शायद कहीं से यह बात गलत निकल जाए। सारे चिकित्सक यदि एक ही राय दें तो वह झाड़ फूंक मुल्ला मौलवी का रास्ता देखता है।
उसकी समस्त कोशिश यह होती है कि सत्य को झूंठ प्रमाणित किया जा सके। क्योंकि उसने अपने प्रिय से अपना तादात्मिकरण ( आइडेंटिफिकेशन) कर रखा होता है। और इसलिए मोह वश उसकी सहज बुद्धि काम नही करती।
सूचना से बनने वाले विचारों या साइकोलॉजिकल ड्रामा के साथ भी यही सच है। जिसने अपने जीवन के संघर्ष काल मे सूचनाओं को ज्ञान की तरह गृहीत और संग्रहित किया हो, जिसके कारण उसकी डिग्री या अस्मिता समाज मे स्थापित हुई हो, वह उन सूचनाओं से अपना तादात्मिकरण कर लेता है, स्वयम को उन विचारों से identify करता है।
मनुष्य के सॉफ्टवेयर में चार एप्प्स होते हैं।
मन बुद्धि चित्त अहंकार।
मन है सॉफ्टवेयर का मेमोरी कार्ड।
बुद्धि है तुलनात्मक रूप से इन सूचनाओं और अनुभव के बारे में समझ विकसित करने का एप्प्स।
और अहंकार है - हर भौतिक मॉनसिक और भावनात्मक तथ्य, या सूचना, जिससे आप स्वयम को identify करते हो, अपना तादात्मिकरण करते हो।
तो द्विवेदी जी और सुशोभित जी।
कोई भी भारतीय संस्कृत ग्रंथ उठा लो। काणे खोतर मैक्समुलर जैसे सेकेंडरी स्रोतों को छोड़ो।
आर्य शब्द का अर्थ अमरसिंह प्रणीत अमरकोश से सिर्फ यही मिलता है :
षट सज्जनस्य : महाकुल कुलीन आर्य सभ्य सज्जन साधवः।
अर्थात आर्य का अर्थ है - सज्जन साधु
और अनार्य का अर्थ है - दुर्जन या दुष्ट।
हर समाज और देश तथा हर काल मे यह पाये जाते हैं। यह कही समूह में नही होते।
यह अत्र तंत्र सर्वत्र होते हैं।
बाकी आपका विचार आपका साइकोलॉजिकल ड्रामा है, और मेरे विचार मेरे।
लेकिन सत्य तो एक ही न होगा?
कि सत्य भी अलग अलग होगा ?

Monday, 6 August 2018

दक्षिण भारत मे हिन्दी के विरोध की पृष्ठीभूमि

 ईसाई धरमपरिवर्तको और डिवाइड एंड कन्वर्ट की राजनीति।

आज भी राष्ट्रभाषा हिन्दी का दक्षिणभारत में विरोध होता है और उसकी जगह देशी भाषा नही बल्कि विदेशी नग्रेजी भाषा को स्थापित करने की बात होती है।
ये रहस्य लोगों को समझ में नही आता। लेकिन ये रहस्य भी कोलोनियल शासन और मिशनरी गठबंधन से उपजे समस्कृत विरोध की रणनीति अपनाकर ईसाइयत की स्थापना करने के लिए किए गए षड्यंत्र की देन भर है।
1801 में HT Colerbrooke ने एक आर्टिकल लिखा कि सभी भारतीय भाषाएं संस्कृत से उतपन्न हुई हैं। और समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ती है।

इसका खंडन किया अलैक्सडर D कैम्पबेल और फ्रांसिस whyte Ellis , जो मद्रास का कलेक्टर था और मद्रास के फोर्ट सेंट कॉलेज में अच्छा प्रभाव था, जो भारत में आने वाले अंग्रेज अधिकारियो को भारत के बारे में टीचिंग का केंद्र था, ने ये दावा किया कि दक्षिण भारतीय भाषाएं संस्कृत से नही निकली हैं। इन दोनों ने मिलकर 1816 में "तेलगू भाषा का व्याकरण " नामक पुस्तक भी लिखी - जिसमे ये दावा किया गया कि तेलगू और तमिल गैर संस्कृत उत्पत्ति की भाषाएं है। ऐसा दावा इसके पूर्व किसी ने भी नही किया था।

