Monday, 27 April 2015

Untouchability : Q raised by Dr Ambedkar

भ्रस्ट और कुंठित दलित चिंतकों डॉ आंबेडकर के द्वारा उठाये गए इस प्रश्न का जबाव दो ।
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डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक -" अछूत कौन और कैसे" में लिखा है -
" 1- गवर्नमेंट कौंसिल (1936) में 429 जातियां अछूत घोषित की गयी हैं ।
2- लेकिन शास्त्रों और उपनिषदों में मात्र 12 जातियां अछूत   लिखी गयी हैं । 
3-जिन अछूत जातियों का वर्णन शास्त्रों में है वो गवर्नमेंट कौंसिल की लिस्ट में नहीं हैं ।
4- जो अछूत जातियां गवर्नमेंट कौंसिल में लिस्ट हैं उनका जिक्र शास्त्रों में नहीं है।
5- मात्र एक जाति जो दोनों जगह वर्णित है वो है -चमार।
ये बड़ी दुरूह confusion की स्थिति है "।
आज तक डॉ आंबेडकर के इस सच्ची स्वीकारोक्ति का वर्णन किसी दलित चिंतक ने किया क्या ?

Cast system and its hierarchy is creation of corrupt Racial Concoction of Bigot White British Christian Officer H H Risley

 पुर्तगालियों द्वारा ,, १६०० में जात के लिए के लिए Caste शब्द का प्रयोग किया गया /

H H Risley नामक racist अंग्रेज़ अधिकारी जो तत्कालीन जनगणना अधिकारी  था,   1901 में जनगणनां Caste के आधार पर पहली बार करता है , और २००० से ज्यादा जातियां और 42 न्श्लोन की भारत मे खोज करता है ,  "नेसल बेस इंडेक्स " को  सोशल hierarchy से जोड़कर    ./ 
उसने एक unfailing "लॉ ऑफ़ caste " की रचना की ( भारत मे लॉं पहली बार अंग्रेजों ने ही बनाए ,ये सर्वविदित है ) जिसके अनुसार  "भारत में नाक की चौड़ाई किसी व्यक्ति के सामजिक हैसियत सामजिक स्टेटस के inversely proportionate होती है" / 

दूसरी मह्हत्वपूर्ण बात ये है कि सोशल hierarchy के क्रम जो उसने लिस्ट बनाई उसको अल्फबेटिकल क्रम में न रखकर सोशल hierarchy के आधार पर ऊपर से नीचे कि और लिस्टिंग किया / 

यहीं से उस ऊंची और निचली या अगड़ी और पिछड़ी जातियों के एक नए सिद्धांत की रचना होती है , जिसके आधार पर सरकारें आज भी काम कर रहीं है / हाल ही में जाटों को पिछड़ी जाति की लिस्ट में शामिल किया जाना सिर्फ इसी नजरिये से व्याख्यायित होता है / जातिगत जनगणना 1901 , 1911 और 1931 तक होती है / लेकिन इस दौरान निचले क्रम मे दर्ज किए गए जातियों के प्रमुखों मे ब्रिटिश कोर्ट ऑफ लॉं मे अपनी जाति को नीचे दर्ज किए जाने के खिलाफ इतने मुकदमे होते हैं कि 1941 की जनगणना मे जाति का प्रयोग बंद कर दिया जाता है /

 इसीलिए अगर आप को विस्मृत न हुआ हो तो याद होगा कि 1989 जब  मण्डल कमिशन लागू होता है तो उसमे 1931 की जनगणना की लिस्ट का प्रयोग किया जाता है /यानि 60 साल पूर्व का / 60 साल मे 3 पीढ़ियाँ गुजर जाती है और इतने वर्षों मे राजा रंक हो जाता है और रंक राजा /
क्या कभी सोचा इस बारे मे ?

जात कि जाति ???
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माँगी नावं न केवट आना ,कहत तुम्हार मर्म मैं जाना ...............................................................................................................

निषाद कहत सुनइ रघुराई ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई

हमरे कुल की रीति दयानिधि,संत मिले त करब सेवकाई \

रीति छोड़ उनरीति न करिहौं ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/

नदी नावं के हमहि खेवैया, औ भवसागर के श्री रघुराई /

तुलसी दास यही वर मांगू , उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /

जात पांत न्यारी, हमारी न तिहारी नाथ ,

कहबे को केवट , हरि निश्चय उपचारिये

तू तो उतारो भवसागर परमात्मा

औ मैं तो उतारूँ , घाट सुर सरि किनारे नाथ /


नाइ से न नाइ लेत , धोबी न धुलाई लेत

त तेरे से उतराई लेत, कुटुंब से निकारिहयों /

जैसे प्रभु दीनबंधु ,तुमको मैं उतारयो नाथ /

तेरे घाट जैहों नाट मोको भी उतारियों

उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /

मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/.......चुन्नू लाल मिश्रा केवट राम संवाद /

जात कि जाति ???
...एक जात शब्द को तुलसी दास ने बताया था ,,जिसमें केवट ने कहा कि--रामचन्द्र जी आप और मैं एक ही जात के हैं ,,मैं नदी कि नावं खेता , और आपभवसागर की नाव खेते हो , हमारी जात एक ही है ,जैसे नाउ नाउ से , और धोबीधोबी से पारिश्रमिक नहीं लेता , तो वैसे एक केवट दूसरे केवट से कैसे पारिश्रमिक ले सकता है / और लिया तो मुझे कुटुंब से बाहर कर दिया जाएगा /यहाँ तक तो ठीक था /

लेकिन जब हमने जॉन मुइर ,मैक्समूलर ,और M A शेरिंग पादरी , जैसे संस्कृतविज्ञों इंडोलॉजिस्ट को आधार बनाकर डॉ आंबेडकर  1946 " शूद्र कौन थे " , जैसे ग्रन्थ की रचना करते हैं , और उसकी उत्पत्ति वेदों में खोजने निकलजाते हैं , तो हमारी मंशा पर भले ही सवाल न खड़े होते हों , लेकिन मेरेतथ्यपरकता पर तो संदेह की सुई घूम ही जाएगी /

.......... आज न सही, कल सही ..........................................



