Tuesday, 4 November 2014

"शूद्र कौन थे"- डॉ आंबेडकर के थेसिस का खंडन -Part- 21 अंबेडकर की थेसिस तथ्यों पर नहीं बल्कि कपोल कल्पना पर आधारित है/ कैसे ?

 कौटिल्य का नाम ,एक महान राजनीतिज्ञ के नाम पर दर्ज हैं ,,भारतीय इतिहास के पन्नों में / और उनकी दण्डनीति ,, आज शासन नीति के नाम से जाना जाता है / वे राज्य के नियमों का कड़ाई से पालन करवाते थे / चन्द्र गुप्त के समय भारत एक संपन्न राष्ट्र था लेकिन खुद कुटिया में रहते थे ,,एक दरिद्र ब्राम्हण की तरह // यानी अपरिग्रह ही उनकी जीवन शैली थी / शायद तभी से " दरिद्र ब्राम्हण " जैसे शब्दों की नीवं पड़ी होगी / इसी को ब्रम्हानिस्म कहते हैं /
अगर ग्रन्थों  में उद्धृत -"जन्मना जायते शूद्रः ,,संस्कारात द्विजः भवति " ,,के महाभारत काल से कौटिल्य के समय काल तक कौटिल्य की दण्डनीति का एक भाग रहा -- कि जन्म से कार्य निर्धारित नहीं होता ,,बल्कि स्वभाव से होता है जैसा कि इस श्लोक में वर्णित है -- कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "
अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /( जिससे हर व्यक्ति अपने स्वधर्म का पालन कर समाज मे योगदान दे / स्वधर्म:  यानि  व्यक्ति के  अंदर निहित उसकी प्रवृत्ति,  innate nature , aptitude / आज  पुनः नौकरियों हेतु  एप्टिट्यूड टेस्ट होता है , और लोग हजारो रुपये खर्च कर अपने बच्चे का एप्टिट्यूड टेस्ट करवाते हैं कि उसको किस फील्ड मे आगे बढ्ने के लिए प्रेरित किया जाय , शिक्षण प्रशिक्षण दिलवाया जाय )


अगर इसको तर्क की कसौटी पर कसें और सावधानी पूर्वक विचार करे तो शायद ये परंपरा इस्लामिक आक्रमण और उसके भारत में आधार जमाने और उनके साम्राज्य स्थापित होने तक , जन्मना जायते शूद्र संस्कारत द्विजः भवति का सिद्धांत और परंपरा का पालन हिन्दू समाज का अनिवार्य अंग होना चाहिए/ 


और इसी तर्क की कसौटी पर कौटिल्य के दूसरी दण्डनीति ---" जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , और महिला मातहतों को अनुचित दंड दे ,उसके सतीत्व को नष्ट करे ,नग्न अवस्था में उनके पास जाय, या नंगा कराकर अपने पास बुलाये तो उसके धन जब्त कर लिया जाय / है / "


तीसरा अधिकरण --दासकर्मकरकल्पम् }----- को कसा जाय तो कदाचित आप पाएंगे -- की मल प्रच्छालन भंगी ,मेहतर हेला लालबेगी और अछूत जैसी परंपरा का भी आगमन ------इस्लामिक शासन का ,भारत के समाज को उपहार स्वरुप भेंट होनी चाहिए /

  इसलिए अछूत और शूद्रों की दुर्दशा के कारण  को यदि डॉ आंबेडकर ने, भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक विरासत में खोजने की कोशिश की होती तो ज्यादा समसामयिक होता / और शायद सही नतीजे पर पहुँच सकते थे / और देश के अंदर सुलगती घृणा का दानव न पैदा होता जिसके आग मे लोग सत्ता की रोटी सेंक रहे हैं /
भाषा की अज्ञानता ने उनको कहाँ ले जाकर खड़ा किया / 

आज जब हम नित नए तथ्यों से वाकिफ हो रहे हैं कि भारत की जीडीपी ,समस्त विश्व की जीडीपी का 25  प्रतिशत के आसपास पिछले २००० साल ( और शायद उससे ज्यादा भी ,क्योंकि अँगुस मैडिसन ने 0 AD से  2000  AD तक की ही खोज की है ) से 1750  तक लगातार बनी हुई थी /


