Thursday, 24 September 2020

कृष्ण: माइंड रीडर

#कृष्ण_माइंड_रीडर :

वैसे तो माना यह जाता है कि हिंसक पशु होते हैं। इसीलिये कई पशुओं के साथ हिंसक शब्द स्वतः जोड़ दिया जाता है।लेकिन यह मान्यता पूरी तरह से सत्यता से परे है। 

पशु प्रायः अपना पेट भरने या अपनी रक्षा हेतु हिंसा करता है। मनुष्य स्वभाव से हिंसक होता है। 

हिंसा का जन्म माइंड में होता है। पशु शरीर प्रधान है इसलिए उसकी हिंसा सीमित होती है।
मनुष्य माइंड प्रधान है इसलिए उसके अंदर हिंसा असीमित मात्रा में  और निरन्तर घटती रहती है।

यदि मनुष्य हिंसक न होता तो उसे अहिंसा की शिक्षा क्यो  दी जाती? पशुओं को तो अहिंसा की शिक्षा नहीं दी जाती।
 और यह देखा गया है कि ऋषियों मुनियों के आश्रम में ही नहीं हिंसक पशु उनके साथ रहते थे, वरन आज भी अनेक लोग तथातकठित हिंसक पशुओं को अपने साथ रखते हैं। क्योंकि उनके अंदर अहिंसा है - और पशु इसे पहचान लेता है। एक वीडियो होगी यु ट्यूब पर प्रसिद्ध डॉ आप्टे के बेटे की।  उसको देखिये। 

बात हो रही है #माइंड_रीडर योगिराज #कृष्ण की, जिन्होंने भगवतगीता के रूप में "मैन्युअल ऑफ माइंड" का उपदेश अर्जुन को दिया था।

 उन्हें कैसे पता कि धृतराष्ट्र भीम का बध करने का प्रयास करेगा? 
क्योंकि वे माइंड रीडर थे। 
यदि कभी आपके अंदर क्रोध अचानक फुट पड़ा हो, तो उस पर यदि आप ध्यान दीजिएगॉ तो पाइयेगा कि यह क्रोध जो अचानक फुट पड़ा था। बहुत से मामूली कारण से फूट पड़ा था। विचार करने पर  कालांतर में आपने पाया होगा कि आपके क्रोध की प्रतिक्रिया की तुलना में क्रोध को फूटने का अवसर उतपन्न करने वाली घटना बहुत छोटी थी। तुलनात्मक रूप से आपकी प्रतिक्रिया बहुत अधिक थी। बारूद की तुलना में चिंगारी बहुत सीमित थी। 
लेकिन आपका क्रोध हर स्थान पर, हर व्यक्ति के समक्ष्य नहीं फूटेगा।  क्रोध फूटेगा उसी के समक्ष्य , जिसके समक्ष्य आपका क्रोध बिना आपको तात्कालिक नुकसान पहुंचाए फूट सकता है। इतनी चेतना तो सदैव काम करती है। यह भी ध्यान से देखने वाली बात है। क्योंकि भय मनुष्य का ही सभी जीवों का मूल स्वभाव है। 
क्रोध ऐसे ही निर्मित और एकत्रित होता है। 
इसके निर्माण का आरंभ तब होता है जब आप किसी बात से असहमत होते हैं परंतु असहमति व्यक्त नही कर पाते किसी कारण। जानबूझकर या उचित अवसर के अभाव में। वह क्रोध आपके अंदर वाली मनस की खूंटी पर टंग जाता है। जितनी मात्रा में क्रोध निर्मित होता है उतनी ही मात्रा में आपके अंदर केमिकल और रसायन निर्मित होते हैं- जिनको मैं #इमोशनल_टोक्सिन कहता हूँ। वे कालान्तर में आपके अंदर डायबिटीज और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों की पृष्ठभूमि बनाते हैं। 

जो भी हमारे अंदर जाता है या निर्मित होता है उसका रेचन आवश्यक है। भोजन पानी अंदर जाता है - अनुपयोगी अंश मलमूत्र के रूप में रेचित होता है। सांस अंदर जाती है ऑक्सीजन के साथ - कार्बन डाई ऑक्साइड के साथ बाहर आती है- रेचित होती है। 
क्रोध भी निर्मित हो तो उसका रूपांतरण या रेचन आवश्यक है। अन्यथा वह इमोशनल टोक्सिन निर्मित करती है। 

बात भटक गयी। 
असहमति के प्रथम बीज से क्रोध का निर्माण शुरू होता है, और वह आपके अंदर टंगी खूंटी में टंगता जाता है। एक अवसर आता है कि क्रोध का घड़ा भर जाता है और एक छोटी सी चिन्गारी आपके क्रोध के घड़े में भरे बारूद में आग लगा देती है - और आप क्रोध से फट पड़ते हैं। 
यह है माइंड के काम करने का तरीका। 

कृष्ण माइंड रीडर हैं। 
योगी का एक अर्थ होता है माइंड को जानने वाला। 
माइंड को पढ़ने में वही सक्षम होगा जो माइंड को जानता होगा। 

धृतराष्ट्र है तो राजा - लेकिन वह राजा बनने के समय से ही असुरक्षित अनुभव करता रहता है - उसे राज के हाँथ से निकल जाने का भय निरन्तर बना रहता है। हर बार उस भय से उसके अंदर असहमति का जन्म होता है। क्रोध का जन्म होता है। 

क्योंकि वह पांडु से बड़ा था, नियमतः उसी को राजा होना था। लेकिन प्रकृति ने उसकी आंखें छीन ली थी। उसने उसको प्रकृति और संसार के प्रति सहज क्रोधी बना दिया था। क्रोध की ऊर्जा को काम की ऊर्जा में बदलकर उसने 100 पुत्र पैदा किए। 
जब उसके अपने पुत्र को राजा बनाने का अवसर आया तो पुनः संसार ने उससे यह अवसर छीन लिया। 

