Thursday, 30 October 2014

."शूद्र कौन थे"- डॉ आंबेडकर का आधार - तथ्य या मिथ -Part- 18 आंबेडकर जैसे महान चिंतक कहाँ फंसे ईसाई पादरियों के बिछाए जाल में / parit-1

 आंबेडकर साहेब ने ये बात खुद ही स्वीकार की है कि वे संस्कृत नहीं जानते थे , लेकिन चूंकि सारे ग्रन्थ अंग्रेजी में अनुवादित हो चुके है । इसलिए उनके medium of language को लेकर उनकी hypothesis के समालोचना न की जाय। लेकिन अपने हाइपोथिसिस के तथ्यों की आलोचना का वो स्वागत करते हैं ।
  हाँ ये बात जरूर है , कि जिनके द्वारा अनुवादित किताबों का अध्ययन कर बाबा साहेब ने निष्कर्ष निकाला ,उसमे M A शेरिंग जैसे पादरी थे जो इस बात को लेकर कुंठित और परेशान थे कि -" आखिर भारत के हिन्दू उस समयकाल में 1883 के आस पास, इतना दरिद्र हो जाने के बाद भी ईसाइयत में शामिल क्यों नहीं हो रहा ?"

 शेरिंग जी दूसरे विद्वान पादरी है, काल्डवेल के बाद , जिन्होंने दुष्ट ब्राम्हण, कुटिल ब्राम्हण । उन्ही के शब्दों में ---wily bramhans ' जैसे शब्द भारतीय शब्दकोष में जोड़े।

आंबेडकर जी ने जो लिखा है ,,,उसमे पादरियों क़ी ईसाइयत का काफी असर है / उन्होंने "who were Shudras ", में लिखा है क़ी कट्टर हिन्दू उनकी रचना को blasphemous कहेंगे  ( प्राक्कथन में ही शायद ) / अब कोई बताये कि सनातन या हिन्दू धर्म में Blasphemy का कोई फ़िलोसॉफी है क्या ? चार्वाक जैसे महान नास्तिक को हम ऋषि चार्वाक कहते हैं /
 वैसे भी किसी व्यक्ति का विश्लेषण ,,समय काल और परिस्थियों के अनुसार होना चाहिए //आज आपके पास इंटरनेट है ,कोई भी सूचना प्राप्त कर सकते हैं / आंबेडकर जी के पास सूचना का श्रोत था, जेम्स मिल द्वारा लिखा भारत का इतिहास ,,जिसको उसने भारत की धरती पर पैर रखे बिना ही लिख मारा था, जिनमे विजेता के भाव तिरोहित थे और उसने  भारतीयों को   हीन और नपुंसक तक बता दिया था /
या शेररिंग जैसे पादरी की पुस्तके या मॅक्समुल्लर जैसा धूर्त ( प्रदोष एच --की पुस्तक --lies विथ लॉन्ग लेग्स ) क्रिश्चियन ,जिसने आर्य बाहर से आये इसकी नीव रखी\ मैकाले की शिक्षा पद्धति ( रंग और चमड़ी से भारतीय और सोच से अंग्रेज ) में दीक्षित , संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ , उनके पास सूचना के सीमित श्रोत थे /
भारत दरिद्रता की कीचङ में आकंठ डूब गया था / अँगुस मैडिसन के अनुसार भारत जो विश्व जीडीपी का 1750
तक  25  प्रतिशत का हिस्सेदार था ( ब्रटिश + अमेरिका उस समय मात्र 2 प्रतिशत के हिस्सेदार थे) / 1900 आते- आते ये भारत मात्र जीडीपी 1.8  प्रतिशत का हिस्सेदार बचा था / आंबेडकर जी इसके भी 25 साल बाद भारतीय राजनीति के फलक पर कदम रखते हैं /
पॉल कैनेडी की book "The Rise and Fall Of  Great Powers ".....में इकोनॉमिस्ट .बैरोच के एक आंकड़े के अनुसार 87.5  % डोमेस्टिक प्रोडूसर्स बेरोजगार और बेघर हो गए थे / अकेले पूर्णिया और भागलपुर जैसे जिलों से 6.5 लाख लोग परंपरागत पेशे से विस्थापित हुये थे /
अब आने वाले 47   वर्षों कुछ 25-50 प्रतिशत और लोग बेरोजगार हुए होंगे / ऐसे में जब आंबेडकर जी ने भीषण गरीब और बेघर लोंगो को देखा होगा ,तो जाहिर सी बात है कि उनकी विचारधारा को अगर समयकाल में देखेंगे तो शायद उनको कहीं न कहीं उनको सही पायेगे /
हाँ ये दूसरी बात है की उनकी सोच का फलक गांधी जैसा नहीं था ,,इसीलिये ,,,,उन्होंने आर्थिक ( हालाँकि वे इकॉनमी में पीएचडी थे ) कारणों को खोजने के बजाय पादरियों के फैलाये जाल में फंस गए ,,,और उस दरिद्रता को ऋग्वेद में खोजने लगे /
वरना गीता में स्वाभाव अनुसार वर्णित शूद्रों के कर्म --"परिचर्या" का अंग्रेजी में अनुवाद --menials में न करते /
अब नर्स परिचर्या करती है तो क्या menial जॉब है ?? या आप अपने वृद्ध मां बाप की परिचर्या करते हैं तो मेनिअल जॉब हो जाता है /


  Paul kennedy in his book --"After 1813 ,import of cotton fabrics into India rose spectacularly , from 1 million yards (1814) to 51 million in (1830 ) to 995 million (1870) ,driving out many traditional domestic producers in the process ..Page 148 Raise and fall of Great Powers ..by Paul kennedy