डॉ आंबेडकर खुद इस nasal base इंडेक्स के  आधार को निराधार बताते हुए खंडन करते हैं , तो शायद एक हीतथ्य स्पस्ट होता है , कि वे तात्कालिक समय के एंथ्रोपोलॉजी जैसे विषयों में तो एक्सपर्ट थे ,लेकिन जब उन्होंने इतिहास की तरफ नजर उठाई तो ,शायद कहीं फर्जी संस्कृत विदों के जाल में उलझ कर रह गये /

और जब हमारे देश के विद्वान जो कॉपी एंड पेस्ट के , आधार पर न जाने कितनीपीएचडी ,लेते और देते रहते हैं , उन्होंने caste का अनुवाद जाति में करते हैं , तो आधुनिक भारत की तस्वीर सामने आती है /

A L Basham जैसे लोग शायद इसी को जाति की तरलता और rigidity ऑफ़ caste सिस्टम के नाम से बुलाये //लेकिन ये तो किसका काम है , आपको बता ही दिया लेकिन obcession  के मरीज तथाकथित दलित चिंतक  इसको भी ब्राम्हण वाद के जिम्मे , ठोंक देते हैं / डॉआंबेडकर को ये छूट दी जा सकती है , की उनके पास सूचना के श्रोत सीमित थे ,इसलिए जिस भी निष्कर्ष पर वे पहुंचे , अगर वे होते , तो शायद उसको रेक्टिफी करते /

अतिशूद्र Outcastes = कुटुंब  से निकारिहों / अतिशूद्र शब्द किस संस्कृत ग्रंथ से उदद्रित किया गया ? जब ये शब्द है ही नहीं तो ? इसको महात्मा फुले ने किसी झोला छाप ईसाई संस्कृतज्ञ से चुराया था /

इसीको ईसाई विद्वानों ने ..Outcasts का नाम दिया /, हिन्दू समाज में समाज कोनियंत्रित करने के लिए एक व्यवस्था थी - जो उन मान्यताप्राप्त परम्पराओं का पालन नहीं करेगा उसको _"कुटुंब से निकारिहों " यानी जात-बाहर कर दियाजाता था / यानि उनको भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करना पड़ता था / उनकी सारी व्यक्तिगत अधिकारों से वंचित कर कुटुंब और समाजबहिस्कृत कर दिया था /

इस बात का वर्णन डॉ बुचनन ने अपनी पुस्तक में 1807 में भी किया है - किशूद्रों को अपने कुटुंब को संचालित करने के लिए ,उस समाज के बुजुर्ग आपसी सलाह के उपरांत किसी को सजा भी दे सकते थे /ये सामाजिक व्यवस्था ईसाइयत फैलाने में सबसे बड़ी बाधा थी / इसबात का जिक्र संस्कृत मॅक्समुल्लर और पादरी M A शेरिंग दोनों ने लिखा है /
 

इसलिए इस कुप्रथा का दानवीकरण करना ही पड़ेगा / और वही हुवा --इसी कोoutcasts कहा डॉ आंबेडकर ने ,,और आगे चलकर वर्ण व्यवस्था में एक और अंग के रूप में लिखा -"अवर्ण " /
अब बात करते हैं  प्रमुखता से -


(१) जब इन -"कुटुंब से निकारिहों " यानि outcastes को धनसम्पत्ति बाल बच्चे पत्नी ,सब का त्याग करना पड़ता था ,तो इनके वंश कैसे आगे बढ़ेंगे / कैसे डॉ आंबेडकर के द्वारा वर्णित पांचवे वर्ण का निर्माण होगा ??

(२) ईसाई संस्कृत विद्वानों ने बताया वर्ण - यानि चमड़ी का रंग / तो ये नहीं बताया कि कौन सा रंग गोरा काला नीला पीला या सतरंगी ?? किस रंग का सवर्ण समाज था ??
 

(३)पांचवा वर्ण - अवर्ण / ये भी नहीं बताया कि इसका क्या मतलब होता है - बदरंग कि बिना रंग का ?? या discouloured , जो ईसाई mythology
में वर्णित अनंतकाल तक स्लेवरी में रहने के लिए नूह द्वारा श्रापित Ham के वंशज - जिसके पाप के कारण गॉड ने उसके वंशजों को "काला" रंग दे दिया ???


अभी मैं कल .@Chandra Bhan प्रसाद  जी जैसे एक विद्वान दलित चिंतक की timeline पर गया , तो उनके अनुसार मैकाले के पूर्व --" भारतीय इतिहास में शूद्रो और दलितों की शिक्षा का सूत्रधार था "/


मैं उनको अल्पज्ञ और अविज्ञ तो नहीं कह सकता , हाँ अनभिज्ञ या धूर्त और खड़ड़यंत्रकारी अवश्य कह सकता हूँ / क्योंकि जिन अंग्रेजों के प्रति आप इतने कृतज्ञ हैं , वे इतने ईमानदार अवश्य थे की जो डेटा उन्होंने एकत्रित किये तात्कालिक भारतीय समाजिक और सांस्कृत व्यवस्थाके सन्दर्भ में , वे इंडियन ऑफिस लाइब्रेरी लन्दन में अभी भी संरक्षित हैं /
..............................वही डेटा ये भी कहता है कि 


" 1830   के आसपास मैकाले की शिक्षा पद्धति लागू होने के पहले- भारतीय स्कूलों में अंग्रेज कलेक्टरों द्वारा इकट्ठे किये डेटा के अनुसार - शूद्र
छात्रों की संख्या ब्राम्हण छात्रों से चार गुना थी" /.
.......