 ये अकेले इकोनॉमिस्ट नहीं है ,जिन्होंने ये खोज की है ,एक बेल्जियन इकोनॉमिस्ट पॉल बरोिच भी 1980  के आस पास इसी नतीजे पर पहुंचे थे , जिसका वर्णन पॉल कैनेडी ने अपनी पुस्तक "राइज एंड फॉल ऑफ़ ग्रेट पावर्स" जैक गोल्ड्स्टोन "व्हाई यूरोप -राइज ऑफ़ थे वेस्ट इन वर्ल्ड हिस्ट्री 1500-1850 " में यही बात कहते हैं, जोकि 2004 मे प्रकाशित हुयी है /
 वही एकोनोमिस्ट  ये भी बताते हैं कि  1750   अमेरिका और ब्रिटेन दोनों मिलकर  विश्व की जीडीपी का मात्र २ प्रतिशत जीडीपी उत्पादित करते थे /

ब्रिटिश की शोषणकारी नीतियों के चलते 1900  आते आते ,, भारत का ट्रेडिशनल घरेलू उद्योग धराशायी हो जाता है / 1900  में जब भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी ) ,मात्र २ प्रतिशत बचती है / 87.5 प्रतिशत लोग ,जो की कौटिल्य के शूद्र की परिभाषा के अनुसार --शुश्रूषा ,वार्ता ( खेती व्यापर ,खनिज उद्योग ) और कारकुशीलव ( टेचनोक्रट्स ,स्वरोजगार करने वाले ,  इंजीनियर ) बेरोजगार और बेघर हो जाते हैं तो उनकी दरिद्रता को अगर इकोनॉमिस्ट डॉ आंबेडकर ने भारत के आर्थिक इतिहास से जोड़ा होता और  उन्हे संस्कृत का ज्ञान होता तो कौटिल्य का अर्थशाश्त्र (एक अर्थशास्त्री की पहली पसंद होती है) पढ़ा होता तो शायद उस नतीजे पर न पहुंचते जहाँ वे पहुंचे /


उसी जगह गांधीं ने बीमारी की जड़ को पकड़ा ,,घर घर खादी के कपड़ों की चरखी चलवाने का आह्वान किया और गाडी को पटरी पर वापस लाने की कोशिश की / लेकिन गांधी शायद बहुत देर से भारत में पैदा हुए इसलिए गाडी पटरी पर वापस लाने में इतना समय लग गया / 65  साल का भारत का इतिहास गवाह है कि आज ब्रिटेन और अमेरिका भारत के कदमों में झुकाने को बेताब है तो 1900 -1946  की विशाल जनसमूह की दरिद्रता का कारन खोजने के लिए ,डॉ आंबेडकर की प्रागैतिहासिक शास्त्रों की यात्रा कोई सार्थक यात्रा प्रतीत नहीं होती /


 डॉ आंबेडकर ने ,,अपनी पुस्तक शूद्र कौन है ?? मे सारे ब्रम्हानिक ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद कुछ निष्कर्ष निकाले थे ,,अपनी नयी थीसिस को सिद्ध करने के पूर्व ,उनमें से कुछेक महत्वपूर्ण विन्दुओं पर विमर्श 

(१)शूद्रों को समाज में सबसे निचला दर्जा और अ
पवित्र - डॉ अंबेडकर 


इसको तो अम्बेडकर जी ने खुद ही खंडन किया है, जब वो शूद्र रत्नी  का जिक्र करते हैं , राजा के सार्वभौमिकता के सन्दर्भ में , युधिस्ठिर को भीष्म के द्वारा राजनीती की शिक्षा दिए जाने के संदर्भ में / दूसरे इसका उल्लेख कौटिल्य के अर्थ शाश्त्र में भी नहीं है / कौटिल्य ने तो शूद्रो की सेना को , तो ब्राम्हणों की सेना से ज्यादा तेजोमय बताया है /डॉ बुचनन जब 1807  में तुलवा प्रदेश के निवासियों का वर्णन करते हैं ,,तो बंटर्स के बारे में ,वे कहते हैं ..बंटर्स पवित्र शूद्र के वंशज है /