एलिस ने दावा किया कि इन भाषाओं का संबंध हिब्रू और अरब भाषाओ से है। जिसके मूल में बाइबिल के नोह् के संततियों के द्वारा विश्व की पूरी धरती को आबाद करने का सिद्धान्त की स्थापना की गई थी ।

उनका तर्क ये था कि विलियम जोहन्स ने चूंकि नूह के बड़े पुत्र की भाषा को संस्कृत प्रमाणित किया है तो शेम ही द्रविड़ियन लोगो का पूर्वज रहा होगा । अतः तमिल भाषा का सम्वन्ध हिब्रू और प्राचीन अरब भाषा से है।

उसी समयकाल में मिशनरी रोबर्ट कॉडवेल (1814- 91) ने एलिस की कल्पना को समाजशास्त्र से जोड़कर किया कि द्रविड़ एक अलग नश्ल है और भारत में आर्यो के पूर्व से रहती आयी है । उसने Comparative Grammer of Dravidian Race नामक एक पुस्तक लौकही जो आज भी खासी लोकप्रिय है। उस पादरी ने ये दावा किया कि तेलगू भाषा में आर्यों के एजेंट ब्राम्हणो ने धूर्ततापूर्वक संस्कृत घुसेड़ दिया है। और प्रस्तावित किया कि द्रविड़ नश्ल के लोगों को आर्यो के चंगुल से मुक्त करके उनको ईसाइयत के प्रकाश में लाना पड़ेगा और तमिल भाषा से संस्कृत शब्द निकालने होंगे।
दूसरा मोड़ इसमें 1840 में आया जब जॉन स्टीवेंशन नामक पादरी स्कॉटिश मिशनरी और ब्रायन HH ने #एबोरिजिनल_लैंग्वेज का प्रस्ताव रखा और उसमें उसनव उन समस्त भाषाओ को समाहित किया जिनको आज द्रविड़ियन और मुंडा फैमिली की भाषाएं कहते है।

बाकी आगे इस झूंठ को आगे बढ़ने का काम पेरियार और दक्षिण भारत के अन्य नेताओं ने किया और आज भी कर रहे है । आज तमिलनाडु ईसाइयत का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है ।
तो वस्तुतः दक्षिणभारत में हिंदी विरोध नही होता बल्कि सफेद चमड़ी के हरामियों द्वारा फैलाया हुवा झूंठ और ईसाइयत के फैलाव के लिए आधार बनाने के लिए संस्कृत और ब्रमहिनिस्म का विरोध था , जो आज हिंदी विरिध का रूप धारण कर चुका है।

दक्षिण भारत के लोग भी संभवतः इस गहरी शाजिश से अपरिचित हैं। उत्तर भारतीयों के प्रति उनके अजीब रवैये( विशेषकर तमिलनाडु) को आप इसी पृष्ठिभूमि में समझ सकते हैं।

( ब्रैकिंग इंडिया से )

जो ज्ञान धन जेनेरेट करे वही ज्ञान है?

जो ज्ञान धन जेनेरेट करे वही ज्ञान है।

धन जेनेरेट करने के लिए जितने भी मार्ग और पड़ाव हैं, उन पर चलने वाला व्यक्ति उन मार्ग पर चलता हुवा यदि किसी भी पड़ाव पर पहुंचने में सक्षम हो जाता है, और धन जेनेरेट कर लेता है, तदोपरांत वो जो भी अपने मुखारबिंद से उवाचता है वही असली ज्ञान है। और हम इसी ज्ञानी को सम्मान भी करते हैं।

डॉक्यूमेंट कहते हैं कि आज से मात्र एक शताब्दी पूर्व तक भारत मे दरिद्र ( अपरिग्रही) ब्राम्हण ज्ञानी और सम्मानित माना जाता था। John O Campbell ने 1904 में अपनी पुस्तक में लिखता है कि - Respect for Brahmavidya and Poverty is loosing fast in India and the day will come when they will worship Monmoth like West.