https://www.facebook.com/tribhuwan.singh.908

आप तो बाबा साहेब की कृपा से उच्च पदासीन हैं , और डिक्की के नाम पे सैकड़ो करोणों के सरकारी अनुदानों को चाम्पे बैठे है , लेकिन अपनी अनभिज्ञता या धूर्तता के कारण इस तरह के तमाम ऐतिहासिक। तथ्य अपने अनुयाईओयों तक नहीं पंहुचा रहे हैं /
@Chandra Bhan Prasad जी और इनके जैसे तमाम दलितचिन्तको से मेरा आग्रह सिर्फ इतना ही है कि आप अपनी स्वार्थ की रोटी जरूर सेंके , लेकिन आप अपनी अज्ञानता, अनभिज्ञता या धूर्तता के कारण , आने वाली दलित सन्ततियो को घृणा और
अनभिज्ञता की आग में न झुलसायें / सादर

In 1891 Risley published a paper entitled The Study of Ethnology in India.[10] It was a contribution to what Thomas Trautmann, a historian who has studied Indian society, describes as "the racial theory of Indian civilisation". Trautmann considers Risley, along with the philologist Max Müller, to have been leading proponents of this idea which
... by century's end had become a settled fact, that the constitutive event for Indian civilization, the Big Bang through which it came into being, was the clash between invading, fair-skinned, civilized Sanskrit-speaking Aryans and dark-skinned, barbarous aborigines॰

In 1891 Risley published a paper entitled The Study of Ethnology in India.[10] It was a contribution to what Thomas Trautmann, a historian who has studied Indian society, describes as "the racial theory of Indian civilisation". Trautmann considers Risley, along with the philologist Max Müller, to have been leading proponents of this idea which... by century's end had become a settled fact, that the constitutive event for Indian civilisation, the Big Bang through which it came into
being, was the clash between invading, fair-skinned, civilized Sanskrit-speaking Aryans and dark-skinned, barbarous aborigines

Its Census based on Caste . You can see list of bramhins takeb from gifferent places

https://ia700407.us.archive.org/.../BookReaderImages.php... https://ia700407.us.archive.org/.../BookReaderImages.php... 


किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट / हमारे ख़्याल से तो जनगणना जिला , तहसील और फिर मोहल्ले में यान एक गांव में कितने निवासी हैं , सब कि एक जगह लिस्टिंग होती है / ये तो अजीब गणना है /देखिये किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट / हमारे ख़्याल से तो जनगणना जिला , तहसील और फिर मोहल्ले में यान एक गांव में कितने निवासी हैं , सब कि एक जगह लिस्टिंग होती है / ये तो अजीब गणना है /देखिये किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट /

In 1921 Census, for ‘low castes’, the term ‘depressed classes’ was used for the
first time, but no standard list of such classes was available for want of an adequate
definition. Population data were collected and published for each individual castes and
tribes separately at the state and district levels. In 1931 Census, these figures were
confined to exterior castes and primitive tribes, besides all other castes except those
whose number fell short of four per thousand of the total population; and for those
whose figures were considered unnecessary by the then local government. The 1941
Census data on population of tribes were presented on a somewhat modest scale since
their compilation was restricted due to World War II. It was also felt by the then Census
Commissioner, Mr. Yeatts, that in the then prevailing circumstances, the scope of
enquiries on castes and tribes could be dissociated from the Census. The group totals
for Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Anglo-Indians were, however, brought out
for all the states. Figures were also compiled at the district level for 62 Scheduled
Castes and 14 Scheduled Tribes, included in the Scheduled Castes Order, 1936, and
56 other castes and three non-specified tribes. The term ‘primitive’ tribe was given up
during this Census.....P Pdmnabhan Registrar General Of India Xi congres of statistic and anthropology.
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नीचे दिए गए census डेटा को देखें ध्यान से तो पाएंगे कि पहले nasal बेस इंडेक्सिंग ( नाक की लम्बाइ और चौड़ाई को गणना ) के आधार पर 1901 में लोगों की पहले cast निर्धारित किया फिर उनकी गणना की ।
क्या आपने ऐसी जनगणना सुनी या देखी है या उड़कर भी कल्पना कर सकते एक लिस्ट में अलग अलग जिलों के लोगों एक क्रम में रखा जाय ।

यही लिस्ट आज तक चल रही है।


डॉ अंबेडकर के साहित्य के लगभग सब के सब रिफ्रेन्स भ्रस्ट कट्टर ईसाई मिसनरी या अंग्रेज़ अधिकारी क्या भरोसे योग्य हैं ?

"शूद्र कौन थे " नामक अपनी थेसिस को लिखते समय डॉ अंबेडकर ने स्वयं लिखा है  कि यद्पि  उनको  संस्कृत  नहीं आती  तथापि संस्कृत  ग्रन्थों  का  अनुवाद  अङ्ग्रेज़  मे हो चुका  है इसलिए  उन  अनुवादित  ग्रन्थो  से  संस्कृत ग्रन्थों  के आधार पर  एक  नयी अवधारणा  की रचना  करने मे  कोई हर्ज नहीं है/ उनके  उन्हीं  रेफेरेंन्स मे  से  एक   था  जॉन  मुईर  जिसन लिखा "  आरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट" /  देखिये जरा ये  कितना आरिजिनल  है? 
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जॉन मुइर जो एक ईसाई विद्वान था , जो 19 साल की उम्र में भारत आता है इंडियन सिविल सर्विसेज में , और जो अल्लाहाबाद और फ़तेह पर में अंग्रेजी हुकूमत का एक अंग था ,वही  जॉन मुइर २९ साल की उम्र में मत्परीक्षा नामक एक पुस्तक लिखता है, और ईसाइयत को हिंदूइस्म से श्रेष्ठ साबित करता है /