 लेकिन सबसे दुखद बात ये हैं कि आंबेडकर जी ने आर्यन invasion थ्योरी अर्थात आर्य भारत में बाहर से आके बसे को 1946 में ही नकार दिया था और चमड़े कर रंग को आधार बना कर अंग्रेजों और पादरियों ने जो समाज का बंटवारा करने की साजिश रची , (यानि आप अभी भी पढ़ते होंगे की वर्ण का मतलब रंग ,यानि त्वचा का रंग ) उसके आधार जन्मी परिकल्पना (जो बाइबिल के फ्रेमवर्क में नूह तीसरे पुत्र Ham के संततियों को perpetual servitude में रहने को शापित थे और उनका रंग काला था ) सवर्ण और अवर्ण (discolor का हिंदी अनुवाद ) को भी अपनी पुस्तक ."शूद्र कौन थे " में , नकार दिया था /
लेकिन दलित चिंतक अभी भी उस परिकल्पना से उबार नहीं पाये हैं / तो क्या ये कहना चाहिए कि दलित चिंतक आंबेडकर को भी नहीं पढ़ते /




" जाति " शब्द उन अर्थों में संस्कृत ग्रन्थों में नहीं है,जिनमे आज ,प्रयोग हो रहा है ,इसलिए ये अनादि काल के भारतीय समाज के बारे में, मिथ्या प्रचार है , क्षेपक (Interpolation ) / जाति शब्द का प्रयोग जिन अर्थों में संस्कृत में है ,,वो बाद में बताऊंगा ..सिर्फ दो शब्द के बारे मे बोलना चाहता हूँ
(१) जाति caste का हिंदी अनुवाद है ,जो पुर्तगाल और लैटिन में उद्धृत है /
(२) इलैया कांचा जैसे लोग बुद्धजीवी ,,और उनके दलित राजनीति करने की तरकीब उनके रोले मॉडल कॉडवेल ,G U पोप ,और शेरिंग जैसे पादरियों द्वारा अपनाये गए ,चिर परचित हथियार की तरह प्रयोग कर रहें हैं ,ईसाइयत फैलाने के लिए /

 A L Basham ,,ने अपनी पुस्तक ' the wonder that was India " में लिखा की ये इस्लामिक आक्रमण के पहले का भारत का इतिहास है ,,फिर आगे उन्होंने लिखा -- आधुनिक जातिगत व्यवस्था ---Caste सिस्टम ,पुराने भारतवर्ष में नहीं थी यानि ( इस्लामिक आक्रमण के पहले ) / तो फिर ये कहा जाना चाहिए की जातिगत ढांचा जिस पर आज भारत खड़ा है ,उसके बाद का क्षेपक यानि नवीन सामाजिक संरचना है / यानी उसकी खोज भी इस कालचक्र के बाद ही किया जाय , तो उचित रहेगा /

बषम के अनुसार ,,लेकिन ये व्यवस्था रिजिड नहीं थी / caste ,,एक ऐसे जन समूह ,,जो एक वंशवृक्ष या परिवार का विस्तृत फैलाव है, जो आपस में ही शादी ब्याह ,खाना पीना और एक खास तरह के शिल्प / ट्रेड से जुड़ा हुवा था / लेकिन ये व्यवस्था तरल थी --इसका तात्पर्य ये है की यदि कोई स्वर्णकार, परिवार का व्यक्ति कल को कॉटन फैब्रिक बनाना चाहता है ,,तो कर सकता था / 
16वीं शताब्दी में , जब पुर्तगाली जब पहली बार भारत आये तो उन्होंने ,,हिन्दुओं के एक ख़ास समुदाय को castas कहकर सम्बोधित किया , जिसका मतलब tribe , परिवार ,खानदान से था / ( यूरोप में caste सिस्टम एकदम रिजिड थी ,गूगल सर्च करें ) .ये शब्द ऐसा फिट बैठा कि ,एक प्रचलित शब्द हो गया किसी भी समुदाय को सम्बोधित करने के लिए / आगे चलकर वर्ण और castas का ऐसा घालमेल हुवा कि कोई वर्ण को castas के नाम से लिख पढ़ रहा है ,,और कोई castas को वर्ण के नाम से /
यूरोपियों के लिए तो ये confusion ठीक था कि चलो विदेशी थे ,,भारतीय संस्कृति और समाज से अनजान थे लेकिन क्या डॉ आंबेडकर भी वर्ण और castas का फर्क नहीं जानते थे / उन्होंने अपनी पुस्तक " शूद्र " कौन थे ,में वर्ण और castas के फर्क को ठीक से समझ नहीं पाये हैं
..उदाहरण स्वरुप --The Apastamba Dharma Sutra states:
"There are four castes—Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras.
Among these, each preceding (caste) is superior by birth to the one
following. [f3]For all these excepting Shudras and those who have
committed bad actions are ordained (1) the initiation (Upanayan or the
wearing of the sacred thread), (2) the study of the Veda and (3) the
kindling of the sacred fire (i.e., the right to perform sacrifice)[f4]
This is repeated by Vasishtha Dharma Sutra which says :
"There are four castes (Vamas), Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas and shudras /



 अभी कहानी आगे बढ़ने के पूर्व चूंकि बात भारतवर्ष के सामाजिक व्यवस्था कि है ,,तो मैं आप से गुजारिश करूंगा कि किसी भी शाश्त्र में "जाति" शब्द को एक ख़ास तबके के लिए , प्रयोग हुवा हो ,,संदर्भित करें / अम्ब्रड़कर जी ने चूंकि प्रथम संस्कृत ग्रन्थ ऋग्वेद के कॉस्मोलॉजी से उद्धृत श्लोक पुरुष शूक्त कि ही विवेचना की है ,और सिद्ध करने का प्रयास किया है कि पुरुष शूक्त एक क्षेपक ( यानि ग्रन्थ रचित होने के बाद ,ब्राम्हणों ने चतुराई/ धूर्ततापूर्वक उसमे घुसेड़ा है ) है /
तो मेरा दलित चिंतकों से विनम्र आग्रह है ,कि वे आदि ग्रन्थ से अब तक के ,,किसी भी ग्रन्थ में "जाति" शब्द का उद्धरण दिखा दें / मैकाले की 1835 में शिक्षा व्यवस्था लागू होने के पूर्व ,,भारत में हिन्दुओं की शिक्षा का माध्यम या तो संस्कृत थी या वर्नाकुलर भाषाएँ /