अब आइए - महाभारत के 18 दिन के युद्ध की तरफ। 
वह सदैव इस बात की जोड़ तोड़ में लगा रहता था कि किसी तरह पाण्डुपुत्र युद्ध करने के निर्णय से विरत हो जायँ, या युद्ध का परित्याग कर देवें। या कि कृष्ण ही सबसे घोटालेबाज थे, उन्ही के कारण उसके भतीजे युद्ध करने के लिए तैयार हुए थे। हर घटना पर उसकी आशापूर्ण प्रतिक्रियाओं को देखिये। मोस्ट पॉजिटिव माइंड सेट का व्यक्ति महाभारत में। कभी आशा छोड़ी ही नहीं उसने। 

 लेकिन हर घटना उसके मन के विरुद्ध घटती जाती है। हर क्षण वह युद्ध में घट रही घटनाओं से असहमत होता जाता है। यद्यपि वह भीम से भी अधिक बलशाली है।एक लाख हांथीयों का बल है उसके अंदर। लेकिन अपनी असहमति, और उससे उपजे क्रोध तथा हिंसा को बाहर निकानले के लिए वह युद्धक्षेत्र में नही जा सकता था क्योंकि अंधा था। रेचन नही कर सकता था क्रोध और हिंसा का। 
अतएव क्रोध निरन्तर उसके अन्दर संचित होता रहता है। 
पांच पांडवों में भीम ही ऐसा व्यक्ति था जो निरन्तर बिना शंसय के युद्ध करता आया था - बिना धर्म अधर्म आदि के चक्कर मे फंसे हुए। 
भीम ही वह व्यक्ति था जिसने उसके सबसे अधिक पुत्रो का बध किया था। 
भीम ही वह व्यक्ति था, जिसने उसके सबसे अधिक प्रिय पुत्रो दुशासन और दुर्योधन का जघन्य पूर्वक हत्या की थी।
इसलिए उसके क्रोध का घड़ा भर चुका था। फूटने का अवसर चाहिए था। बारूद एकत्रित हो चुका था। चिंगारी भर की देर थी। 
भीम को देखते ही उसका क्रोध फट पड़ता - यह बात माइंड रीडर कृष्ण जानते थे। इसीलिए उन्होंने धृतराष्ट्र के आमंत्रण पर भीम को पीछे करके, उसके पुतले को गला लगाने हेतु आगे प्रेषित कर दिया। 

उसके क्रोध का घड़ा फूटते ही वह एक बच्चे की भांति शांत हो जाता है, बिलख बिलख कर रोने लगता है।

हमारे ग्रन्थ लिखे हैं गुह्य भाषा मे - जिनको आजकल cryptology या cryptic भाषा कहते हैं। उनको डिकोड करने की आवश्यकता है - नयी पीढ़ी तक पंहुंचाने के लिए। क्योंकि उन्हें शास्त्रों की भाषा नही समझ मे आती है। क्रिप्टोलॉजी उनको समझ मे आती है।

दोष उनका नही है - उन्हें इसी भाषा मे शिक्षा दी जा रही है। या तो हम ग्रंथ को उनकी समझ के अनुरूप डिकोड करें या उनको शाश्त्रो की भाषा मे पढने की व्यवस्था निर्मित करें।

Singh Tri Bhuwan

Wednesday, 23 September 2020

वाणी और मन: स्पीच एंड माइंड

#स्पीच_एंड_माइंड: वाणी और मन 

ॐ वाक् मे मनसि प्रतिष्ठिता।
मनो मे वाचि प्रतिष्ठिता।।
- सरस्वती रहस्योपनिषद

ऋषि का आग्रह है कि मेरी वाणी मेरे मन मे प्रतिष्ठित हो जाय। और मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाय।  कहने का तात्पर्य है वाणी और मन मे तालमेल बैठ जाए। दोनों में भेद न रहे। दोनों एक ही हो जाय। 

हमारे विचार ही उपद्रव हैं। हमारे  अंदर चलने वाले समस्त झगड़ा, झन्झट, अशांति, बेचैनी, सब के सब हमारे  विचारों की देन है। हम उपद्रव पालते हैं विचारों के रूप में। जितना बड़ा विचारक उतना उपद्रवी मन। इसीलिए विचारकों (Thinkers) को भारत में कोई महत्ता नहीं मिली। पश्चिम में विचारकों को बड़ी महत्ता है। क्योंकि वे मन बुद्द्धि और विचार से आगे जा ही नहीं पाए। 

 मन का स्वभाव है कि वह खाली नहीं बैठ सकता। उसको कोई सहारा चाहिए। माइंड अर्थात बन्दर। उसे उछल कूद ही पसंद है। मन को चाहिए उपद्रव, व्यस्तता,  ऑक्यूपेशन। वे कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर। Empty mind is devil's workshop. 
साइकाइट्री में आजकल माइंड का स्वभाव बता रहे हैं #Monkeying । 

और वाणी है संसार मे होने वाले झगड़ा झंझटों की जड़। सारे विवादों की जड़ है वाणी। वाणी के कारण ही समस्त झगड़े शुरू होते हैं।  और हमारी वाणी का शत प्रतिशत हिस्सा प्रायः प्रतिक्रिया है,  रिएक्शन है। क्योंकि हमारा स्वभाव ही रैक्शनरी है। हमारी वाणी प्रायः किसी न किसी विचार या किसी न किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया में निकलती है। यंत्रवत, रोबोटिक।

 हम हर बात पर रियेक्ट करते हैं। हर उस बात पर, जो हमें उकसाती है,  उस पर हम रियेक्ट करते हैं - पहले माइंड से, फिर वाणी से।

 रियेक्ट क्यों करते हैं? इसलिए कि हमने पहले से तय कर रखा है कि सही क्या है गलत क्या है। हमने संसार को अपने लाइक और dislike मे बांट रखा है।