तवेर्निएर ने 360 साल पूर्व कौटिल्य की बात का समर्थन करते हुये लिखा कि - " शूद्र पदाति योद्धा थे जिंका सम्मान और आत्म गौरव समाज और युद्ध के मैदान मे क्षत्रियों जैसा ही हुआ करता था / कौटिल्य और चन्द्रगुप्त मौर्य के पूर्व मगध का राजा महानन्द शूद्र कुल से था /
इसका मतलब शूद्र समाज के निचले पायदान पर ,,और अपवित्र कम से कम 1807 तक तो नहीं हुवा था , और शूद्र होना भी उतना ही सम्मानित था  जितना बाकी वर्णों का /


(मेरी पहुँच वेदों तक और सतपत ब्राम्हण या अन्य ग्रंथों तक नहीं है )


  (२) शूद्रों को ज्ञान तो कत्तई नहीं प्राप्त करना चाहिए ,,और उनको शिक्षा देना पाप ही नहीं अपराध भी है - डॉ आंबेडकर /
कौटिल्य ने शूद्रों के धर्म को परिभाषित करते हुए दण्डनीति (शासन नीति) में प्रतिपादित किया कि - "शूद्रस्य द्विजातशुश्रूषा वार्ता कारकुशी
लवकर्म " -- यानि द्विज की शुश्रूषा ,वार्ता और कार्यकुशीलव /
कृषि ,पशुपालन और व्यापार ये वार्ता विद्या के अंग है / यह विद्या ,धन धान्य पशु ,हिरण्य ,हिरण्य ताम्र आदि खनिज पदार्थ के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।
कार्यकुशील यानि शिल्पशास्त्र गायन वादन आदि के बारे में ज्ञान प्राप्त करना ।


एक गाँधीवादी धरमपाल अपनी पुस्तक -The Beautiful Tree में लिखते हैं कि  1820 - 1830 में अंग्रेजों द्वारा कराये गए सर्वे में प्राप्त डाटा के अनुसार स्कूल जाने वाले शूद्र छात्रों की संख्या ,ब्राम्हणों छात्रों से चार गुना थी ।


अब मैकाले का प्रवेश भारतीय शिक्क्षा जगत में 1835 में होती है । इससे दो निष्कर्ष निकलते है -
(१) कौटिल्य के बाद और मैकाले के आने के पूर्व शूद्रो को शिक्षा प्राप्त करने और ज्ञान प्राप्त करने का पूरा अधिकार था ।
(२) वापस पलट के देखिये भारत के आर्थिक इतिहास पर । 1750 में भारत विश्व जीडीपी का 25% शेयर होल्डर और 1900 में मात्र 2% का शेयर होल्डर , और 87.5 % लोग जो एक्सपोर्ट क्वालिटी घरेलू उत्पाद की रीढ़ थे बेरोजगार बेघर और दरिद्र ।गणेश सखाराम देउसकर और Will Durant ने अपनी पुस्तकों , " देश कि कथा  "(1904) और "The Case For India " (1930) मे 1875 से 1900 के बीच 2.5 करोड़ भारतीयों अर्थात तत्कालीन आबादी का दसवें हिस्से की अन्न के अभाव मे मौत के मुह  मे समा  जाने की बात का विस्तृत वर्णन करते हैं / और ऐसा नहीं था कि अन्न का अभाव था , सिर्फ उनके जेबों मे अन्न खरीदने का पैसा नहीं था /


अब ये अपर जनसमूह जो जैसे तैसे अपने प्राणों की रक्षा करने मे सक्षम रहा , वो अपने सर के लिए छाया और पेट के लिए रोटी की जद्दोजहद करेगा , कि बच्चो की शिक्षा के लिए ??


दलित शोषित शिक्षा से वंचित । लेकिन क्या ब्रम्हानिस्म की वजह से ?