  प्रश्न यही तो है ..कि शोषित तबका ?  हाँ है ..दलित तबका?हाँ है / लेकिन किससे . किसने दलित शब्द का ईजाद किया ..किसने opressed caste एक्ट बनाया ?? और उसके आधार वेदों में खोजने के बजाय भारत के आर्थिक इतिहास में क्यों नहीं खोजा गया ?? जब भारत कि 1750 में ब्रिटेन और अमेरिका दोनों कि मिलाकर GDP विश्व जीडीपी का मात्र 2 % था ,और भारत का शेयर 25 % था ,यानि सोने कि चिड़िया थी / और मात्र 150 सालोँ में , वही जीडीपी मात्र २ % रह जाती है 1900 आते -आते , और 87.5% प्रतिशत स्किल्ड लोग बेरोजगार हो जाते हैं / आज मोदी स्किल्ड इंडिया का नारा चिल्ला चिल्ला कर दिल्ली कि गद्दी हथिया लेते हैं / उन स्किल्ड लोगों को बेघर और बेरोजगार बनाने का ठीकरा किसके सर फूटना चाहिए था ,लेकिन फूटा कहाँ जा कर ?
हमारे ख्याल से सारे दलित चिंतक जो आज ऊपर आचुके हैं ,,गरीबी का दामन छोड़कर , सड़क पर सोने को बाध्य मजदूर तबके के साथ ही रात का भोजन ,और सुबह का नाश्ता करते होंगे /


 वैसे वेदों तक तो न तो अपनी पहुँच है न समझ , और गीता को आप मिथक का हिस्सा मान लेते हैं / लेकिन कौटिल्य न तो प्रागैतिहासिक है , और न ही उनका अर्थशाश्त्र मिथक के अंदर आता है और उस ब्राम्हण ने जिस राजकुल कि स्थापना की थी ,,वो चन्द्रगुप्त मौर्या भी भारत के ही शासक थे / बाहर से आये हुए संस्कृत भाषी थे कि भारतीय मूल के थे इसका निर्णय आप करें / लेकिन ये तो पक्का ही है कि हम कम से कम उस ऋग्वेदों के रचना के बहुत दिन बाद के थे / अगर ऋग्वेदों में वर्णित पुरुषशूक्त के अनुसार - विराट पुरुष के पैरों से , पैदा होने की ब्राम्हणों की साजिश के कारण 1900  में इतनी दुर्दशा हुयी ,,तो देखें कौटिल्य भी तो कही कुटिल ब्राम्हण ही तो नहीं था ----
क्या लिखते हैं कौटिल्य, शूद्र के बारे में -- क्या वाकई शूद्रों का कार्य menial जॉब के लिए ही बाध्य हुवा क्योंकि ऋग्वेद में पुरुष शुक्त के अनुसार वो विराट पुरुष के  पैरो से  उत्पन्न हुआ था-


 कौटिल्य  के अनुसार विद्या के चार अंग है --आन्वीक्षकी ,त्रयी वार्ता और दण्डनीति (शासन की नीति )
--आन्वीक्षकी --का अर्थ सांख्य ,योग और लोकायत --धर्म और अधर्म ,अर्थ -अनर्थ , सुशासन -दुशासन का ज्ञान
--त्रयी --ऋक ,साम और यजुर्वेद का ज्ञान
--,वार्ता --कृषि पशुपालन और व्यापार ,,वार्ता विद्या के अंग हैं-- यह विद्या धान्य , पशु , हिरण्य ,,ताम्र आदि खनिज पदार्थों के बारे में ज्ञान /
स्वधर्मो ब्राम्हणस्य अध्ययनम अद्ध्यापनम् यजनम ,याजनम् दानं प्रतिग्रहेश्वेति / क्षत्रियस्य अध्ययनम यजनम दानं शश्त्राजीवो भूतरक्षणम् च /वैश्यस्य अध्ययनम यजनम दानं कृषिपशुपाल्ये वाणिज्य च / शूद्रश्य द्विजात शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलव कर्म च /
अर्थात - ब्राम्हण का धर्म , अध्ययन अद्ध्यापन यजन ,याजन दान देना और लेना है /क्षत्रिय का धर्म है अध्ययन यजन ,याजन दान देना कृषि कार्य ,,पशुपालन और व्यापार है / शूद्र का धर्म कि द्विज की सुश्रुषा करे , कृषि कार्य ,,पशुपालन और व्यापार करे ,और शिल्प शास्त्र ,गायन वादन में कुशलता प्राप्त करे /
रेफ : वार्तादंडनीतिस्थापना /
अब आगे देखें और क्या कहते हैं कौटिल्य ..
--प्राचीन आचार्यों का मत है कि तेज कि अतिशयता होने के कारण ब्राम्हण , क्षत्रिय वैश्य और शूद्र , इन चार वर्णों की सेनाओं में उत्तर उत्तर की अपेक्षा पूर्व पूर्व की सेना अधिक श्रेष्ठ है
--इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का मत है कि -" शत्रुपक्ष ब्रम्हानसेना के आगे नमस्कार करके या शीश झुका कर अपने वष में कर लेता है ,/ इसलिए युद्धविद्या में निपुण क्षत्रिय सेना को ही सर्वाधिक क्ष्रेष्ठ समझना चाहिए ; अथवा वैश्य सेना तथा ....शूद्र सेना ... को भी श्रेष्ठ समझना चाहिए , यदि उनमें वीर पुरुषों कि अधिकता हो तो /
रेफ : बलोपादानकालाह सन्नाहगुणाः
विद्या के चार अंग है --आन्वीक्षकी ,त्रयी वार्ता और दण्डनीति (शासन की नीति )
--आन्वीक्षकी --का अर्थ सांख्य ,योग और लोकायत --धर्म और अधर्म ,अर्थ -अनर्थ , सुशासन -दुशासन का ज्ञान
--त्रयी --ऋक ,साम और यजुर्वेद का ज्ञान
--,वार्ता --कृषि पशुपालन और व्यापार ,,वार्ता विद्या के अंग हैं-- यह विद्या धान्य , पशु , हिरण्य ,,ताम्र आदि खनिज पदार्थों के बारे में ज्ञान /
स्वधर्मो ब्राम्हणस्य अध्ययनम अद्ध्यापनम् यजनम ,याजनम् दानं प्रतिग्रहेश्वेति / क्षत्रियस्य अध्ययनम यजनम दानं शश्त्राजीवो भूतरक्षणम् च /वैश्यस्य अध्ययनम यजनम दानं कृषिपशुपाल्ये वाणिज्य च / शूद्रश्य द्विजात शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलव कर्म च /
अर्थात - ब्राम्हण का धर्म , अध्ययन अद्ध्यापन यजन ,याजन दान देना और लेना है /क्षत्रिय का धर्म है अध्ययन यजन ,याजन दान देना  भूमि की रक्षा करना / वैश्य का धर्म है
अध्ययन यजन ,याजन दान देना कृषि कार्य ,,पशुपालन और व्यापार है / शूद्र का धर्म कि सुश्रुषा करे , कृषि कार्य ,,पशुपालन और व्यापार करे ,और शिल्प शास्त्र ,गायन वादन में कुशलता प्राप्त करे / ( और  वो भी  स्वधर्मों अर्थात अपनी प्रवृत्ति के अनुसार  वृत्ती का चयन करे )
रेफ : वार्तादंडनीतिस्थापना /
अब आगे देखें और क्या कहते हैं कौटिल्य ..
--प्राचीन आचार्यों का मत है कि तेज कि अतिशयता होने के कारण ब्राम्हण , क्षत्रिय वैश्य और शूद्र , इन चार वर्णों की सेनाओं में उत्तर उत्तर की अपेक्षा पूर्व पूर्व की सेना अधिक श्रेष्ठ है
--इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का मत है कि -" शत्रुपक्ष ब्रम्हानसेना के आगे नमस्कार करके या शीश झुका कर अपने वष में कर लेता है ,/ इसलिए युद्धविद्या में निपुण क्षत्रिय सेना को ही सर्वाधिक क्ष्रेष्ठ समझना चाहिए ; अथवा वैश्य सेना तथा ....शूद्र सेना ... को भी श्रेष्ठ समझना चाहिए , यदि उनमें वीर पुरुषों कि अधिकता हो तो /
रेफ : बलोपादानकालाह सन्नाहगुणाः these are from kautilya arthshastram ..