"इन्द्रियस्यइन्द्रियर्थेषु राग द्वेष व्यवस्थितौ" - भगवतवीता।

 हमारा  जब भी किसी वस्तु व्यक्ति भाव या विचार से साक्षात्कार होता है तो हम निर्णयात्मक रूप से उसे या तो पसंद करते हैं या नापसंद। अपने संस्कारों, संस्कृतियों, शिक्षा और अपने विचारों  आदि के कारण ऐसा होता है। यह सामान्य बात है। लाइक और dislike हमारी मनोदशा का अंग है।  यह प्राकृतिक स्वभाव है माइंड का। across the globe mind works with this inherent attitude. So mind is not only individual but cosmic too.  ऐसे ही  हम संसार को देखते हैं। जिसको अटटीच्यूड कहते हैं आजकल। 

ऋषि कहता है कि उसकी वाणी उसके मन मे प्रतिष्ठित हो जाय। अर्थात जो मन मे हो वह ही वाणी से निकले। वही मुखरित हो तो मन में विचार चल रहा हो। 

 लेकिन जो मन में है वही वाणी से प्रकट हो जाय तो घर परिवार संसार मे, सर्वत्र उपद्रव खड़ा हो जाय। कोई पुराना मित्र मिलता है।  उसके लिए हमारे मन मे क्रोध है, घृणा है, अनादर है, उसका गला दबाने की इच्छा है मन में, कि अवसर मिले तो इसका गला दबा दूं।  लेकिन उसे व्यक्त नहीं कर सकते? हम कहते हैं - अहोभाग्य मित्र, बड़े दिनों बाद दर्शन हो रहे हैं। वह भी प्रतिक्रिया में यही बोलेगा। परंतु संभबतः उसके अंदर भी हमारे प्रति वही भाव और विचार हों मन मे। इसलिये हम मुखौटा ओढ़ लेते हैं, सभ्यता का मुखौटा।  असली अटटीच्यूड नहीं दिखाते उसे अपना। हम कहते हैं कि अहोभाग्य मित्र, बड़े दिन बाद आपके दर्शन हो रहे हैं। 

बारम्बार यही अभ्यास करते करते धीरे धीरे ऐसा ही व्यक्तित्व हमारा बन जाता हैं - झूंठा व्यक्तित्व। बाहर से कुछ और अंदर से कुछ और।  इसको हम पर्सनालिटी बिल्डिंग कहते हैं। लेकिन यह बेचैनी और अशांति की जड़ है। क्योंकि यह विभक्त व्यक्तित्व है। साइकेट्रिस्ट इसे कहते हैं - split Personality.  Dissociated Personality Disorder ( भूल भुलैया नामक फ़िल्म इसी पर बनी है) 

इसीलिये ऋषि की प्रार्थना है कि जो मेरे मन मे हो,  वही मेरी वाणी में हो। वाणी से वही बात निकले - जो मेरे मन मे हो। चाहे भला और चाहे बुरा। 

लेकिन संसार मे समस्या यह है कि जो मन में हो, और यदि वही बात निकल भी आवे तो लात खाने की संभावना बढ़ती जाएगी -
"बातहिं हांथी पाइए।
बातहिं हांथी पाव।।"

तो फिर जीवन कैसे सम्भब होगा? 
मन को निर्मल करने से, यह संभव होगा कि मन में वही विचार और भाव उत्पन्न  हों जिन्हें छुपाने की आवश्यकता न पड़े। वह कैसे होगा?
 
राग द्वेष, लाइक और dislike को पीछे रखकर संसार को देखने का अभ्यास करना होगा। "See the things as they are." कठिन है। क्योंकि हम चीजों को वैसे देख नहीं सकते जैसी वह हैं। हम उन पर अपने भाव, विचार, अवधारणाएँ, पसंद, नापसंद आरोपित करके देखते हैं। क्योंकि हमारे मन दुराग्रह से भरे हैं। 
तभी तो ऋषि प्रार्थना कर रहा है सरस्वती जी से। 

ऋषि की दूसरी प्रार्थना है कि मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो जाय। अर्थात मुझे जब बोलने की आवश्यकता हो तभी मेरा मन, मेरा माइंड काम करे। वरना वह शांत बैठा रहे। यह और भी कठिन है। लेकिन यह एडवांस्ड कोर्स है। पहले वाला बेसिक कोर्स था। बेसिक वाला कोर्स होने के बाद ही इस कोर्स में प्रवेश मिलेगा।

  हमारा मन तो चलता ही रहता है दिन रात। 24 घण्टे, अनवरत, दिन रात माइंड चलता ही रहता है। लेकिन माइंड और बॉडी हमारे टूल हैं, यंत्र हैं। उनको हमारे हिसाब से चलना चाहिए न?

हमारे कमरे में ए सी लगा है, पंखा लगा है, कंप्यूटर लगा है। सभी यंत्र हैं। सब हमारे हिसाब से चलते हैं। जब हम उन्हें चलाना चाहते हैं तो स्विच ऑन कर देते हैं। जब बन्द करना होता है तो स्विच ऑफ कर देते हैं।

 माइंड को भी ऐसे ही काम करने की ट्रेनिंग देनी होगी कि जब वाणी की आवश्यकता हो, जब बोलने की आवश्यकता हो तो माइंड काम करे, अन्यथा चुपचाप बैठा रहे - शांत, चैन से, आराम से - At ease, Not disease। Completely silent. शून्य, सन्नाटा।  बहुत कठिन है।  इसीलिए प्रार्थना की जा रही है सरस्वती जी से। 

वैदिक साइंस में जिस  शक्ति को सरस्वती के नाम से पुकारा जाता रहा है, उसे आज की भाषा मे बोला जाय तो सरस्वती हमारे माइंड और वाणी को को-ऑर्डिनेट करने वाली आंतरिक ऊर्जा या शक्ति का नाम है। 

हम हर एनर्जी को प्रणाम करते हैं। परमात्मा भी हमारे अंदर है एनर्जी के रूप में। जिसे हम चेतना या चैतन्य कहते हैं - Counciousness. 
Counciousness is fundamental - Max Plank, Nobel Prize winner Quantum Physicist. 