 डॉ आंबेडकर ने जिन धर्म ग्रंथों को यूरोपियन संस्कृतज्ञों द्वारा अनुवादित, अनुवादों के अनुवादों को कॉपी एंड पेस्ट ( कॉपी एंड पेस्ट इसलिए कह रहा हूँ क्योकि  उन्होंने खुद अपनी पुस्तक में कई जगहों पर वर्णों को caste के नाम से ही सम्बोधित किया है , और ये कहना कि डॉ आंबेडकर इतने अल्पज्ञ थे कि वर्ण और caste का फर्क नहीं समझते थे  उनका अपमान होगा ) किया है /उन ग्रंथो तक तो मेरी पहुँच नहीं है इसलिए उनके कॉपी और पेस्ट किये गए quotations को  उचित या अनुचित करार देना मेरे लिए उचित नहीं है / लेकिन जिन संस्कृतज्ञों को उन्होंने अपने लेखन का आधार बनाया है ,उन तक तो हम पहुँच ही सकते हैं / इसलिए ये साबित करना सरल हो जाएगा ,कि ये संस्कृतज्ञ पूर्वाग्रह से से ग्रस्त तो नहीं थे या इनके उद्देश्य अकादमिक न होकर अपने ईसाई धर्म को हिन्दू धर्म की तुलना में ज्यादा महान साबित करना था या ईसाइयत को फैलाना था ? / और फिर ये समझना भी आसान हो जाता है कि इन संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानों ने संस्कृत ग्रंथों को तोड़ मरोड़ कर तो नहीं पेश किया , या उनको संस्कृत केर समझ ही नहीं थी /
फिलहाल आपके प्रश्न को संज्ञान में लेने के पूर्व डॉ आंबेडकर के हिन्दू धर्मो के ग्रंथों से निकाले गए दो और निष्कर्षों की चर्चा करता हूँ /

  (३) ..शूद्रं को संपत्ति का अधिकार नहीं है --डॉ आंबेडकर /

-- इस प्रश्न का उत्तर मेरे पहले लिखे गए कमेंट्स में है -

 ( १) कम से कम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में तो ये वर्णित नहीं है दूसरा आंबेडकर जी की  पुस्तक में भी लिखा है कि शूद्र सार्वभौमिक राजाओं के रतनी हुवा करते थे / और उन्होंने ये भी लिखा है कि भीष्म ने युधिस्ठिर को राजनीति  का पाठ पढ़ते हुए ये कहा कि मंत्रिमंडल में , कम से कम ३ शूद्र मंत्री होने चाहिए /

(२) डॉ बुचनन ने 1807 में प्रकशित अपनी पुस्तक में लिखा है कि -" यद्यपि तलुवा के ब्राम्हण ये कहते है कि यहाँ कि धरती के सच्चे मालिक वही हैं क्योंकि परशुराम ने ये धरती उनके लिए खोजी थी ,,लेकिन यहाँ पर ज्यादातर जमीनों के मालिक शूद्र है / और ब्राम्हणों का ये क्लेम ,,न तो वर्तमान कि सच्चाई है ,,और न भविष्य में कोई संभावना दिखती है /
(3) बूचनान ने ये भी लिखा है कि जब गोवा मे पुर्तगाल के शासक का ये कट्टर आदेश आया कि यहाँ के सारे हिन्दुओ को ईसाई बना दिया जाय , तो गोवा का गोवेर्नर बहुत उदार हृदय था , जिसने वहाँ के लोगो को 10 दिन का समय दिया कि आप लोग चाहे तो अपनी चल संपत्ति लेकर प्रदेश छोड़कर जा सकते है , और इस तरह से धर्म परिवर्तन से बच सकते हैं - तो गोवा के धनी ब्रामहन और शूद्र गोवा को छोडकर कोकण मे आ बसे , बाकी जो लोग नहीं भाग पाये उनका इसाइयत मे जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन कर दिया गया /
(४) शूद्रों को उपनयन यानि जनेऊ संस्कार का अधिकार नहीं है , डॉ आंबेडकर /


-- इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए ,,अओको किसी ग्रन्थ या बुचनन जैसे विद्वानों को उद्धृत करने कि जरूरत नहीं है / हालांकि अब तो तथकथित द्विजों ने भी जनेऊ पहनना बंद कर दिया है ,,लेकिन अपने गावं में मैंने खुद ,,तथाकथित menial शूद्र बुजुर्गों को जनेऊ धारण करते हुए देखा है / आप भी देखे होंगे / और नहीं देखे होंगे तो ,,मई जब अपने गावं जाऊँगा अगले सप्ताह तो कइयों के फोटो खींच कर यही पर पोस्ट कर दूंगा / ( काश डॉ आंबेडकर ने गांधी कि तरह २- ३ साल गावों कि ओर रुख किया होता , राजनीति में पैर रखने के पूर्व ,,तो वे इस भ्रमजाल के शिकार न बनते ) अभी कल कल ही मेरे वरिष्ठ  , डॉ  सुरेश मौर्य  ने बताया कि उनके ससुर नियम बद्ध  रूप से जनेऊ धारण करते  हैं/