जाति शब्द का उल्लेख -- अमरकोश के अनुसार औषधिवर्गः ४

त्रीणि जातेह---सुमना मालती जातिह

मालती के तीन नाम -- सुमन मालती ,जाति
नानार्थ वर्गः ३
जातिह सामान्य जन्मनो -

 शूद्र का धर्म कि द्विज की सुश्रुषा करे , कृषि कार्य ,,पशुपालन और व्यापार करे ,और शिल्प शास्त्र ,गायन वादन में कुशलता प्राप्त करे / अथवा वैश्य सेना तथा ....शूद्र सेना ... को भी श्रेष्ठ समझना चाहिए , यदि उनमें वीर पुरुषों कि अधिकता हो तो
 कौटिल्य तो कह रहें है कि शूद्र सेना ,,ब्राम्हण सेना से भी श्रेष्ठ हो सकती है /
तो फिर पुरुष शूक्त ?? और डॉ आंबेडकर का शूद्रों के बारे में मत का क्या होगा ?? तो दलित कब पैदा हुए ?? शायद वैदिक काल से तो सम्बन्ध बनता जान नहीं पड़ता /

Wednesday, 29 October 2014

."शूद्र कौन थे"- डॉ आंबेडकर का आधार - तथ्य या मिथ -Part-17 द्रविड़ियन रेस का पोस्ट मोर्टेम : एक झूठ :जिसका समर्थन आंबेडकर पेरियार और ज्योतिब फुले ने किया //

संस्कृत ग्रंथों , अमरकोश के अनुसार -द्रविड़ शब्द का अर्थ धन , बल  और पराक्रम
आदि शंकराचार्य के " मठाम्नयाय महानुशासनम्" के अनुसार ...श्रृंगेरी मठ के अधीन आने वाले प्रदेशों  केरल कर्नाटक आँध्रप्रदेश और द्रविड़ (जिसको आज तमिलनाडु ) के नाम
से जाना जाता है /
धन बल -पराक्रम-और एक - प्रदेश / राज्य --को ईसाई पादरियों ने एक अलग नश्ल प्रमाणित कर दिया , , और हमने मान भी लिया /
पीछे लिखे पोस्टो में डॉ बुचनन (१८०७) तक ने इसे एक भौगोलिक स्थान माना /
रविंद्रनाथ टैगोर के द्वारा रचित राष्ट्रीय गीत में भी द्रविड़ को एक भौगोलिक संज्ञा माना गया "--द्रविड़ उत्कल बंग , विंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलि जलधि तरंग --
लेकिन 1900 आते आते ईसाइयत फैलाने की बदनीयत से ईसाई पादरियों ने--- द्रविड़ शब्द ---- को मुख्य भारत के जनमानस से अलग एक नयी रेस / नश्ल साबित कर दिया //