इसीलिए हमारे शास्त्रों में सरस्वती जी की पूजा की जाती है - क्योंकि वे माइंड और वाणी की कंट्रोलर हैं। कंट्रोलर की कृपा बनी रहे तो हांथी मिल जाय पुरस्कार स्वरूप। और कृपा न बन पायी तो -   हांथी के पैर के नीचे कुचले भी जा सकते हैं:

बातहिं हांथी पाइए।
बातहिं हांथी पाव।।

इसीलिये हम जब हम प्रार्थना करते हैं:

वर दे वीणा वादनि
वर दे। 

तो हम अपने अंदर की उस ऊर्जा और शक्ति से प्रार्थना करते हैं कि हे माँ मुझे ऐसा वरदान दे कि बुद्द्धि और वाणी हमें हांथी तो दिलवावे, हांथी पाव न दिलवावे।

®त्रिभुवन सिंह

Cherish or Perish: It's your choice

#Perish_or_cherish :. Choice is yours. 
 दुखी रहो या आनंदित रहो। चुनाव तुम्हारा। 

मैं खोज रहा हूँ किसी सुखी व्यक्ति को। मेरे जीवन में तो कोई न दिखा - सुखी संतुष्ट शांत। 
सुख की परिभाषा चार्वाक से लेकर सबने किया है। चार्वाक कहता है ऋण लेकर घी पियो। आजकल कौन घी पीता है?

 बॉलिवुड कभी माया नगरी कहलाती थी। धन नाम सब कमाया। फिर भी सुख खोज रहा है वीड ( गांजे) में, हैश ( ड्रग्स) में। सुख शांति होती तो क्या आवश्यकता थी वीड की, और  हैश की शरण मे जाने की?
कुछ ड्रग की शरण में है तो कुछ डायबिटीज ब्लड प्रेशर की। 

कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि सुखी व्यक्ति कौन है। 

शक्नोतीहैव य: सोढुम् प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामकोध उद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नर:।।
-(भगवतगीता 5.23) 

प्राक् शरीर विमोक्षणात:
शरीर को त्यागने के पूर्व। शरीर तो त्यागना ही पड़ेगा। कब? यह किसी को नहीं पता। लेकिन त्यागना पड़ेगा। जिसने जन्म लिया है उसको मरना होगा। यही ध्रुव सत्य है। 
कृश्नः पहले ही कह चुके हैं : जातस्य हि ध्रुवों मृत्यु:। जिसने जन्म लिया है वह मरेगा यह ध्रुव सत्य है। यह परम सत्य है। हर व्यक्ति इस ध्रुव सत्य से परिचित है। 

मृत्यु का महोत्सव चल रहा है पूरे विश्व में। एक छोटे से जीव के कारण - विषाणु - covid 19. इतना शूक्ष्म है कि देखा नहीं जा सकता आंखों से। फिर भी मृत्यु का तांडव उसने फैला रखा है। जो कल तक हमारे साथ हंस बोल रहे थे। जीवन के हर उत्सव में, हर दुःख में हमारे साथी थे, सहयोगी थे, वे आज हमारे साथ नहीं हैं। 
 
हम शरीर को न छोड़ना चाहें तो भी शरीर हमसे छूटेगा ही। और जब शरीर छूटेगा तो समस्त कामनाएं, समस्त योजनाएं, समस्त धन पद प्रतिष्ठा छिन जाएगी। छोड़ना पड़ेगा। यही सत्य है। 

शक्नोति इह एव य: सोंढुम्
 - जो समर्थ है इसको रोकने में।
क्या रोकने में?

काम क्रोध उद्भवं वेगं:

काम और क्रोध के उद्भवं के वेग को। जो काम और क्रोध के उद्भवं के वेग को रोकने में समर्थ है वही योगी है और वही सुखी मनुष्य है। 

काम और क्रोध दोनों वेगवान होते हैं। दोनों में  वेग होता है। 
काम अर्थात कामना। इच्छा तृष्णा विषय वासना। 

वैसे तो 
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
   बहुत निकले मेरे अरमां फिर भी कम निकलें। 

इच्छाएं तो अनंत हैं - लेकिन तीन इच्छाएं ही सब के मूल में हैं - सेक्स, धन, पद या प्रतिष्ठा। जीवन की समस्त कामनाएं इन्हीं के इर्द गिर्द घूमती हैं। 
इच्छाएं हर क्षण नए नए रूप लेती हैं। लेकिन इच्छाये जब गहन आसक्ति का रूप लेती हैं तो कामनाएं प्रगाढ़ होने लगती हैं। उनमें वेग आने लगता है। फिर उन पर हमारा नियंत्रण खो जाता है। फिर लैला मजनू की कहानी बन जाती है। उन कामनाओं की पूर्ति न हो तो जीवन व्यर्थ। अवसाद निराशा आत्महत्या। 

कामनाओं की पूर्ति न हो तो उनसे क्रोध का भी जन्म हो सकता है।
जो चाहते थे वह हो सकता था। लेकिन हो न सका। किसी ने रोड़ा अटका दिया। किसी ने कामनाओं की कोठरी में आग लगा दिया। उसके प्रति मन क्रोध की अग्नि  धधक  उठेगी। और उस  क्रोध का वेग इतना अधिक हो सकता है कि यह हिंसक स्वरूप ले सकता है। सामने वाले का सर फूट सकता है। उसकी हत्या हो सकती है। इतना वेगवान भाव हैं यह। इन पर हमारा नियंत्रण न रहा। उसी की बात कर रहे हैं कृष्ण। 

वह कह रहे हैं - शरीर छूटने पर काम का भी अवसान हो जाएगा और क्रोध का भी। मुर्दे की क्या कामना हो सकती है?
जो कल अपने आप होना है, क्या उसे आज आप समझदारी के साथ, बोध के साथ नहीं कर सकते क्या?