अतः इस  निर्णय पर पहुँचना  बहुत  आसान  है कि  डॉ  अंबेडकर  भारत  के  बारे  मे  बहुत सतही  ज्ञान  रखते  थे , इसीलिए  फर्जी  कट्टर  ईसाई संस्कृतज्ञों  के  जाल मे फँसकर  अत्यंत  भ्रामक  निर्णय  पर  पहुंचे /
उनके  साथ  मुझे सुहानीभूति  है /



Friday, 31 October 2014

."शूद्र कौन थे"- डॉ आंबेडकर का आधार - तथ्य या मिथ -Part- 20 दलितचिंतन और जातिविमर्श::डॉ आंबेडकर, कहाँ फंसे ईसाई पादरियों के बिछाए जाल में /

नैचुरल जस्टिस क्या होता है ?समाज मे जो जितना सम्मानित और जिम्मेदार हो , उसको उसकी गलतियों के लिए उसी अनुपात मे दंड का प्रावधान हो / ये ब्रिटिश द्वारा बनाए कानूनी प्रक्रिया का अंग नहीं है , परंतु भारतीय परंपरा का अंग रहा है / गुलाम बनाना सनातन धर्म का अंग नहीं रहा कभी/ उसके लिये नैचुरल जस्टिस था / इस अपराध के लिए ब्रामहन को प्राण दंड/
 
"उदर दास को छोड़कर आर्यों के नाबालिग शूद्र वैश्य क्षत्रिय या ब्राम्हण को यदि उनके ही परिवार का कोई व्यक्ति बेंचे या गिरवी रखे तो उन पर क्रमशः बारह पण , चौबीश पण ,छत्तीश पण और अड़तालिश पण का दंड किया जाय / या  इन्ही नाबालिग शूद्र आदि को यदि कोई दूसरा व्यक्ति बेंचे या गिरवी रखे ,तो उक्त करम से उनको प्रथम ,माध्यम ,उत्तम साहस और प्राण बढ़ का दंड दिया जाय / यही दंड खरीददारों और इस मामले में गवाही देने वाले का भी किया जाय / " - कौटिल्य अर्थशास्त्रम
" जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , और महिला मातहतों को अनुचित दंड दे ,उसके सतीत्व को नष्ट करे ,नग्न अवस्था में उनके पास जाय, या नंगा कराकर अपने पास बुलाये तो उसके धन जब्त कर लिया जाय / यदि यही व्यवहार दाई (धात्री) परिचारिका , अर्धसीतिका ,,और उपचारिका से करवाया जाय तो उन्हें दासकार्य से मुक्त कराया जाय / यदि उच्चकुलुत्पन्न दास से उक्त कार्य करवाया जाय तो वह दासकर्म को छोड़कर जा सकता है / "--तीसरा अधिकरण --दासकर्मकरकल्पम्

" जो स्वामी अपने पुरुष मातहतों से मुर्दा , मलमूत्र या जूठन उठवावे , उसके धन जब्त कर लिया जाय--Kautiya