 सरकारी नौकरी में रहते हुए वो संस्कृत का इतना बड़ा विद्वान बन जाता है कि " ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट्स " नामक एक किताब लिखता है , जिसका डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक "शूद्र कौन थे " , में बहुतायत रूप से उद्धृत किया है /

 उसी पुस्तक के पार्ट -२ से  कुछ ओरिजिनल टेक्स्ट्स पेश करा रहा हूँ , अंग्रेजी में जिसको कहते है - " Right From Horses mouth "---

"ये नॉन आर्यन नश्ल के लोग अमेरिका के रेड इंडियन कि तरह कमजोर नश्ल के थे / दूसरी तरफ Arians ज्यादा organisesed enterprising और creative लोग थे, धरती पर अर्वाचीन जन्म लेने वाले ज्यादा सुदृढ़ पौधे और जानवरों कि तरह वे ज्यादा सुदृढ़ लोग / अंततः दो विपरीत राजनैतिक लोगों की तरह ही अलग दिखने वाले / 

तीन ऊपरी वर्गों को जिनको द्विज या आर्य के नाम से भी जाना जाता है , एक अलग विशेष क्लास के लोग /

 Arian इस तरह से एक सुपीरियर और विजेता नश्ल साबित हुई / इसको सिद्ध करने के लिए complexion को एक और सबूत के तौर पर जोड़ा जा सकता है / संस्कृत में Caste को मूलतः रंग (कलर ) के नाम से जाना जाता है / इसलिए caste उनके रंग (चमड़ी के रंग ) से निर्धारित हुई /

 लेकिन ये सर्वविदित  हैं कि ब्राम्हणों का रंग शूद्र और चाण्डालों से ज्यादा फेयर था / इसी तरह क्षत्रियों और वैश्यों के भी इसी तरह फेयर complexion रहा होगा / ( ये उसने कल्पना के घोड़े दौडाकर मान लिया बिना कोई प्रमाण प्रस्तुत किए ) 

इस तरह हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि कि एरियन -इंडियन मूलतः काले मूल निवासियों से भिन्न थे; और इस अनुमान को बल मिलता है कि वे किसी उत्तरी देश से आये थे /

अतः एरियन भारत के मूल निवासी नहीं थे बल्कि किसी दूसरे देश से उत्तर (भारत) में आये , और यही मत प्रोफेसर मैक्समूलर का भी है "/ From- Original Sanskrit Texts Part Second P. 308-309 ; by John Muir 

नोट :  जो संस्कृत विद्वान वर्ण और caste के भेद को भी नहीं समझ सकते /वो चमड़ी के रंग के आधार पर सवर्ण आवरण और असवर्ण जैसे शब्दों से समाज को विभाजित करते है , उन्होंने किस संस्कृत ग्रन्थ को पढ़कर ये वाग्जाल फैलाया है ?? 
आप स्वयं देख सकते हैं कि रंगभेद के चश्मे से दुनिया को बांटने वाले और गुलाम बनाने वाले , 1500 से 1800 के बीच अमेरिका के 200 million मूल निवासी रेड इंडियन का क़त्ल करने वाले ईसाई विद्वान कितने शाश्त्रों का अध्यन कर इस निर्णय पर पहुंचे है / आजकल ईसाइयत फैलाने के लिए एक नयी शाजिश ये ईसाई फिर रच रहे है - AFRO _DALIT प्रोजेक्ट के नाम से , जिसके कांचा इलैया जैसे विवान प्रमोटर हैं / इन्ही संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानो के गढे  हुए कुतर्कों के अनुवादों के अनुवादों के अनुवाद कक आधार बना कर जब डॉ आंबेडकर "शूद्र कौन थे " कि खोज में वेदों कि सैर पर निकल जाते हैं , तो उनकी मंशा पर उंगली उठे न उठे लेकिन उनके सूचना के श्रोतों की विश्वसनीयता पर प्रश्चिन्ह अवस्य लग जाएगा /

Economic Destruction Of India : Will Durant ; The Case For India

भारत पिछले 2000 साल से ज्यादा समय से विश्व की जीडीपी का 25% का हिस्सेदार रहा है। अंगुस मेडीसन और पॉल बरोच जैसे अर्थशास्त्रियों ने व्यापक खोज कर जो डेटा दिया उसके अनुसार 1750 में जहाँ भारत 25% जीडीपी का हिस्सेदार था विश्व जीडीपी का , वहीँ ब्रिटिश और अमेरिका मात्र 2 % जीडीपी का हिस्सेदार थे।

1900 आते आते लूटमार शोषण over taxation और मनीड्रेन के कारण भारत मात्र 2 % जीडीपी का हिस्सेदार बचा।
इस जीडीपी का बेस घरेलु उद्योग थे। और मैन्युफैक्चरिंग हर घर में होती थी।

अब इस आर्थिक विनाश के कारण पॉल canady की पुस्तक Rise  and fall of Great Powers मे  पॉल बरोच के अनुसार  700% लोग de industrialize हुए , और भारत मात्र एक कृषि आधारित देश बन के रह गया।

उन निर्माताओं और उनके परिवार वालों को बेरोजगारी के कारण क्या क्या करना पड़ा ??

1947 तक तो न जाने कितने और मैन्युफैक्चरर बेघर बेरोजगार हुए होंगे ?

इस विशाल जनसमूह की कंगाली और दुर्दशा का कारण जहाँ डॉ आंबेडकर वेदों और स्मृतियों से खोजकर भारत का बंटाधार किया ; वहीँ Wiil Durant ; जोकि आजतक का सबसे लोकप्रिय और निर्विवाद लेखक ने भारत आकर इसके पीछे के खड्यंत्रों को जानने की कोशिश करता है , और तथ्यों और डॉक्यूमेंट के आधार पर एक पुस्तक लिखता है : The Case For India .