 यदि कोई व्यक्ति जागकर इस तथ्य को देख सके तो वह काम और क्रोध के उद्भव और उसके वेग को रोकने में समर्थ हो सकता है। वही व्यक्ति योगी होता है । और वही व्यक्ति सुखी हो सकता है। 
अन्यथा तो बुद्ध कहते हैं कि चाहे जो कर लो : जीवन दुख है। 
एक राजा ने इसको अनुभव किया - जिसके पास पाने को सब कुछ था, और खोने को जीवन। 

©त्रिभुवन सिंह

Tuesday, 22 September 2020

ब्रिटिश दस्युओं ने कितने भारतीयों को एकलव्य बनाया?

पुरानी पोस्ट है : #एकलव्य_महाभारत को संदर्भित करके ऊंची नीची जाति तथा शोषण का प्रोपगंडा फैलाने वालों से अपेक्षा है कि वे मात्र कुछ सौ वर्ष पहले हमारे शिल्पकारों के अंगूठे काटे जाने के सत्य इतिहास से परिचित होंगे। 

1772 के #एकलव्यों का  अंगूठा किस द्रोणाचार्य ने काटा था ? 

आज एक उद्भट विद्वान की वाल पर गया, जो उच्च शिक्षा आयोग में निरन्तर कई वर्ष तक सदस्य रहे हैं। 
#शम्बूक_कथा पर अपने पद के अनुरूप ही  अति गर्वीली पोस्ट लिखी थी। 

मैंने मात्र दो कमेंट लिखा और वे धराशायी हो गए। 
सत्य एक ही होता है। असत्य के अनेकों स्वरूप और कलेवर होते हैं। एक बार आप जोर से दहाड़िये तो। 
पेंट गीली होना निश्चित है। 

#मिथक के एक #एकलव्य के #अंगूठा काटने को लेकर भारत मे 3000 या 5000 वर्षो के अत्याचार का #रंडी_रोना मचाए वामियों और दलित चिंतको , मात्र 250 साल पहले सिल्क के कपड़े बनाने वाले भारतीयों ने #अपने_अंगूठे_खुद काट लिए। वे कहां गए क्या हुवा उनका? 10,000 साल की कथा तुम्हे पता है और 200 साल की कथा तुम्हे नही याद है।
तुम निम्न किस्म के केंचुए हो। स्वार्थ घृणा और  कुंठा से भरे हुए जोंक हो तुम। 
क्योंकि तुमको देश का खून चूसने और झूंठ का ढिंढोरा पीटने में आनंद आने लगा है। 

ब्रिटिश दस्युवो ने तुमको नष्ट किया बर्बाद किया और तुमको एकलव्य और शम्बूक का झुनझुना थमा दिया:

 “18वी शताब्दी मे विश्व के अन्य देशों की तरह ही, भारत मे भी सड़क या नदी से होने वाले व्यापार पर ड्यूटी लगा करती थी। लेकिन ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक सरकारी फरमान प्राप्त कर लिया था जिसके माध्यम से आयातित या निर्यात होने वाली वस्तुओं को टैक्स फ्री कर दिया था। अतः कंपनी द्वारा निर्यातित या आयातित किसी भी वस्तु पर टैक्स नहीं लगता था”।

(रिफ्रेन्स – रोमेश दुत्त इकनॉमिक हिसटरि ऑफ ब्रिटिश इंडिया, पेज -18)

"1757 मे मीर जफर को बंगाल का नवाब  बनाया गया लेकिन मात्र 3 साल बाद 1760 मे उसके ऊपर असमर्थ बताकर मीर कासिम को नवाब बनाया , जिसने कंपनी को बर्धमान मिदनापुर और चित्तगोंग नामक तीन जिलों का रवेनुए तथा मीरजाफ़र पर द्वारा दक्षिण भारत मे हुये युद्ध मे कंपनी द्वारा खर्च  किए गए, देय उधार धन 5 लाख रुपये कंपनी के खाते मे जमा करवाया"।
 ( रोमेश दुत्त – पेज -19 )

लेकिन उसके बाद सभ्य अंग्रेजों ने जो आम जनता के द्वारा निर्मित वस्तुओं की लूट मचाई, वो किसी भी सभ्य समाज द्वारा एक अकल्पनीय घटना है।  उस दृश्य को आप बंगाल के नवाब द्वारा मई 1762 को ईस्ट इंडिया कंपनी को लिखे पत्र से समझा जा सकता है:
 “ हर जिले, हर परगना , और हर फ़ैक्ट्री मे वे ( कंपनी के गुमाश्ते ) नमक, सुपाड़ी, घी , चावल धान का पुवाल ( सूखा डंठल, जरा सोचिए क्या क्या खरीद कर ये दरिद्र समुद्री डकैत खरीद कर यूरोप ले जाते थे ) बांस ,मछली ,gunnies अदरक चीनी तंबाकू अफीम और अन्य ढेर सारी वस्तुयेँ,जिनको लिख पान संभव नहीं है , को खरीदते बेंचेते रहते हैं । वे रैयत और व्यापारियों की वस्तुए ज़ोर जबर्दस्ती हिंसा और दमन करके ,उनके मूल्य के एक चौथाई मूल्य पर ले लेते हैं , पाँच रुपये की वस्तु एक रुपए मे लेकर भी वे रैयत पर अहसान करते हैं। 

 प्रत्येक जिले के ओफिसर अपने कर्तव्यो का पालन नहीं करते और उनके दमानात्मक रवैये और मेरा टैक्स न चुकाने के कारण मुझे प्रत्येक वर्ष 25 लाख रुपयों का नुकसान हो रहा है। मैं उनके द्वारा किए गए किसी समझौते का न उल्लंघन करता हूँ न भविष्य मे करूंगा , तो फिर क्यूँ अंग्रेज़ो के उच्च अधिकारी मेरा अपमान कर रहे हैं, और मेरा निरंतर नुकसान कर रहे हैं ”।
( रोमेश दुत्त पेज – 23 ) 