डॉ अंबेडकर ने जब राजनीति मे कदम रखा तो बहुसंख्यक जनता जो एक्सपोर्ट क्वालिटी मैनुफेक्चुरिंग करती थी , और जो छोटे कृषक थे , वे बेरोजगार और बेघर हो चुके थे / कार्ल मार्क्स के 1853 के लेख के अनुसार 1815 मे ढाका मे 150,000   वस्त्र निर्माता थे , जिनकी संख्या 1835 मे घटकर मात्र 20,000 बची / कहाँ गए 130,000 लोग और उनकी भावी वंशजे ? 
विल दुरान्त और गणेश सखाराम सेउसकर के अनुसार 1875 से 1900 के बीच 2.5 कारों अन्न के अभाव मे काल के गाल मे समा जाते है / ऐसा नहीं था कि अन्न कि कमी थी , उनके पास अन्न खरीदने के लिए धन ही नहीं था / शहरो से लोग गावों की ओर भागे जहां उनको शरण मिली / और गाव के किसान जमीन जब्त होने के पश्चात शहरो की ओर / विल दुरान्त के अनुसार - इनमे से कुछ को , 1930 तक कारखानो और खदानों मे कुल श्रमिकों की संख्या 14 लाख मात्र थी , उसका हिस्सा बनने का सौभाग्य प्रपट हुआ / बाकी बचे लोगों मे जो सौभाग्यशाली थे उनको गोरो का मैला उठाने का काम मिला , क्योंकि गुलाम अगर इतने सस्ते हो तो सौचालय बनवाने की मुसीबत कौन पाले /
जबकि अमिय कुमार बघची के हैमिल्टन बूचनान के हवाले से दिये गए आकडे के अनुसार 1809- 1813 के बीच मात्र पूर्णिया और भागलपुर से 6.5 लाख लोग परंपरागत व्यवसाय से विस्थापित हुये / अब आप पूरे देश मे सोचिए कितनी बड़ी संख्या मे लोग बेरोजगार हुये होंगे ?
लेकिन डॉ अंबेडकर ने कभी भी मूल श्रोतो की ओर नजर न डाली , न कौटिल्य को पढ़ा और न ही तात्कालिक स्थापित लेखको को / उनके श्रोत कौन थे ? तथा कथित संस्कृतज्ञ कट्टर ईसाई , जिनके संस्कृत के ज्ञान पर प्रश्ञ्चिंह खड़े हो रहे हैं , जिंका उद्देश्य ही इसाइयत को हिन्दू धर्म से श्रेष्ठ प्रमाणित करना था / 
डॉ अम्बेदकर ने जब "पुरुषसूक्ति" को आधार मानकर ,,वर्ण व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया / तो उनका ये निष्कर्ष कि ''चूंकि शूद्र उस विराट पुरुष के पैरों स
े पैंदा हुवा है , इसलिए 1900  के बाद भारत के एक बड़ा वर्ग " शूद्र" जैसे घृणित श्रेणी में ,,घृणित काम (Menial जॉब) करने के लिए मजबूर हुवा / और इसके पीछे ब्राम्हणो की शाजिश थी जिन्होंने धूर्ततापूर्वक ऋग्वेद के उस सूक्ति को एक क्षेपक के रूप मे जोड़ दिया (interpolation ) /
लेकिन फिर उसी सूक्ति से ये भी निकल के आता है कि उसी विराट पुरुष के पैरों से हिरण्यगर्भा धरती भी उत्पन्न हुई /

 
लेकिन सवाल ये है  कि जब डॉ अम्बेदकर ये कहते हैं कि उनकी इस हाइपोथिसिस पर इसलिए कोई प्रश्न चिंह नहीं लगा सकता क्योंकि वे संस्कृत नहीं जानते थे , क्योंकि जितने धर्मग्रन्थ थे सबका ,अनुवाद हो चुका है / तो फिर ये भी देखना चाहिए कि किन संस्कृतविदों के अनुवाद से उन्होंने अपनी थीसिस के लिए "मटेरियल एंड मेथड " लिए ? उन संस्कृतविदों की संस्कृतज्ञ होने के क्लेम में कितना दम है ?? और दूसरी बात ये है , की इन संस्कृतज्ञों के संस्कृत में रूचि का कारण अकादमिक था , कि कुछ इतर उद्देश्य थे ?? कम से कम इतना तो सभी मानेंगे कि ये विदेशी संस्कृतज्ञ भारत में फिलैंथ्रॉपी के उद्देश्य से तो नहीं ही आये थे ??
तो क्यों न उनकी जांच कर लिया जाय जिनके पुस्तकों से डॉ अम्बेदकर ने अपनी थेसिस के लिए "मटेरियल एंड मेथड " लिया था / क्या यह अप्रसांगिक है ??