उसी से उद्धृत एक अंश जो आपको अछूत प्रथा के उत्पत्ति की भी झलक  दिखायेगा।
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"अगर वो शौभाग्यशाली है तो वह ओवर taxed जमीन को छोड़कर भाग जाता है और शहरों में शरण लेता है / और अगर ज्यादा उम्मीदवार न हुये तो उसे दिल्ली में काम मिल जता है ; जहाँ वो गोरों का मैला उठाता है ; अगर गुलाम सस्ते हों तो शौंचालयों का निर्माण अनावश्यक है "/

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(v) Economic Destruction of India ;

भारत की अर्थिक दुर्दशा राजनैतिक शोषण का अपरिहार्य परिणाम है /

एक समान्य यात्री भी कृषि की दुर्दशा ( जिस पर देश की 85 % जनता निर्भर है ) और किसानों की बदहाली को समझ सकता है /वो विदेशी निरंकुश शासकों के धान के खेतों मे नंगे बदन घूमते हिन्दू रैयत को देख सकता है , जिसकी एकमात्र पूंजी उसके कमर में बन्धी धोती है / 1915 मे भारत के सबसे धनी प्रान्त बंगाल के सांख्यकी विभाग ने एक स्वस्थ शरीर  के खेतिहार मजदूर की सालाना आय 3 . 60 डोलर प्रतिमाह गणना की / उसकी झोपदी फूस की बनी है जिसमे दीवार भी नहीं है , या फिर कच्चे घर हैं जिसकी छत घास फूस की मदद से तैयार किए गए हैं / छ लोंगों के परिवार के पूर घर के लोगों की बर्तन भाडा , कपड़ा लत्ता फर्नीचर आदी को मिलाकर सबकी कीमत 10 डोलर से ज्यादा न होगी / एक किसान अखबार पुस्तेकें , मनोरंजन या तम्बाकू शराब जैसे चीजों को हासिल करने का सामर्थ्य नहीं रखता / उसकी कमाई का आधा हिस्सा सरकार ले लेती है ; और यदी वह टैकस न चुका पाये तो सदियों से अर्जित उसकी और उसके परिवार की सम्पत्ति को सरकार कुर्की (confiscate) कर लेती है /

"अगर वो शौभाग्यशाली है तो वह over taxed जमीन को छोड़कर भाग जाता है और शहरों में शरण लेता है / और अगर ज्यादा उम्मीदवार न हुये तो उसे दिल्ली में काम मिल जता है ; जहाँ वो गोरों का मैला उठाता है ; अगर गुलाम सस्ते हों तो शौंचालयों का निर्माण अनावश्यक है "/ या फिर वो फैक्टरी मे जा सकता है , जहाँ वो अगर शौभाग्यशाली हुवा तो भारत के 1,409,000 (14 लाख 9000) लोगों में से एक हो सकता है / (नोट - ये उस समय फैक्टरियों मे अजीविका प्राप्त लोगों की संख्या है ) / उसको फैक्टरियों में भी जगह मिलना असान नहीं है क्योंकी इनमे 33% वर्कर महिलायें हैं और 8% बच्चे हैं / खदानों मे रोजगार प्राप्त लोगों मे 34% महिलायें है जिनमे से आधों को जमीन के नीचे काम करना पड़ता है ; और इन खदानों में 16% वर्कर बच्चे हैं /


Will Durant ; 1930 The Case For India पेज ३० - 31

noteनोट :: 1928 मे साइमोन्ड कमीसन इन factory वर्कर्स को अछूत मानने से इंकार करता है तो डॉ अंबेडकर उनको अछूत मनवाने की जिद पर अड़ जाते हैं / और अंततह ब्रिटिश सरकार की बुद्धि खुलती है कि हिन्दू समाज को बांटने और राष्ट्रीय आंदोलन तथा गांधी को कमजोर करने का तत्व तो भारत मे विद्यमान है / तो 1931 मे दूसरे गोल मेज सम्मेलन मे गांधी के साथ अल्पसंख्यकों के नेताओं को भी आमंत्रित करता है , और 1921 की जनगणना मे घोसीट किए गए दलितों के प्रतिनिधि के रूप मे डॉ अंबेडकर को चारा को चारा डालता है / और 1932 मे अलग निर्वाचक वर्ग की घोसना करता है ; जो 1947 मे भारत विभाजन का आधार बनता  है ; और आज भी भारत बिखण्डन का आधार बना हुआ है / 

इतिहास के पन्नों से : Will Durant 1930 ; The Case For India

Will Durant दुनिया के सबसे मशहूर लेखको मे से हैं जिनहोने History of Civilization नाम की पुस्तक 10 वॉल्यूम मे लिखी हैं / एक अमेरीकन व्यक्ति जब भारत के निर्धनता और ब्रिटिश लूट के कारण बेरोजगार हुये करोनो लोगों की दुर्दशा के मूल कारणो की खोज मे लगा था और 1930 मे भारत का पक्ष दुनिया के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा था , वहीं डॉ अंबेडकर जैसे लोग साइमन कमिशन की गोंद मे बैठ कर भारत की जड़ खोदने का काम कर रहे थे / और 1931 मे अंततः डॉ अंबेडकर के बयानों के आधार पर अंबेडकर को गांधी और काँग्रेस के खिलाफ खड़ा करके दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन मे अंग्रेज़ माइनॉरिटी को अलग एलेक्टोरेट देने की शजिश रचते हैं जो अंततः 1947 मे देश के बँटवारे का आधार बनता है, और अंबेडकर को communal अवार्ड दिया जाता है / 
वही अंबेडकर आज भारत के अभिशाप की तरह पुनः खड़े हैं जिनके फर्जी साहित्य को आधार बना कर ईसाई मिशरिया देश मे धर्म परिवर्तन का जिहाद छेड़े हुये हैं /