सभ्य बनाने आए इयसाइयों के नैतिक ऊंचाई को आप इस एक उद्धरण से ही माप सकते हैं।

यही बात ढाका का कलेक्टर महोम्मद अली ने कलकत्ता के अंग्रेज़ गवर्नर 26 मई 1762 मे लिखा “पहली बात तो ये है कि व्यापारी  फ़ैक्टरी मे रुचि दिखा रहे हैं और अपने नावों पर अंग्रेजों का झण्डा लगाकर अपने को अंग्रेजो का समान होने का दिखावा करते हैं , जिससे कि उनको duty न देना पड़े। दूसरी बात ढाका और लकीपुर की फ़क्टरियाँ व्यापारियों को तंबाकू सूती कपड़े , लोहा और अनेक विविध वस्तुओं को बाज़ार से ज्यादा दामों मे खरीदने का प्रलोभन देते हैं, लेकिन बाद मे जबर्दस्ती वो पैसा उनसे छीन लेते हैं; वे व्यापारियों को पैसा एडवांस मे देते हैं।

लेकिन फिर उनके ऊपर एग्रीमंट तोड़ने का बहाना बनाकर उनके ऊपर फ़ाइन लगाते हैं । तीसरी बात लुकीपुर फैक्ट्री के गुमाश्ते तहसीलदार से ताल्लूकदारों से उनके ताल्लूक ( कृषि योग्य जमीन ) को निजी प्रयोग के लिए जबरन कब्जा कर लेते हैं , और उसका भाड़ा  भी नहीं देते।  कुछ लोगों के कहने पर ,कोई शिकायत होने पर वे यूरोपेयन लोगों को एक सरकारी आदेश का परवाना लेकर गावों मे जाकर उपद्रव करते हैं। वे टोल स्टेशन बनाते हैं और जो भी किसी गरीब के घर समान मिलता है उसको बैंचकर पैसा बनाते हैं। इन उपद्रवों के कारण पूरा देश नष्ट हो गया है और रैयत न अपने घरों मे रह सकते हैं और न ही मालगुजारी चुका सकते हैं।  मिस्टर चवालीर ने कई स्तर पर झूँटे बाजार और झूंठे फक्ट्रिया बनाया हैं, और अपनी तरफ से झूंठे सिपाही बनाए हैं जो जिसको चाहे उसको पकड़कर उनसे जबरन अर्थदण्ड वसूलते हैं । उनके इस जबर्दस्ती के अत्याचारों के कारण कई हाट बाजार और परगना नष्ट हो गए हैं। ” 
( रोमेश दुत्त पेज 24- 25 )

“इस तरह बंगाल के प्रत्येक महत्वपूर्ण जिले के व्यापार को कंपनी के नौकरों और अजेंटों ने नष्ट किया और इन वस्तुओं के निरमातों को निर्दयता के साथ अपना गुलाम बनाया । उसका वर्णन एक अंग्रेज़ व्यापारी विलियम बोल्ट्स ने आंखो देखी हाल खुद लिखा है :
“ अब इस बात को सत्यता के साथ बताया जा सकता है कि वर्तमान मे यह व्यापार जिस तरह इस देश मे हो रहा है , और जिस तरह कंपनी अपना इनवेस्टमेंट यूरोप मे कर रही है,वो एक दमनकारी प्रक्रिया है; जिसका अभिशाप इस देश का हर बुनकर और निर्माता भुगतने को मजबूर है, प्रत्येक उत्पाद को एकाधिकार मे बदला जा रहा है ; जिसमे अंग्रेज़ अपने बनियों और काले गुमाश्तों के मदद से, मनमाने तारीके से यह तय करते हैं कि कौन निर्माता किस वस्तु का कितनी मात्रा मे, और किस दर पर निर्मित करेगा ...गुमाश्ते औरंग या निर्माताओं के कस्बे मे पहुँचने के बाद वो एक दरबार लगाता है जिसको वह अपनी कचहरी कहता है। 

जिसमे वो अपने चपरासी और हरकारों की मदद से वो दलाल और पयकार और बुनकरों को बुलाता है, और अपने मालिक द्वारा दिये गए धन मे से कुछ पैसा उनको एडवांस मे देता है और उनसे एक एग्रीमंट पर दस्तखत  करवाता है जिसके तहत एक विशेष प्रॉडक्ट , एक विशेष मात्रा मे, एक विशेष समय के अंदर डेलीवर करना है। उस मजबूर बुनकर की सहमति आवश्यक नहीं समझी जाती है। और ये गुमाश्ते, जो कंपनी के वेतनभोगी थे , प्रायः इस तरह के एग्रीमंट उनसे अपने मन मुताबिक करवाते रहते थे; और यदि बुनकरों ने ये एडवांस रकम स्वीकार करने से इंकार किया तो उनको बांधकर शारीरिक यातना दी जाती है.... कंपनी के गुमाश्तों के रजिस्टर मे बहुत से बुनकरों के नाम दर्ज रहते थे, जो किसी दूसरे के लिए काम नहीं कर सकते थे, और वे प्रायः एक गुलाम की तरह एक गुमाश्ते से दूसरे गुमाश्ते के हाथों तब्दील किए जाते रहते हैं, जिनके ऊपर दुष्टता और अत्याचार हर नए गुमाश्ते के हाँथो बढ़ता  ही जाता है ... इस विभाग मे जो अत्याचार होता है वो अकल्पनीय है ; लेकिन इसका अंत इन बेचारे बुनकरों को धोखा देने मे ही होता है; क्योंकि गुमाश्तों और जांचकारो ( कपड़े की क्वालिटी जाँचने वाला ) द्वारा जो दाम उनके प्रोडक्टस का ताया किया जाता था वो कम से कम बाजार के दाम से 15 से 40 % कम होता है ...।