 लेकिन आगे बढ़ने के पहले एक संक्षिप्त टिप्पड़ी ,,,, "भंगी " पर /
गांधी ने कहा कि अछूत ,भंगी और मलप्रक्षालन जैसी शर्मनाक कुव्यवस्था ,हिन्दू समाज और हिंदूइस्म के माथे पर एक कलंक है, जब तक हिन्दू समाज इस कलंक से अपने आपको मुक्त नहीं करता, हिन्दू धर्म अपने
 गौरव को पुनः प्राप्त नहीं कर पायेगा / गांधी जैसे घोर हिन्दू नेता , जब हिन्दुस्म को इस कलंक के लिए जिम्मेदार मान लेता है और प्रायश्चित स्वरुप स्वयं शौचालयों को साफ़ करने का बीड़ा उठाता है और अपनी पत्नी को ,,दक्षिण भारत में एक अछूत के सौचालय को साफ़ करने से इंकार करने के कारण , मध्य रात्रि में, घसीटते हुए घर के गेट तक घसीटते हुए ले जाता हैं ,,,और गुस्से से कहते हैं कि -" सुन लो ये घर मेरा है , और जो मेरे बनाये हुए नियमों का पालन नहीं करेगा उसको मेरे घर में रहने का कोई अधिकार नहीं है "/ ( लुइस फिशर - लाइफ ऑफ़ महात्मा गांधी ) 

 
गांधी जी जब इंग्लॅण्ड में बैरिस्टरी कि पढाई कर रहे थे , तो ब्रिटेन का कब्ज़ा लगभग पूरे विश्व पर था / उनका सूर्य डूबता ही नहीं था / तो ब्रिटिशर्स, और उनके "सत्य धर्म " (ईसाइयत) का अहंकार का सूर्य भी कि तरह दैदीप्यमान था / गांधी के पास इंग्लॅण्ड में निवास के दौरान ,ईसाइयत में धर्म परिवर्तन के लिए अनेकों बार आवेदन आया था / लेकिन उन्होंने ईसाई बनने से इंकार कर दिया / हालांकि कहीं हमने पढ़ा तो नहीं लेकिन लगता है कि हिन्दू धर्म न छोड़ने के लिए उनको उस समय भारत में प्रचलित अछूत और मल प्रच्छालन प्रथा के लिए उन्हें काफी जलील किया गया होगा जिसकी सफाई में बोलने के लिए ,, उनके पास कोई तर्क नहीं रहा होगा / यहाँ दो प्रश् उठते है-

 
(१) उन्होंने जब हिंदूइस्म को शुद्ध करने का वीड़ा उठाया तो उस जनसमूह को नाम दिया --" हरिजन " /

 
लेकिन हरिजन शब्द को भी अशुद्ध कर दिया उस समाज के चिंतकों ने स्वतंत्र भारत में / क्या तर्क --"हरिजन का मतलब जिसका जन्मदाता भगवान हो" . यानी जिसके बाप का पता न हो यानि जिसके बाप भगवान हो, अर्थात हरामी / कितना विकृत किया समाज को दलित चिंतकों ने ?? अर्थात हरिजन से उसको हरिजना बना दिया /
सज्जन का अर्थ --क्या सत ( सज्जन व्यकित ) का पुत्र ?? या जिसमें सच्चे व्यक्ति के गुण हों / दुर्जन का क्या मतलब == दुस्ट बाप कि संतान ?? या जिसके चरित्र में गन्दगी भरी हो /
तो फिर हरिजन का मतलब -- भगवान की संतान यानि जिसके बाप का पता न हो ?? या जिसके अंदर भगवान के सत्चितानन्द का गुण हो /
लेकिन घृणा की असीम कीचङ में आकंठ डूबे दलित चिंतकों ने गांधी के नाम का परित्याग कर,दलित शब्द से बिभूषित होना ज्यादा उचित समझा जिसका मतलब oppressed caste एक्ट तहत depressed class का गठन , जो 1935 में रानी विक्टोरिया ने रची -- उसके हिंदी अनुवाद को --दलित शब्द से नवाजा जाना ज्यादा उचित समझा /