नग्रेजी में इसका अर्थ है - दरिद्र (अपरिग्रही) ब्रम्हवेत्ता का सम्मान भारत में बहुत तेजी से घट रही है और वो दिन दूर नहीं जब भारत धन की पूजा पश्चिम की तरह करेगा।

ऑब्जरवेशन एकदम सटीक था उसका।

लेकिन ये पृष्ठिभूमि तैयार कैसे हुई ?
भारत की गुरुकुल परंपरा को चोरी करके सफेद ईसाइयों ने अपने यहां सर्वजन तक शिंक्षा पहुंचाई।

लेकिन भारत में मैकाले शिंक्षा लागू की गई वुड्स डिस्पैच की 1854 में, जिसमे 1853 का मार्क्स का ऑब्जरवेशन और निर्देश अंतर्निहित था - कि "अंग्रेजों को दो काम करना ही होगा :
(1) भारतीय समाज के ताने बाने का विनष्टीकरण
(2) और उसके ऊपर पश्चिम के भौतिकवाद के नींव लादना।

ये काम सफेद नग्रेज़ों के बाद उनके मानद पुत्र परम प्रपंची कुटिल मुनि वामपंथी विद्वानों ने जारी रखा। उसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि एक नशलभेदी लेखक शेक्सपियर की तुलना कालिदास से की जाती है। और वो भी इस तरह - कालिदास पूर्व ( भारत) के शेक्सपीयर हैं।

दुर्भाग्य की बात ये है कि Narendra Modi की सरकार भी अभी तक उसी ढर्रे पे है जिस पर सफेद और काले नग्रेज चलते आये हैं।

कोई परिवर्तन शिंक्षा नीति या किसी भी क्षेत्र में हुई क्या ?

Don't Take yourself too seriously: stress releasing #Mantra

Don't Take yourself too seriously: stress releasing #Mantra

मद और मत्सर:
नहिं कोउ अस जन्मा जग माहीं
प्रभुता पाई जाहिं मद नाहीं।।

श्रीमद वक्र न कीन्हि केहिं प्रभुता बधिर न काहि।

ये 6 मनोविकारों में दो भाव ऐसे है जो आपके मन मे दूसरों के प्रति जगते हैं। जो आपसे हीन है उसके प्रति मद( अहंकार ) और जो आपसे श्रेष्ठ है उसके प्रति मत्सर ( द्वेष ईर्ष्या) का भाव।

ये प्रकृति प्रदत्त होता है इसमें कोई अपराध भाव जागृत न कोजिये।

लेकिन इसी से आपके मन मे stress का जन्म होता है क्योंकि आप खुद को बहुत सीरियसली लेते हैं।

मुख्य बात ये है कि जिस तरह हरी घास में छुपा हुआ हरा सर्प नही दिखता उसी तरह ये विकार स्वयं को नही दिखते।
दूसरे लोग दूसरों के इस विकार को तड़ से ताड़ लेते हैं ।
लेकिन ये मामला सॉफ्टवेयर का है।
आपका सॉफ्टवेयर आप खुद ही अपडेट कर सकते हैं दूसरा नहीं।
इसलिए इसमें आपकी मदद आप स्वयं कर सकते हैं दूसरा नहीं।
लेकिन समस्या ये है कि हम सदैव दूसरे का सॉफ्टवेयर ही सुधारने के फिराक में रहते हैं। क्योंकि अपने सॉफ्टवेयर में झांकने के लिए जिन एप्प्स को डाउनलोड करना पड़ता है उसे डाउनलोड करना, आधुनिक शिक्षा के कारण संभव नही होता है। क्योंकि सॉफ्टवेयर की मेमोरी corrupt फ़ाइलों से भरी हुई होती है आधुनिक शिक्षा की सूचनाओं से ।

तो क्या किया जाय ?

De Educate yourself.
Don't take yourself too seriously.
You are only single piece out of 6 bullion humans on this earth.

"अनवीक्षकी त्रयी वार्ता दण्डनीति इति विद्या "-- कौटिल्य

"अनवीक्षकी त्रयी वार्ता दण्डनीति इति विद्या "-- कौटिल्य 
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विद्या के चार अंग है --आन्वीक्षकी ,त्रयी वार्ता और दण्डनीति (शासन की नीति )
--आन्वीक्षकी --का अर्थ सांख्य ,योग और लोकायत --धर्म और अधर्म ,अर्थ -अनर्थ , सुशासन -दुशासन का ज्ञान 
--त्रयी --ऋक ,साम और यजुर्वेद का ज्ञान 
--,वार्ता --कृषि पशुपालन और व्यापार वार्ता विद्या के अंग हैं-- यह विद्या धान्य , पशु , हिरण्य ,ताम्र आदि खनिज पदार्थों के बारे में ज्ञान ।