बंगाल के बुनकरों के साथ, कंपनी के अजेंटों द्वारा जबर्दस्ती किए गए इन अग्रीमेंट्स को पूरा न करने की स्थिति मे, उनके खिलाफ मुचलका जारी किया जाता था , उसके तहत उनके सारे सामान (कच्चा और पक्का माल ) उस एग्रीमंट की भरपाई के लिए कब्जा कर लिया जाता है और उसी स्थान पर उनको बेंच दिया जाता है ; कच्चे सिल्क को कपड़ों मे बुनने वाले लोगों के, जिनको Nagoads कहते हैं, उनके साथ भी इसी तरह का अन्याय होता है, और ऐसी घटनाए आम बात हैं जिसमे उन्होने जबर्दस्ती #सिल्क के #कपड़े #बनाने की #मजबूरी से बचने के लिए स्वयं ही अपने #अंगूठे #काट लिए / 

( and the winders of raw silk , called Nagoads, have been known of their cutting off their thumbs to prevent their being forced to wind silk ) 
(Ref: Consideration on India affairs (London 1772), p 191 to 194 : from Romesh Dutt ; Economic History of British India , page 25-27 )

इस सच्चाई तक तुम्हारी पहुंच नही है धूर्त और मक्कारों?
इसीलिये पुस्तक का नाम लिखा है। गूगल आर्काइव से डाउनलोड करो और पढो।

Sunday, 20 September 2020

Be Positive: How and How: Patanjali guides you

#उत्तिष्ठत_जाग्रत:

उत्तिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरानिबोधत्। 
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति।।
-कठोपनिषद 

यह स्वामी विवेकानंद का अत्यंत प्रिय मंत्र था। बहुत से लोग समझते हैं कि उनके द्वारा रचित मंत्र है। लेकिन ऐसा नहीं है। यह कठोपनिषद से उद्धरित है। 

उत्तिष्ठत जाग्रत : उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य क्या सोया हुवा है? जो उसे कह रहे हैं कि उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य तो प्रतिदिन 6 से 8 घण्टे सोता है। उसके अतिरिक्त समय में जगा हुवा है। उठा हुवा है। कुछ न कुछ कर रहा है। तो फिर ऐसा क्यों कहा ? 

वस्तुतः जैसा हमारा जीवन है, उसमें हम सोए सोये ही जीते हैं। रात में भी सोते सोते सपने देखते हैं। दिन में भी सपने देखते हैं - दिवास्वप्न। मुंगेरीलाल के हसीन सपने। हसीन सपने सिर्फ मुंगेरीलाल ही नहीं देखता। हम समस्त लोग मुंगेरीलाल की तरह ही सपने देखते हैं। लेकिन इसका हमें बोध ही नहीं है कि हम सदैव सपने देखते रहते हैं। सोते सोते और जागते। इसका बोध तब होगा यदि अपने मन को देख सकोगे तब। एक इच्छा मन में उभरी। उसके उपरांत उसको पूरा करने की योजनाएं मन में चलने लगीं। सब हवा में है। इच्छा भी और उसको पूर्ण करने की योजना भी। आप घर से आफिस जाने के लिए निकले अपनी गाड़ी में। और आफिस पहुंचते पहुंचते आपने अपने मन मे सैकड़ो योजनाएं बनाये और रद्द किया। कब आफिस पहुंच गए। पता भी न चला। कितनी योजनाएं मन मे बनी यह भी याद नहीं रहा। आपने गाड़ी भी ड्राइव किया और सपने भी बुनते रहे। ऐसा ही न हो रहा है। 

तुलसीदास ने कहा-
"मोहनिशा जग सोवनहारा।
देखत सपना विविध प्रकारा।।
कृष्ण ने कहा -" या निशा सर्वभूतेषु जागर्ति तस्य संयमी"। 

इसी को कहा जा रहा है। उत्तिष्ठत जाग्रत। उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। बेहोशी का जीवन मत जियो। अब भी समय है। कबीर कहते हैं :
कहैं कबीरदास कब से बही।
जब से चेता तब से सही। 

जन्म के समय भी तुम्हे होश नहीं था। मृत्यु के समय भी बेहोश रहोगे। बीच में बचा जीवन। वह भी बेहोशी में बिता दोगे क्या। इसलिए उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। 

प्राप्य - जो प्राप्त करने योग्य है। क्या प्राप्त करने योग्य है इस जीवन में? बचपन से ही हम बच्चों को सपने में जीने का, सपने देखने का शिक्षण और प्रशिक्षण देना शुरू कर देते हैं। #Dream_Big। बड़े सपने देखो। महत्वाकांक्षा पालो। आकांक्षा भी नहीं। महत्वाकांक्षा। 
बच्चा अभी विद्यालय की देहरी भी नहीं डांक भी नहीं पाया था कि माता पिता अडोसी पड़ोसी पूंछने लगते हैं कि क्या बनोगे? महत्वाकांक्षा का बीज बो दिया बच्चे के अंदर। सपने बो दिए गए उसके मन में। असंतुष्टि के बीज रोप दिया गया। तृष्णा के बीज उसके मन मे बो दिया गया। 

अब बच्चा लग गया जीवन के अंधी दौड़ में। गला काट प्रतियोगिता। अब बनेगा कुछ। जो है वह नहीं रह जायेगा। आवरण चढ़ने लगेगा उस पर। मुखौटा धारण करेगा। बनने की दौड़ में लगा तो बन गया डॉक्टर इंजीनियर आईएएस पी सी एस, थानेदार, ठीकेदार। अब उसे चाहिए धन मान सम्मान। डॉक्टर बना था सेवा करने के लिए। आईएएस बना था देश सेवा करने लिये। लेकिन बनते ही, सेवा पीछे रह गयी। धन कमाने की दौड़ में सम्मिलित हो गया। शादी व्याह प्रेम मोहब्बत बाल बच्चे की दौड़ में सम्मिलित हो गया। धन भी अब संतुष्ट नही कर सका उसको। अब उसे चाहिए राजनीति में जाने के लिए पार्टी का टिकट। लोक प्रतिष्ठा चाहिए उसे। लोग पहचाने सम्मान दें। प्रयागराज जैसे छोटे शहर में चुनाव का मौसम आते ही आठ दस डॉक्टर कुर्ता पजामा गांठकर टिकटार्थियों की लाइन में लग जाते हैं। 