 आगे बढ़ने से पहले कुछ उद्धरण --महान दलित चिंतकों के जिन्होंने आर्य ब्राम्हण , शूद्र अछूत और द्रविड़ियन ,,जैसे शब्दों की लुगदी बनाकर फेंटा और समाज को परोसा / और आज भी रिसर्च पेपर्स में वही लुगदी फेंट और परोस रहें हैं /
बीसवीं शताब्दी के दलित चंतकों को थोड़
ा इस बात का  बोनस मार्क ,,और छूट मिल सकती हैं / क्योंकि उनमे से अधिकतम लोग अंगरेजी में ( मौकौले शिक्षा पद्धति ) शिक्षित थे  और विदेशों में भी शिक्षा ग्रहण किया था / वे संस्कृत नहीं पढ़ सकते थे , इसलिए उनका सूचना का श्रोत ,उन्ही पादरियों और अंग्रेजी अधिकारियों द्वारा संस्कृत से अंग्रेजी में अनुवादित पुस्तकों ,, और उन्ही पादरियों द्वारा निकाले गए निष्कर्षों तक ही सीमित थी / और १९०० के बाद भारत का 80 % से ज्यादा का तबका जिस गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहा था , जिसका कारण यही अंग्रेजी शासन तंत्र था , न की ब्राम्हण समाज या मिथक घोषित किये गए संस्कृत ग्रन्थ /
मजे की बात तो ये है कि रामायण और महाभारत तो मिथक हो गए और न जाने कब की रचना ( जिसकी रचना मनु ने कब की थी ) वो प्रामाणिक हो गयी / कभी मनु को शासन की "बुक ऑफ़ लॉ " थी कि नहीं , ये तो पता नहीं और न इसका प्रमाण है और दूसरे अंग्रेजों के पहले भारत में 800 साल मुग़लों और तुर्कों का रहा ,तो शासन नीति उन मुग़लों की थी या ब्राम्हणों द्वारा बनाये गए "बुक ऑफ़ लॉ " का पालन मुग़ल और तुर्क भी करते थे , इसका भी कोई प्रमाण नहीः है / लेकिन 1900 के आसपास जब भारत कि जीडीपी , मात्र 150 सालो में विश्व की GDP में 25 प्रतिशत से घटकर मात्र २ प्रतिशत रह गया और 87.5 % टेचनोक्रट्स और व्यापारी और छोटे किसान जब बेरोजगार और बेघर हो गए (80  प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या ) , तब अंग्रेजी शाशकों के हाँथ 'मनुस्मृति' के रूप में एक ऐसा हथियार मिला , जिसने उनके सारे कुकृत्यो और घड़यन्त्रों को ढाल प्रदान का कार्य किया /
अब आगे बढ़ने से पहले ..कुछ उद्धरण आर्य  ब्राम्हण शूद्र अछूत और द्रविड़ियन जैसे शब्दों को मिलाकर  तैयार की हुयी लुगदी को दलित चिंतकों के मुहं से सुनते हैं -


                               " Only if the Brahmin is destroyed, caste will be destroyed. The Brahmin is a snake entangled in our feet. He will bite. If you take off your leg, that's all. Don't leave. Brahmin is not able to dominate because power is in the hands of the Tamilian[ - Periyar ji Viduthalai.
                             मैं आंबेडकर जी के इस - निष्कर्ष से सहमत हूँ , कि शूद्र क्षत्रिय हों न हों  लेकिन वाकई में अछूत .चमारों को  छोड़कर जैसे मेहतर और जमादार वाकई क्षत्रिय वंशज के कुलवाहक थे /
और इसके लिए उन्होंने जो श्रम शाध्य मेहनत करके , वेद पुराण और उपनिषद की यात्रा की उसकी  जरूरत नहीं थी सिर्फ गुलाम भारत के एक साल हजार साल का इतिहास पढ़ने की क्षमता पैदा कर लेते  तो / 

कुछ संदर्भ इस शाजिश के माया जाल की :
 - एक झलक अभी 2205 में छपी एक प्रसिद्द एग्रीकल्चर रेसेअर्चेर द्वारा छपी पुस्तक का पुस्तकांश पेश कर रहा हूँ जो अभी भी आर्य , द्रविड़ , शूद्र और अछूत की लुगदी फेंटकर इस मिथक को आगे ले जा रहें हैं ,अपनी पुस्तक में ---Encyclopaedia of Oriental Philosophy and Religion: Hinduism : Nagendra Kumar Singh

 https://www.facebook.com/photo.php?fbid=913162355380499&set=p.913162355380499&type=1

- #1937 में जब राजगोपालाचारी जी मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने हिंदी को स्कूलों में शिक्षा कि अनिवार्य भाषा घोषित किया / तो इ. व् रामास्वामी #पेरियार ने ये कहकर हिंदी के विरुद्ध आंदोलन छेड़ा कि हिंदी का तमिलनाडु में प्रवेश आर्यों की एक खतरनाक शाजिश है और ये द्रविड़ियन संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास है / और जितने पॉलिटिशियन थे सबने Partyline के बाहर जाकर उनका समर्थन किया /
कालद्वेल्ल और G U पोप जैसे पादरियों का ये खड़यन्त्र कि-" तमिल में आर्यों ने संस्कृत को घुसेड़ा है " कामयाब हो गया //
ऊपर लिखे पोस्टों में मैंने यही लिखा है /


  On caste, he believed that the Kural illustrates how Vedic laws of Manu were against the Sudras and other communities of the Dravidian race. On the other hand, Periyar opined that the ethics from the Kural was comparable to the Christian बाइबिल

अब दूस
रा उद्धरण ,,जो मैंने पहले दिया था कि ईसाइयत फ़ैलाने कि बदनीयत से एक खड़यन्त्र ईसाई पादरियों और ब्रिटिशर्स ने जब ये बात लिखी कि तमिल भाषा संस्कृत नहीं बल्कि हिब्रू और अरबिक से उत्पन्न हुई ,,और थिरुकुराल लिखने वाले गुरु थिरुवल्लार ईसाई ग्रंथो से प्रेरित थे /
- 1801 में H T colebrooke ने लिखा कि सभी भारतीय भाषाएँ संस्कृत से  निकली  /-
- लेकिन 1816 में अलेक्सान्दर कैम्पबेल और white Ellis ने " ग्रामर ऑफ़ तेलगू लैंग्वेज " , लिखी तो घोषित किया कि तमिल और तेलगु ,,संस्कृत से नहीं बल्कि किसी और भाषा से निकली हैं ,,
-1840 में H Hodson एक स्कॉटिश पादरी ने एक नयी थ्योरी पेश कि दक्षिण के मूल निवासी एक अलग मूल भाषा बोलते हैं ,,जिसको द्रविड़ियन भाषा कहते हैं /
-1848-49 में H हॉडसन ने लिखा कि तमिलियन भारत के मूल निवासी थे , और आर्यों के आने के पहले पूरे भारत में फैले थे /
-१८५६ में बिशप कालद्वेल्ल एक पुस्तक रची -"कम्पेरेटिव ग्रामर ऑफ़ द्रविड़ियन लैंग्वेजेज " --जिन्होंने पहली बार द्रविड़ ,,जो कि संस्कृत शब्द है ,,उसको एक नयी रेस / नश्ल करार दिया /
- G U पोप (१८२०-१९०८) ने १९०० आते आते घोषणा की कि --कि थिरुवल्लर ने अपने ग्रन्थ में , बाइबिल के "sermon ऑफ़ माउंट " से लिए हुए तथ्यों को अपने ग्रन्थ में वर्णित किया है / ( अर्थ धर्म और काम ,,जैसे तथ्य बाइबिल किस चैप्टर में है ,,,जरा बताएं)
और बीसवीं शताब्दी में एक विचारक और चिंतक पेरियार जी ठीक वही बार दोहराते है ,,कि जाति व्यवस्था और मनु के वैदिक काल के नियम बताते हैं कि वो किस तरह शूद्रों और द्रविड़ियन रेस के खिलाफ है / वहीं कुराल में वर्णित नियम और सिद्धांत क्रिश्चियन बाइबिल से मिलते जुलते हैं /