 
(२) दूसरा है सूचनाओं के श्रोत का मामला --- गांधी के पास भी वही ,,ग्रन्थ उपलब्ध थे ,ब्रिटिश अधिकारयों और पादरियों के द्वारा हिंदूइस्म को बाइबिल के फ्रेमवर्क में परिभाषित करने का / लेकिन उन्होंने  उनके खिलाफ जंग तो छेड़ा लेकिन उनको अपने देश की परम्पराओं पर दृढ विश्वास था इसीलिये भारतीय राजनीति में पैर रखने के पूर्व भारत का भ्रमण किया , गोखले के निर्देश पर , और इसीलिये वे गीता का भी अपने हिसाब से अनुभाषित करने और समझने में सक्षम रहे - गीता माता /
लेकिन आंबेडकर भारतीय राजनीति में 1925 के आस पास भारतीय राजनीति में उदित होते हैं और 1931 में इंग्लॅण्ड में गांधी के बगल बैठकर ,,गोलमेज सम्मलेन में उन्ही ब्रिटिशर्स द्वारा उजाड़े गए लोगों को एक अलग कम्युनिटी की तरह रिप्रेजेंट करते हैं , और कम्युनल अवार्ड से सम्मानित होते है /
क्या अप्रसांगिक है इसकी विवेचना करना?


डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक -" अछूत कौन और कैसे " में मैला ढोने की 1900 के आसपास प्रचलित सामाजिक बुराई को, ऋग्वेद में पुरुश्सूक्ति के ब्राम्हणों के द्वारा बाद में घुसेड़े जाने यानी क्षेपक , से जोड़कर थीसिस लिखी है ।
लेकिन किस युग में ??
ये नहीं बताते ।

लेकिन अपनी थीसिस के "मटेरियल और मेथड " को प्रमानित् करने के लिए नारदस्मृति को प्रमाण के रूप में उल्लिखित करते हैं । 
लेकिन नारद तो मिथक थे । और सतयुग में पाए जाते थे । कितने साल पहले ?? 

तो फिर ये भी , एक अलग तस्वीर ये है कि सतयुग में प्रचलित हुए -- मैला धोने और ढोने की परंपरा को  चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु , ऐतिहासिक भारत के सबसे बड़े राजनीतिज्ञ कौटिल्य ने , कलयुग में उसका सुधार किया /
 

वैसे भी धरमपाल जैसे गांधीवादी ने अपनी पुस्तक -"The Beautiful Tree" में भारत में मैकाले की शिक्षा लागू होने के पूर्व , देशी शिक्षा के जरिये शिक्षित होने वाली 1830 के आसपास की जो लिस्ट प्रकाशित की है ,उनके लिस्ट में स्कूल जाने वाले शूद्र छात्रो की संख्या , तथाकथित विद्वान ब्रम्हाण छात्रो से चार गुना है । 

आंबेडकर जी के पूर्व के क्रिश्चियन मिशनरियों के लेखक और इतिहासकारों ने ऋग्वेद के पुरुष शूक्त को आधार बनाकर समाज में राजनैतिक और धर्म परिवर्तन के लिहाज से प्रमाणित करने कि कोशिश की कि वैदिक काल से ये समाज का वर्गीकरण कर्म आधारित न होकर जन्म आधारित रहा है / उसी विचार को बाद में मार्क्सिस्टों ने और आंबेडकर वादियों ने आगे बढ़ाया / 1901  के पूर्व जाति आधारित जनगणना भी नहीं होती थी (पहली जनगणना 1871 में हुयी थी ) बल्कि वर्ण और धर्म के आधार पर होती थी/ 1901 में जनगणना कमिशनर रिसले नामक व्यक्ति ने ढेर सारे त्रुटिपूर्ण तथ्यों और एंथ्रोपोलॉजी को आधार बनाकर 1500 से अधिक जातियों और 42   नश्लों में भारत के हिन्दू समाज की जनगणना की / वही जांगना आजतक जातिगत विभाजन का मौलिक आधारहै /
पुनश्च : गीता के -"जन्मना जायते शूद्रः कर्मण्य द्विजः भवति " को इतिहासकार प्रमाण नहीं मानते क्योंकि उनके अनुसार महाभारत एक मिथ है /
लेकिन अभी मैं कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् पढ़ रहा था तो एक रोचक श्लोक सामने आया / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "
अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /
दो चीजें स्पस्ट होती हैं की वैदिक काल से जन्म के अनुसार वर्ण व्यस्था नहीं थी क्योंकि कौटिल्य न तो मिथ हैं और न प्रागैतिहासिक / ज्येष्ठपुत्र को कर्म के अनुसार ही हिस्सा मिलता था/ और एक ही मा के पुत्र कर्मानुसार किसी भी वर्ण में जा सकते थे /