 इतिहास के पन्नों से :
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आधुनिक भारत के समाज की विषमताओं का कारण यूरोपीय ईसाई समुद्री लुटेरे , खास तौर पर ब्रिटिश ऑफिसर और ईसाई मिशनरियों ने ; भारत पर अपने दैवीय शासन ( Providance to rule ; Whitemen's burden to rule) को जस्टिफाई करने को ; और ईसाइयत को सच्चा धर्म साबित करने के लिए 1900 के आस पास , जब भारत की जीडीपी धरातल में घुस गयी थी ; और 700 % मैन्युफैक्चरर बेघर बेरोजगार हो गए थे ; तो करोणों लोगों की इस कंगाली और दुर्दशा  के लिए भारतीय रीत रिवाजों  को अंधविस्वास की संज्ञा देकर और वेद और स्मृतियतों को  इस विशाल जनसमूह के दारिद्र्य का जिम्मेदार ठहराया ; और ईसाइयत को ग्लोरिफ़ी करने के लिए तात्कालिक परिस्थिति के लिये संस्कृत ग्रंथों के उद्धरण ( बिना सन्दर्भ और प्रसंगों के) उद्धृत कर उनको इस स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया।

स्वतंत्रता के पूर्व और बाद में वामपंथी लेखकों ने , डॉ आंबेडकर जैसे विद्वान अर्थशाष्त्री ने , और अब उस गैंग में शामिल दलित चिंतक तथा ईसाई दलाल जो अपने को दलित हितैषी बताते हैं ; उसी लेखन और साहित्य को आज भी आगे बढ़ा रहे हैं ।
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लेकिन सच्चाई इससे कत्तई भिन्न है ।


Will Durant
जैसा  विश्वप्रसिद्ध लेखक क्या लिखता है इस विशाल जनसमुद्र की कंगाली और भुखमरी के बारे में 1930 में : एक उद्धरन पेश है :------

( नोट- ज्ञातव्य हो कि Caste की scheduling 1936 में होती है ; oppressed Class Of India Act और Government of India Act 1935 के तहत।)

" ऐसी सरकार ( ब्रिटिश) जो भारत के प्रति नहीं बल्कि इंग्लैंड के प्रति जबावदेह हो , तो टैक्सेशन के अधिकार का असीमित प्रयोग किया जा सकता है ।अंग्रेजों के आने के पूर्व जमीन प्राइवेट प्रॉपर्टी हुवा करती थी , लेकिन सरकार ने इस पर मालिकाना कब्जा जमाया और इसके एवज में उत्पाद का पांचवा हिस्सा जमीन के टैक्स के रूप में वसूलने लगी।
पूर्व में कई स्थानों पर पैदावार का आधा , और कुछ जगहों पर तो पैदावार से भी ज्यादा ; सामान्यतायाः अंग्रेजी शासन की तुलना में पूर्व में लगने वाले टैक्स के दुगुना या तिगुना टैक्स वसूली की गयी। सर्कार के पास नमक मैन्युफैक्चरिंग का एकाधिकार है , जिसके ऊपर प्रति pound पर आधा cent का सेल्स टैक्स लगाया जाता है।
जब हमें स्मरण होता है कि भारत में एवरेज सालाना इनकम (प्रति व्यक्ति ) 33 डॉलर थी ; और फिर एक मिशनरी अख़बार जिसका नाम India Witness था , उसका निर्णय स्मरण आता है कि -" ये मानना ज्यादा उचित होगा कि 10 करोड़ भारतियों की एवरेज सालाना आय प्रतिव्यक्ति 5 डॉलर से ज्यादा नहीं है "। तब ये बात समझ में आती है कि ये टैक्स कितने दमनकारी थे , और ये कितने असंख्य हिंदुओं के बर्बादी और दुर्दशा के लिए जिम्मेदार थे "।
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नोट : अभी इतने लेख पर विचार करें ।
आगे भी इसको लिखूंगा।
लेकिन एक बात समझें : 1928 में डॉ आंबेडकर साइमन कमीशन के सामने पेश होकर जिस तरह से सामान्य मिल मजदूरों के अछूत होने की   पैरोकारी करते हैं , उससे उस कमीशन का ब्रिटिश अधिकारी भी असहमत है। वो अधिकारी भारतीय उदयोग के manufacturers , जो भारतीय उद्योगों के नष्ट होने के कारण मिलों में काम कर के जीवन यापन करने को मजबूर हुए , उनको अछूत मानने से इंकार कर रहा है ,जबकि डॉ आंबेडकर उन मिल मजदूरों को अछूत सिद्ध करने को कटिबद्ध प्रतीत होते हैं ।

ये वही साइमन कमीशन है जिसका विरोध पूरे भारत में हुवा था , और उसी का विरोध करते हुए लाला लाजपत राय , पंजाब केशरी पुलिस की लाठी खाकर शहीद हुए थे ।

1931 के गोलमेज सम्मेलन में ब्रिटेन में डॉ आंबेडकर गांधी के बगल बैठकर अंग्रेजो द्वारा इन्ही बेरोजगार बेघर किये गए लोगों के लिए अलग electorate निर्वाचक वर्ग  की मांग कर रहे थे रानी विक्टोरिया से।लेकिन उनको शायद ये नहीं पता था कि इस तरह वो अंग्रेजों के ' बांटो और राज्य करो ' की नीति के बिछाए हुये जाल मे फंस रहे हैं / यही गोलमेज़ सम्मेलन और अलग निर्वाचक वर्ग , भारत पाकिस्तान के बँटवारे की नींव रखता है , और आज  के "ब्रेकिंग इंडिया फोर्सेस" की पृष्ठीभूमि तैयार करता है /

डॉ आंबेडकर जैसा महान भारतीय अर्थशास्त्री जब इन 10 करोड़ भारतीय लोगों की दुर्दशा का कारन जब मिथकीय वेदों और स्मृतियों में खोज रहा था , उसी समयकाल 1930 में एक विदेशी अमेरिकन Will Durant इस विशाल जनसमुद्र की कंगाली और दुर्दशा की समस्या की जड़ को तथ्यों के साथ खोज रहा था।