  आगे पेरियार जी कहते हैं , मुस्लिम पुरानी द्रविड़ियन संस्कृति के अनुयायी हैं ..और द्रविड़ियन रिलिजन को अरबिक में इस्लाम कहते हैं /

 आप देख सकते हैं ,,आर्य ,,द्रविड़ शूद्र ितयादि किस तरह बिना किसी आधार पर गढ़े हुए ,,,आधारहीन तथ्यों कि एक कहानी है /

  अब एक और दलित चिंतक और सच्चे अर्थों में महात्मा ,, ज्योतिबा फुले जी ( 1827 - 1890 ) के बारे में एक छोटा सा द्रिस्टान्त भारत के इकनोमिक हिस्ट्री , एजुकेशनल हिस्ट्री और आज के द्विजों में से एक क्षत्रियों के पूर्वज शिवजी महाराज ,,जो कोल्हापुर के राजा थे उनके बारे में , अगर गलत होऊंगा तो टोंक दीजियेगा /
महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म एक मौर्या जाति के वंशजों में हुवा / बेसिक एजुकेशन के के बाद एक मिशनरी स्कूल में उच्च शिक्षा प्राप्त किया / लेकिन 1848 में एक ब्राम्हण ( उस ब्राम्हण का नाम नहीं लिखा हैं ,,गूगल गुरु ने ) के हांथों अपमानित होने के बाद उन्होंने ब्राम्हणों और ब्रम्हानिस्म के खिलाफ ,,और समाज में फैले अंधविस्वास ( यानि वो रीति रिवाज जो बाइबिल कि फ्रेम वर्क के बाहर थी ) और कुरीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया / उन्होंने ढेर सारे सामाजिक सरोकारों जैसे जैसे स्त्री मुक्ति , विधवाओं के अधिकार , शिक्षा के क्षेत्र ,और छोटी जाँतियो , बहुजन , शूद्र और अतिशूद्रों के शोषण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभायी /
उन्होंने 1873 में शाहूजी महराज  को जो कोल्हापुर के राजा थे  ( एक क्षत्रिय और द्विज ,जिसको कालांतर में ढेर सारे अंग्रेजी तमगे मिलने वाले हैं )  के सहयोग से " सत्य सोधक समाज " की स्थापना की / जिसका उद्देश्य ब्रामणो के शोषण से शूद्रों को मुक्त करवाना था / उन्होंने वेदों के पवित्रता को ख़ारिज कर दिया और चातुर्वर्ण व्यवस्था को भी / उन्होंने शिव जयंती ( शिवा जी के जन्मदिन ) कि शरुवात की /
वेदों कि सार्थकता को ख़ारिज करते हुए उन्होंने प्रश्न उठाया -" कि अगर वेद ब्रम्ह के शब्द है और सम्पूर्ण मानवता के हितसाधने के लिए बने हैं तो ये संस्कृत में ही क्यों लिखे गए हैं ??" उन्होंने मूर्तिपूजा का घोर विरोध किया / ( ये भी बाइबिल के फ्रेम वर्क में फिट नहीं होता , इसलिए मिथक और अंधविस्वास ) लेकिन क्या उनके अंदर ये जिज्ञासा पैदा हुयी कि बाइबल हेब्रेव और कुरान अरेबिक मे क्यों लिखी गई ?


 अब कुछ प्रश्न :
---- स्कॉटिश मिशनरी स्कूल से शिक्षित और दीक्षित फुले जी , 1848 में एक ब्राम्हण से अपमानित होकर ब्रम्हानिस्म से लड़ने का बीड़ा उठाया , 21 वर्ष कि उम्र में / लेकिन 9 सा
ल बाद भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ,,में भाग लिया कि नहीं लिया ,ये तो नहीं पूंछ रहा हूँ लेकिन 30 साल के जवान फुले जी का खून नहीं खौला ?? कहीं जिक्र नहीं है , कि उन्होंने कुछ कहा हो  इस सन्दर्भ में ? क्यों सिर्फ इसलिए कि मंगल पाण्डेय उसके नेता थे ??
-----1873 में जब उन्होंने सत्य सोधक समाज क़ी स्थापना क़ी , शूद्रों को ब्रामणो के बंधन से मुक्त करने के लिए  तो भारत क़ी मैन्युफैक्चरिंग और GDP 150 सालों के निम्तम पायदान पर थी , जो भारत 1750 तक विश्व क़ी GDP का 25 % हिस्सेदार था ,,वो घट कर मात्र 5 % का आसपास आ गयी थी / और  87.5 %  % लोग बेरोजगार और बेह्गर हो गए थे / (कार्ल मार्क्स के 1853 में छपे लेख के अनुसार 1835 तक ढ़ाका के डेढ़ लाख वस्त्रशिल्पियों में से १ लाख ३० हजार शिल्पी बेरोजगार होकर शहर छोड़ कर भाग गए मात्र २० हजार बचे थे ,,तो अगले 25 वर्षों में भारत की जनसंख्या की 10 प्रतिशत आबादी यानि 2.5 करोड़ लोग अन्नाभाव मे भूंख से मरने वाले है / और एक महान नेता बेरोजगारी और मौत के खिलाफ लड़ने के बजाय ब्रामहन वाद से लड़ रहा था ?


  डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक - हु वेरे शूद्रास में जो रीसर्च किया है ,,वह अतुलनीय है ,,उन्होंने कहा है की पुरुष शुक्ति एक क्षेपक (interpolation ) है ,,, और निष्कर्ष निकला है की शूद्र क्षत्रिय थे, आर्य द्रविड़ थ्योरी की ही तरह ये सिद्ध किया कि ,,वशिष्ठ और विश्वामित्र के वंशजों में अनंत काल तक दुश्मनी ( perpetual enemity ) की वजह से ,,ब्राम्हणों ने उन क्षत्रियों का उपनयन संस्कार करवाना बंद कर दिया शाजिशन ,, और इस तरह से वे आज कि तारीख में इस दुर्दशा को प्राप्त हुए / जबकि जो लोग रामायण का अध्ययन किये हैं वे जानते हैं,कि जब विश्वामित्र दसरथ से यज्ञ कि रक्षा हेतु , मांगे आये थे ,तो दसरथ अनिक्षुक थे, रामऔर लक्ष्मण को विश्वामित्र के साथ भेजने के लिए / गुरु वशिष्ठ के कहने पर दसरथ राम और लक्षमण को विश्वामित्र को सौपने को तैयार होते हैं /
कहाँ गयी वो अनंत काल तक दुश्मनी ??
 

Monday, 27 October 2014

Part-16 द्रविड़ियन रेस का पोस्ट मोर्टेम :" द्रविड़ " शब्द का संस्कृत में किन सन्दर्भों में प्रयोग होता है /



  अब ये समझने की जरूरत है कि -"#द्रविड़ शब्द का संस्कृत"- में अर्थ क्या है ?? कहाँ प्रयोग हुवा है ये संस्कृत ग्रंथों में ?? और किस सन्दर्भ में ??
क्या द्रविड़ का अर्थ अलग रेस यानि नश्ल है ...जो संस्कृत से अलग है ??
या इसको भी राजनैतिक या ईसाइयत फैलाने के लिए इस्तेमाल किया गया /


अब संस्कित ग्रंथों में ---द्रविड़----शब्द का प्रयोग किन अर्थों में हुवा है ??
उसकी एक झलक।
"अमरकोश" में द्रविड़ शब्द को किन अर्थो में प्रयोग किया गया है , आप स्वयं देखे ।

(१) दस पराक्रमस्य
द्रविड्म तरः सहोबलशौर्यानि स्थाम शुष्मं च।
शक्ति पराक्रमह प्राणः ।
द्रविड़ पराक्रम की दस पर्यायवाचियों में प्रथम पर्यायवाची है ।
(द्वितीय कांडम क्षित्रिय वर्गः 8 श्लोक 102


  (२) त्रयोदस धनस्य
द्रव्यम वित्तं स्वापतेयम रिकथं ऋक्थं धनं वसु।
हिरण्यं द्रविड़म द्युम्नम अर्थम् रै विभावा अपि ।

द्वितीयम काण्डम वैश्यवर्गह 9 श्लोक 90।
यानी धन संपत्ति को भी द्रविड़ के नाम से जाना जाता है।




 (३) द्रविडम तु धनम बलं
तृतीय कॉन्डम, नानार्थवर्गः ,; श्लोक संख्या ५२ 
 
यानि अमरकोश के अनुसार ----- द्रविड़ ---- शब्द के मायने ----धन , बल या पराक्रम है /
इसको किसी -----अलग रेस या नश्ल ------ से कैसे जोड़ा जा सकता है / लेकिन तथाकथित इंडोलॉजिस्ट जिनको संस्कृत का स भी नहीं आता, देखिये किन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु -शाजि
श के तहत -आर्यों से इतर एक अलग रेस/ नश्ल का नाम दे डाला / आगे जब दलित नेताओं ने .." द्रविड़ शब्द को अलग जातियों...और दलितों .किस तरह  से  जोड़ा"----- के रूप में जिक्र करूंगा , तो इसका ध्यान जरूर रखियेगा /
 2008 से 2012 के बीच, द्रविड़ शब्द की उत्पत्ति ..जिसको अंग्रेजी में etymology कहा जाता है ,,,को पता करने हेतु ... मैंने गूगल को खंगाल डाला लेकिन कहीं नहीं मिला / पिछले वर्ष 2012 में जब प्रयाग में महाकुम्भ का आयोजन हो रहा था ,,तो अग्निअखाड़ा के सचिव स्वामी गोविंदानंद ने मुझे एक पुस्तक भेंट की ,,और आग्रह किया कि इसकी कुछ प्रतियां छपवा दीजिये, तो मैंने सोचा कि बाबाजी मुझे चूना लगाना चाहते है / क्योंकि मैं बहुत भक्त टाइप का व्यक्ति नहीं हूँ , तो मैंने उनको टालने के लिए हाँ कह दिया / लेकिन जब मैंने उसको पढ़ा तो ,,द्रविड़ शब्द का जिक्र उसमें मिला ,, तो मैंने 20,000 रुपये खर्च कर उस पुःतक कि 500 प्रतियां छपवाई /
उस पुस्तक का नाम है --" जगद्गुरु आदिशंकराचार्य , मठाम्नयाय , मठ , मढ़ियाँ , तथा सन्यासी अखाड़े "/ लेखक --अग्निअखाड़ा के सचिव स्वामी गोविंदानंद
 https://www.facebook.com/photo.php?fbid=912508185445916&set=p.912508185445916&type=1
 
 आदि शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत में अलग अलग दिशाओं में चार मठों कि स्थापना के पश्चात ,,उसमे नैष्ठिक ब्रम्ह्चारियों ( जो जीवन भर मठों में ही जीवन व्यतीत करे ) को दस नाम से सम्बोधित किया ...जिसको आप आज अखाड़ों को दसनामी अखाड़ों के नाम से जानते है :
तीर
्थाश्रम , वनअरण्य गिरी पर्वत सागराः /
सरवती भारती च पुरी नामानि वै दशः//
और इन मठों (आम्नाय ) को संचालित करने के लिए नियम बनाये , और उन नियमों को एक ग्रन्थ में संघिताबद्ध किया -- उसको " मठाम्नयाय महानुशाषन " के नाम से जाना जाता है / ये मठ और अखाड़े अभी भी उन्ही नियमों से चलते हैं / इस ग्रन्थ में मात्र 73 श्लोक हैं / इसमें उन्होंने सम्पूर्ण भारत राष्ट को, चार मठों के अधीन विभक्त किया है कि भौगोलिक रूप से कौन सा राज्य किस मठ के अधीन रहेगा , और किस मठ में किस वेद का पठन पाठन होगा , कौन उनके आराध्य देवी देवता होंगे , और आचार्यों को किस नाम से बुलाया जाएगा , इसका विस्तृत वर्णन है /
---द्रविड़ -- शब्द का उल्लेख उन्हीने ,भौगोलिक दृष्टि से एक राज्य के रूप में श्रृंगेरी मठ के अधीन वर्णित किया है /