स्वधर्मो ब्राम्हणस्य अध्ययनम अद्ध्यापनम् यजनम ,याजनम् दानं प्रतिग्रहेश्वेति ।
क्षत्रियस्य अध्ययनम यजनम दानं शश्त्राजीवो भूतरक्षणम् च ।
वैश्यस्य अध्ययनम यजनम दानं कृषिपशुपाल्ये वाणिज्य च ।
शूद्रश्य द्विजात शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलव कर्म च "।

अर्थात - ब्राम्हण का धर्म , अध्ययन अद्ध्यापन यजन ,याजन दान देना और लेना है ।
क्षत्रिय का धर्म है अध्ययन यजन ,याजन दान देना शस्त्र जीवी और समस्त जीवधारियों की रक्षा एवं पालन पोषण है।
वैश्य का धर्म अध्ययन यज्ञ करना दान देना कृषि कार्य ,पशुपालन और व्यापार है ।
शूद्र का धर्म कि द्विज की सुश्रुषा करे , कृषि कार्य ,,पशुपालन और व्यापार करे ,और शिल्प शास्त्र ,गायन वादन में कुशलता प्राप्त करे ।
रेफ : वार्तादंडनीतिस्थापना ।
अब आगे देखें और क्या कहते हैं कौटिल्य ..
--प्राचीन आचार्यों का मत है कि तेज कि अतिशयता होने के कारण ब्राम्हण , क्षत्रिय वैश्य और शूद्र , इन चार वर्णों की सेनाओं में उत्तर उत्तर की अपेक्षा पूर्व पूर्व की सेना अधिक श्रेष्ठ है
--इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का मत है कि -" शत्रुपक्ष ब्रम्हानसेना के आगे नमस्कार करके या शीश झुका कर अपने वष में कर लेता है । इसलिए युद्धविद्या में निपुण क्षत्रिय सेना को ही सर्वाधिक क्ष्रेष्ठ समझना चाहिए ; अथवा वैश्य सेना तथा ....शूद्र सेना ... को भी श्रेष्ठ समझना चाहिए , यदि उनमें वीर पुरुषों कि अधिकता हो तो ।

बाबा जी ने अपनी पुस्तक #Whowereshudras में शूद्रास ( menials) लिखते हैं।

भाई कोण सी पुस्तक से पढ़े से बाबा जी?

कि शुद्र को menial job अलॉट किय्या गया ?

स्ट्रेस kills

स्ट्रेस kills
आज कल स्ट्रेस का सबसे बड़ा कारण है - कैरियर बिल्डिंग.
कैरियर जीवन नहीं है, जीवनयापन का साधन मात्र है। कैरियर बनाने के पीछे बच्चे और मां बाप पागल हैं।

खुद भी स्ट्रेस्ड।
बच्चे भी स्ट्रेस्ड।

ज्यादा कमा लोगे तो कैसे जियोगे ?
थोड़ा और साधन संपन्न हो जाओगे। ( याज्ञवल्क्य मैत्रेयी संवाद)

लेकिन क्या अमल मन और विमल दृष्टि मिलेगी ?
नहीं मिलेगी।
तो स्ट्रेस कम होगा?
नही होगा।
मेडिकल साइंस के अनुसार - स्ट्रेस डायबिटीज हाइपरटेंशन डिप्रेशन एंग्जायटी की #जड़ है।

मेडिकल साइंस के पास जड़ का इलाज नही है। सिर्फ स्ट्रेस के कारण उपजी बीमारियों का मैनेजमेंट भर कर सकती है साइंस- क्योर भी नही कर सकती।

स्ट्रेस नामक जड़ का इलाज करना है तो विज्ञान की शरण गहो।

Don't take yourself too seriously.
आज कल स्ट्रेस का सबसे बड़ा कारण है - कैरियर बिल्डिंग.
कैरियर जीवन नहीं है, जीवनयापन का साधन मात्र है। कैरियर बनाने के पीछे बच्चे और मां बाप पागल हैं।

खुद भी स्ट्रेस्ड।
बच्चे भी स्ट्रेस्ड।

ज्यादा कमा लोगे तो कैसे जियोगे ?
थोड़ा और साधन संपन्न हो जाओगे। ( याज्ञवल्क्य मैत्रेयी संवाद)

लेकिन क्या अमल मन और विमल दृष्टि मिलेगी ?
नहीं मिलेगी।
तो स्ट्रेस कम होगा?
नही होगा।
मेडिकल साइंस के अनुसार - स्ट्रेस डायबिटीज हाइपरटेंशन डिप्रेशन एंग्जायटी की #जड़ है।

मेडिकल साइंस के पास जड़ का इलाज नही है। सिर्फ स्ट्रेस के कारण उपजी बीमारियों का मैनेजमेंट भर कर सकती है साइंस- क्योर भी नही कर सकती।

स्ट्रेस नामक जड़ का इलाज करना है तो विज्ञान की शरण गहो।

Don't take yourself too seriously.