दुर्भागय ये है कि आज तक भारत का इतिहास लिखने वाले या तो मूर्ख हैं या फिर कुटिल खड्यंत्रकारी , जो इन तथ्यों को अभी तक दबा कर बैठे हुए हैं ।

How Terrorism can be uprooted in Kashmir

ये हैं वशीर चचा । नैनीताल के हॉर्स राइडिंग पॉइंट पर 350 घोडो पर यात्रियों को बैठाकर ऊपर टाफिन टॉप टाइगर पॉइंट और दुरोथी सीट की यात्रा करवाने वाले लोगों में से एक।
यहाँ का ये पूरा कारोबार पूरी तरह मुसलमान भाइयों के हाँथ में है कई पुश्तों से।
व्यक्तिगत वार्तालाप से पता चला कि इनकी अनुमानित आय 25 से 30 हजार प्रतिमाह होगी।उन्होने कई जगहेँ भी रास्ते में दिखाई, जहाँ नई पुराणी हिट फिल्मो की सूटिंग भी हुई थी।
अब सोचिये कश्मीर के बारे में इसी विंदू और विचार से।
धरती के स्वर्ग को , जब पाकिस्तान के मुल्लों और वहां की सरकार ने, बीच के दलाल पैदा किये, जिन्होंने अपने लिये कश्मीर की अस्मिता उसकी टूरिस्ट व्यवसाय और आम आदमी की रोजी रोटी को इस्लाम की भेंट चढ़ा दिया ।
और वहां के लोगों ने अपने ही पड़ोसियों को 20 - 25 साल पहले अपने घर से बेघर कर मार कर भगा दिया और हत्याए कर दीं।
उसके बाद उनकी गरीबी दूर करने की बात करते हो ?
कैसे करोगे ?
अपनी जड़ पे कुल्हाड़ी तो खुद ही मारे हैं ।
इनको ये बात अगर समझ में आ जाय । घाटी में शांति स्थापित हो जाय।
टूरिस्ट को भरोसा हो जाय तो कश्मीर में जहाँ न जाने कितनी फिल्मों की सूटिंग हुई है , फिर से स्वर्ग हो जाय और वहां के नवयुवक को रोजगार का एक मार्ग दिखने लगे।
कश्मीर की चिंता में डूबे लोगों को सोचना पड़ेगा।

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" ढोल गवाँर शूद्र पशु नारी/ सकल ताड़ना के अधिकारी "

" ढोल गवाँर शूद्र पशु नारी/ सकल ताड़ना के अधिकारी " को आधार बनाकर तुलसीदास की अस्मिता पर प्रश्न उठाने वाले, मूर्ख जाहिल उनपढ़ समाजद्रोही दलितचिंतकों और वामपंथियों को चुनौती :

पिछ्ले  कुछ  वर्षों मे स्वघोषित विद्वानों ने तुलसी दास जैसे महानायक के एक चौपाई की भ्रष्ट , कुंठित और शाजिसपूर्ण व्याख्या करके उनको बदनाम किया /
 उसके दो कारण हैं एक तो भारत की संस्कृति और धर्म पर प्रश्न चिन्ह लगाना , और दूसरे वामपंथी ईसाई दलित और मुस्लिम गंठजोड़ का आधार तैयार करके राजनैतिक शाजिस के तहत सत्ता पर काबिज होना और अपनी तिजोरी भरना , तीसरा इस्साइयत मे धर्म परिवर्तन के लिये तर्क गाँठना /

इसके दो जबाव है :
(१) इन लोगों ने हनुमान प्रसाद पोद्दार की टीका पर आधारित "रामचरित माणस" से ये दोहा न पढ़कर , किसी ईसाई या वामपंथी विद्वान द्वारा व्याख्या किये गये मानस से पढ़ा होगा , क्योंकि मोहन पोद्दार ने सॉफ साफ लिखा है - " कि ढोल, गवाँर शूद्र पशु और नारी - ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं / " यानी ताड़ना माने शिक्षा देना / 


यही काम डॉक्टर आम्बेडकर ने किया था , झोला छाप ईसाई संस्कृतगयों द्वारा " ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट" पढ़कर संस्कृत में रचित वेद पुराण आरण्यक उपनिषद और श्रुति स्मृति सबका ज्ञान प्राप्त कर लिया था /

(२) आप सबको पता है कि जब भी कोई कविता कि व्याख्या पढ़ी या पढ़ाई जाती थी तो हमेशा संदर्भ ही नहीं , प्रसंग सहित व्याख्या की जाती थी क्योंकि आलूबेरनी तक ने कहा था कि संस्कृत शब्दों का अर्थ बिना संदर्भ और प्रसंग के समझना मुश्किल है /

ये चौपाई तुलसीदास ने समुद्र के मुह से उसके खुद के लिए कहलवाई है जब लाख विनय के बाद वो रामचंद्रा जी को लंका प्रस्थान के लिए रास्ता नहीं देता , और राम जी तब बोलते हैं -
 " विनय न मानति जलद जड़ गए तीन दिन बीति /
बोले राम सकोप तब भाय बिन होय न प्रीति "
रामचन्द्रजी तब लक्ष्मण को आदेश देते हैं
लछिमन बान सरासन आनू / सोखहु वारिधि बिशिख कृशानु //
सठ सन विनय कुटिल सन प्रीती / सहज कृपन सन सुंदर नीती //
ममता रत सन ज्ञान कहानी  / अति लोभी सन विरत बखानी //
क्रोधहि सम कामहि हरिकथा / ऊसर बीज बयेँ फल जथा //
अस कहि रघुपति चांप चढ़ावा / यह मत लछिमन के मन भावा //
संधानेहु प्रभु बिसिख कराला / उठी उदधि उर अंतर ज्वाला //
मकर उरग झष गन अकुलाने / जरत जन्तु जलनिधि जब जाने //
कनक थार भरि मनि गन नाना / विप्र रूप आयहु तजि माना //
.............
........