//मठाम्नयाय - महानुशासन //
प्रथमः पश्चिमामन्यायः शारदा मठ उच्च्यते /
कीटवार सम्प्रदायः तस्य तीर्थाश्रमौ पड़े // १//

सिंधु-सौवीर -सौराष्ट्र - महाराष्ट्रः तथान्तराः /
देशाः पश्चिमदिगवस्थताः ये शारदामठ भागिनः //५//
अर्थात प्रथम मठ पश्चिम में है , जिसको शारदा मठ के नाम से जानते हैं /
इसका सम्प्रदाय कीटवार है , और इसके नैष्ठिक ब्राह्यणों को तीर्थ और आश्रम पद प्राप्त है /
सिंधु -सौवीर -सौराष्ट्र - महाराष्ट्र और इनके आसपास का क्षेत्र शारदा मठ के अधीन आते हैं /
  
 //मठाम्नयाय - महानुशासन //
पूर्वामन्यायों द्वितीयः स्याद गोवर्धनमठ स्मृतः /
भोगवारः सम्प्रदायों वन अरण्ये पड़े स्मृतः //१०//

अंगबंगकलिङ्गाश्च मगधोउत्कलबर्बरा /
गोवर्धन मठाधीनः देशाः प्राचीव्यवस्थिता//१३//
अर्थात -
दूसरा आम्न्याय (मठ ) पूर्व दिशा में स्थित गोवर्धन मठ है /
इसका संप्रदाय भोगवार और इसके सन्यासियों का नाम वन और अरण्य है /
अंग (भागलपुर ) बंग (बंगाल ) कलिंग (दक्षिण पूर्व भारत ) मगध ,उत्कल (उड़ीसा ) और बर्बर (जांगल प्रदेश) गोवर्धन मठ के अधीन आते हैं /
  
 //मठाम्नयाय - महानुशासन //
तृतीयस्तुत्तराम्न्यायो ज्योतिर्नाम मठोभवेत् /
श्रीमठश्चेति व तस्य नामान्तरमुदीरितम् //१८//

कुरु कश्मीर -काम्बोज - पाञ्चालादि विभागतः /
ज्योतिर्मठवषा देशा उदीचीदिगवस्थिता //२२//
अर्थात-
तीसरा ामन्याय उत्तर दिशा में है , जिसको ज्योतिर्मठ या श्रीमठ कहते हैं / //१८//
कुरु (हस्तिनापुर ,कुरुक्षेत्र) कश्मीर काम्बोज (हरियाणा और पश्चिमोत्तर उत्तर प्रदेश ) पांचाल (पंजाब) तथा उत्तरदिशा के सभी प्रदेश इस मठ के अधीन हैं //२२//
  //मठाम्नयाय - महानुशासन //
तृतीयस्तुत्तराम्न्यायो ज्योतिर्नाम मठोभवेत् /
श्रीमठश्चेति व तस्य नामान्तरमुदीरितम् //१८//

कुरु कश्मीर -काम्बोज - पाञ्चालादि विभागतः /
ज्योतिर्मठवषा देशा उदीचीदिगवस्थिता //२२//
अर्थात-
तीसरा ामन्याय उत्तर दिशा में है , जिसको ज्योतिर्मठ या श्रीमठ कहते हैं / //१८//
कुरु (हस्तिनापुर ,कुरुक्षेत्र) कश्मीर काम्बोज (हरियाणा और पश्चिमोत्तर उत्तर प्रदेश ) पांचाल (पंजाब) तथा उत्तरदिशा के सभी प्रदेश इस मठ के अधीन हैं //२२//
 

 //मठाम्नयाय - महानुशासन //
चतुर्थो दक्षिणामन्याहः श्रृंगेरी तू मठो भवेत् /
सम्प्रदायों भूरिवारो भूर्भुवो गोत्रमुच्यते //२८//

आंध्र - द्रविड़- कर्नाटक -केरलादि प्रभेदतः /
शृङ्गेरीराधीना देशास्ते ह्यवाचीदिगस्थिता //३२//
अर्थात -
चौथा आम्नाय (मठ ) दक्षिण दिशा में है , जिसको श्रृंगेरी मठ के नाम से जानते हैं / इसका संप्रदाय भूरिवार है , और गोत्र भूर्भुवः है //२८//
आंध्र ------द्रविड़------कर्नाटक , केरल और इसके आसपास का क्षेत्र , श्रृंगेरी मठ के अधीन माने जाते हैं / /३२//
 
   संस्कृत ग्रंथों , अमरकोश के अनुसार -----द्रविड़ शब्द का मतलब धन --बल --- और पराक्रम , और शंकराचार्य के " मठाम्नयाय महानुशासनम्" के अनुसार ...श्रृंगेरी मठ के अधीन आने वाले प्रदेशों ---- केरल कर्नाटक आँध्रप्रदेश और द्रविड़ (जिसको आज तमिलनाडु ) के नाम से जाना जाता है /
बल -पराक्रम-और एक - प्रदेश / राज्य --को ईसाई पादरियों ने एक अलग नश्ल प्रमाणित कर दिया , , और हमने मान भी लिया /
पीछे लिखे पोस्टो में डॉ बुचनन (1807 ) तक ने इसे एक भौगोलिक स्थान माना /
रविंद्रनाथ टैगोर के द्वारा रचित राष्ट्रीय गीत में भी द्रविड़ को एक भौगोलिक संज्ञा माना गया "--द्रविड़ उत्कल बंग , विंध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छलि जलधि तरंग --
लेकिन 1900  AD आते आते ईसाइयत फैलाने की बदनीयत से ईसाई पादरियों ने--- द्रविड़ शब्द ---- को मुख्य भारत के जनमानस से अलग एक नयी रेस / नश्ल साबित कर दिया /