Mantra ऑफ गेटिंग #De_Stressed.

Mantra ऑफ गेटिंग #De_Stressed. 

You are too stressed as you are taking yourself too seriously.

Don't take yourself too seriously. Nobody takes you seriously, as everybody is too self-absorbed and too self obsessed to think about others.Who cares about you except yourself ? No body.
It's you who think that whole world is observing you closely. But it's problem of your मन - भय और शंसय। 

भगवान कृष्ण ने कहा:

प्रकृति क्रियामाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश:।
अहंकार विमूढात्मा कर्ता अहम् इति मन्यते।।
(गीता)

कोई भी व्यक्ति प्रकृति के गारे मसाले से तैयार किये गए सॉफ्टवेयर के अनुरूप ही जीवन मे कार्य करता है। उसको इस बात का अहंकार नही होना चाहिए कि ये कार्य वो खुद कर रहा है। इस कर्ता भाव से जीने वाला व्यक्ति प्रकृति के नियमों के विरुद्ध सोच रहा है, इसलिए वो मूढात्मा हैं।
प्रकृति ईश्वर की ही माया है। आप उसी माया का एक हिस्सा हैं। प्रकृति आपकी हार्डवेयर बनाती है और सॉफ्टवेयर भी। सॉफ्टवेयर आपको बनी बनायी मिली है। आप हार्डवेयर को कर्ता समझ रहे हैं जबकि मामला मूलतः उल्टा है। सॉफ्टवेयर में जो एप्प्स हैं वैसे ही हार्डवेयर काम करता है।
तो डि स्ट्रेस्ड होने के लिए कुछ एप्प्स डाउनलोड करना होगा आपको। वरना:

अभी आये अभी बैठे अभी दामन सम्भाला है।
तुम्हारे जाऊँ जाऊँ ने हमारा दम निकाला है।।

Life is too short . And carrying baggage of मद मत्सर on our head corrupts our Software.
लेकिन ये मद मत्सर का बोझा सर पे लद जाना बहुत सहज बात है :
नहिं कोउ अस जन्मा जग माहीं।
प्रभुता पाई काहि मद नाही।।

और फिर
श्रीमद काहि न वक्र करि प्रभुता बधिर न काहि।।

और यही आपको अपने आपको गम्भीरता से लेने को बाध्य कर देती है क्योंकि ये सहज प्रक्रिया है। लेकिन यही स्ट्रेस का मूल कारण भी है।

और स्ट्रेस से मनोमस्तिष्क में शंसय उतपन्न होता है। शंसय से confusion उतपन्न होता है । confusion से cheos पैदा होता है।

Remain what you are.
Don't try to copy anybody.

क्योंकि गीता में कहा गया है कि:

श्रेयांस्वधर्मो विगुणः पर धर्मात सु-अनुष्ठिटात।
स्वधर्मो निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह:।।

व्यक्ति को प्रकृति से मिले निज स्वधर्म ( स्वभाव सॉफ्टवेयर) के अनुरूप ही काम करना चाहिए। दूसरे का सॉफ्टवेयर कितना भी उन्नत हो उसकी कोपी नही नही करना चाहिए। क्योंकि नकल असल के मुकाबिले श्रेष्ठ नहीं हो सकता।
अपने सॉफ्टवेयर के अनुरूप कार्य करते हुए यदि हार भी गए तो कोई बात नहीं। क्योंकि आगे पुणः अपना रास्ता खोज सकोगे। क्योंकि ये आपका जाना पहचाना मार्ग है।

लेकिन दूसरे के सॉफ्टवेयर की नकल करते हुए यदि कहीं फंसे तो फिर रास्ता खोजे भी नहीं मिलेगा। क्योंकि आप अनजाने रणक्षेत्र में अनजाने हन्थियार से लड़ने गए हैं इसलिए परिणाम भयावह होंगे।