प्रभु भल कीन्हि मोहिं सिख दीन्हीं / मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं //
ढ़ोल गवांर शूद्र पशु नारी /  सकल ताड़ना के अधिकारी //

समुद्र खुद कह रहा है कि अच्छा हुआ आपने मुझे सिख / सीख/ शिक्षा दिया /


तो इन विद्वानों को मेरी चुनौती है कि आइये अपने तर्क प्रस्तुत कीजिये कि इस चौपाई को तुलसीदास ने समाज के लिये प्रस्तुत किया था, या किसी और ने अपने लिये किया था ? और किया था तो किस संदर्भ और प्रसंग में ? तीसरे ताड़ना का अर्थ क्या प्रताड़ना होता है ????
क्योंकि तुलसीदास ने खुद लिखा हैं :---
"काम क्रोध मद लोभ की जब तक मन में खान /
तब तक पण्डित मूर्खहु तुलसी एक समान " //
आओ आयेज बढ़ो चुनौती स्वीकार करो /
संस्कृत में एक श्लोक है।
" लालनात बहवः दोषः
ताड़नात बहवः गुणाः
तदस्मात शिष्यह् च पुत्रः च
ताड़नात न तु लालनात।।"

अर्थात - लाड़  प्यार मे  अनेक दोष  हैं और शिकशा मे  अनेक गुण, इसलिए  पुत्र और शिष्य  को शिक्षित करना  चाहिए , न  कि लाड़  प्यार  से  बिगाणना चाहिए /

एक और उद्धरण -
लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताड़येत्
प्राप्तेशु षोड़शे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत्। (मित्रः इवः आचरेत्)
भावार्थ - पांच वर्ष का होने तक लाड़-प्यार करो, दस वर्ष का होने तक डांटां-फटकारा जा सकता है। किन्तु सोलह वर्ष का हो जाने के बाद पुत्र मित्र के समान हो जाता है, माने उससे मित्रवत् व्यवहार करना चाहिए।

एक बात और यहाँ ताड़ना शब्द मे श्लेष अलंकार है / यानि एक शब्द के कई अर्थ  होते हैं / जैसे नीचे देखें :
चरण धरत चिंता करत चितवत चरहुन ओर /
सुबरन को खोजत फिरत कवि व्यभिचारी चोर //

सुबरन के यहाँ तीन अर्थ हैं - कवि के सुंदर वर्ण अर्थात अक्षर , व्यभिचारी के सुंदर वर्ण / रंग की नारी , और चोर के लिए सोना या स्वर्ण /  

एक दूसरा  व्यावहारिक तरीका :  कोई भी रचनाकार  जब पात्रों की रचना  करता  है तो उस पात्र के चेतना  आचार  और व्यहार  के  अनुकूल ही  उनके मुख से संवाद प्रेषित करवाता है, और  यही   नित प्रति  के व्योहार  मे भी परिलक्षित  होता  है: 
यथा यदि   कोई अशिशित  और  कुजात  तथा  हीन  कुल  परिवार  का व्यक्ति  रोज  शराब  पीकर  घर  मे कलह करता हो - तो उसकी  राय  अगर  पूंछेंगे तो  शायद  जो  वांपिशाच समझते  हैं , वैसी  ही  राय व्यक्त  करे /  तो  समुद्र  खुद को  जड़  मूर्ख  बोलकर  समाज के बारे मे  यह राय  रख रहा है /  यही  बात  यदि  रामचन्द्र  जी  के मुह  से , या  सूत्रधार के रूप मे  तुलसीदास ने लिखी  होती तो  उनकी राय माना जा सकता था /

एक अन्य उदाहरण - जब कृष्ण  अपने  समधी  दुर्योधन  को  पांडवों के लिए  5 गाव भी  दिलवा  पाने मे  सक्षम  नहीं होते तो कहते हैं कि - राजन ये  बहुत  बड़ा अधर्म  है /
तो दुर्योधन कहता है - जानामि धर्मह  न मे  प्रवृत्ति , जानामि  अधर्मह  न च  निवृत्तिह / 
अर्थात - मैं धर्म को जानता हूँ परंतु मेरी प्रवृत्ति ही नहीं है  धर्म की ओर , और  मैं  यह भी जानता  हू कि  अधर्म  क्या है , परंतु  अब  मैं उससे  निवृत्त  नहीं कर सकता  खुद को /
यदि इसी श्लोक को बिना  संदर्भ प्रसंग के  #मरकटियों की  तरह  इसका  वेद व्यास  की  राय मान लिया जाय तो  अनर्थ नहीं होगा क्या ?

पुनश्च : महान  शेकसपीयर  ने  एक  नाटक  लिखा है  - "merchant of Venis" - जिसमे  ईसाई  व्यवसायी  अपने यहूदी  दास  को यहूदी  होने के  नाते भेदभाव करता है , और उसको धमकाता है कि  उसने ऋण  न  चुकाया तो  वह  उसके शरीर  से उस  पैसे  के मूल्य  के बराबर मांस निकाल लेगा /
तो क्या शेक्सपीयर  को  नश्ल्वादी  मान  लिया  जाय ?
या होली  बाइबल के  प्रसंग के  अनुसार  इसाइयों की इस भावना  का निरूपण  माना जाय कि  इसाइयों के मन मे यहूदियों के प्रति  घृणा  जीसस के शूली  चढ़वाने  मे  यहूदियों के  हाथ  होने के कारण  यूरोप  मे हजारो  साल  की  पीढ़ी  दर  पीढ़ी  चली आ रही  नफरत है , जोकि  उस समयकाल  मे  काफी तीव्र थी , जिसकी निर्णायक परिणति दूसरे विश्वयुद्ध  मे  यूरोप  के इसाइयों के  हानथो 60  लाख  यहूदियों के  खून मे  होती है ?