धन और पद कमाते ही उसका मद सर पर चढ़कर बोलने लगता है।
शराब तो उतर जाती है कुछ घण्टे बाद। धन और पद का मद 24 ×7× 375 चढ़ा रहता है। मद बना है मद्य से। मद्य अर्थात शराब। पद का मद देखिये किसे तरह चढ़ता है।
प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं।
को नर अस जन्मा जग माहीं।
- रामचरित मानस। 

 एक डीएम,  जो बचपन मे फैजाबाद पैसेंजर से आता था इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने, अब उन्ही लोगों को घास पात समझने लगता है, जिनके बीच से आया था। इसी को कहा जा रहा है बेहोशी में जीना, सपने में जीना। मद्य उतरती ही नहीं उसके मस्तिष्क से। 
ला पिला दे साकिया पैमाना पैमाने के बाद।
होश की बातें करेंगे होश में आने के बाद। 
पैमाने पर पैमाना पिये चला जा रहा है मनुष्य। धन का पैमाना, पद का पैमाना। होश है ही नहीं। बेहोश है व्यक्ति। 
पूरा जीवन बनने में, मुखौटा पहने हुए, असंतुष्टि में व्यतीत हो गया। तुष्टि क्या है इसका स्वाद भी न चखा। 

और इसी तरह एक समय आता है कि जिंदगी की शाम आ जाती है। बेहोशी में जन्मे, बेहोशी में जिये, बेहोशी में मर गए। होश क्या है इसका स्वाद ही न चखा जीवन में। 

क्या यही प्राप्य था जीवन का? क्या यही अभीष्ट था जीवन का। बच्चे को सिखाते गए कि होश से काम करो। ध्यान से काम करो। लेकिन ध्यान क्या है, होश क्या है इसको न सिखाया। सिखाते कैसे? स्वयं भी तो बेहोश ही जीवन जी रहे थे। 

तो मंत्र कह रहा है : प्राप्य वरानिबोधत। 
प्राप्य क्या है? प्राप्त करने योग्य क्या है? वह सद्गुरु जिसने बोध को प्राप्त किया हो। जिसने बोध को जाना हो ऐसा पुरूष। जिसने जागरण की कला जाना हो ऐसा सद्गुरु। वही प्राप्य है। वही बता सकेगा कि जागरण क्या है, होश क्या है, बोध क्या है। जिसने जाना है वही सिखा सकेगा यह कला। 

कबीर कहते हैं : कर्म करे निष्काम रहे जो ऐसी जुगति बतावे सो सद्गुरु कहावे। हर व्यक्ति सद्गुरु नहीं हो सकता। जो प्रवचन दे निष्काम कर्म का वह लेकिन युक्ति नहीं जानता है उसकी। वह है पंडित। वह सद्गुरु नहीं है। सद्गुरु तो वही है जो उसकी युक्ति सिखाता हो।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति। 
कवयो अर्थात सद्गुरु ऋषि - जिसने उस बोध को प्राप्त किया है। जो जाग्रत है। वह बताता है कि उस बोध को प्राप्त करने का पथ बड़ा दुर्गं है। कठिन है। असम्भव नहीं। कठिन - तीक्ष्ण क्षुरे के धार पर चलने जैसा कठिन। क्षुरे की धार पर चलना हो तो बेहोशी में नही चल सकते। पैर कट जाएगा। अत्यंत होश में ही , अत्यंत बोध के साथ ही क्षुरे की धार पर चलना संभव हो सकता है। 

©त्रिभुवन सिंह

उत्तिष्ठत जाग्रत :

#उत्तिष्ठत_जाग्रत:

उत्तिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरानिबोधत्। 
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति।।
-कठोपनिषद 

यह स्वामी विवेकानंद का अत्यंत प्रिय मंत्र था। बहुत से लोग समझते हैं कि उनके द्वारा रचित मंत्र है। लेकिन ऐसा नहीं है। यह कठोपनिषद से उद्धरित है। 

उत्तिष्ठत जाग्रत : उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य क्या सोया हुवा है? जो उसे कह रहे हैं कि उठ जाओ जाग जाओ। मनुष्य तो प्रतिदिन 6 से 8 घण्टे सोता है। उसके अतिरिक्त समय में जगा हुवा है। उठा हुवा है। कुछ न कुछ कर रहा है। तो फिर ऐसा क्यों कहा ? 

वस्तुतः जैसा हमारा जीवन है, उसमें हम सोए सोये ही जीते हैं। रात में भी सोते सोते सपने देखते हैं। दिन में भी सपने देखते हैं - दिवास्वप्न। मुंगेरीलाल के हसीन सपने। हसीन सपने सिर्फ मुंगेरीलाल ही नहीं देखता। हम समस्त लोग मुंगेरीलाल की तरह ही सपने देखते हैं। लेकिन इसका हमें बोध ही नहीं है कि हम सदैव सपने देखते रहते हैं। सोते सोते और जागते। इसका बोध तब होगा यदि अपने मन को देख सकोगे तब। एक इच्छा मन में उभरी। उसके उपरांत उसको पूरा करने की योजनाएं मन में चलने लगीं। सब हवा में है। इच्छा भी और उसको पूर्ण करने की योजना भी। आप घर से आफिस जाने के लिए निकले अपनी गाड़ी में। और आफिस पहुंचते पहुंचते आपने अपने मन मे सैकड़ो योजनाएं बनाये और रद्द किया। कब आफिस पहुंच गए। पता भी न चला। कितनी योजनाएं मन मे बनी यह भी याद नहीं रहा। आपने गाड़ी भी ड्राइव किया और सपने भी बुनते रहे। ऐसा ही न हो रहा है। 

तुलसीदास ने कहा-
"मोहनिशा जग सोवनहारा।
देखत सपना विविध प्रकारा।।
कृष्ण ने कहा -" या निशा सर्वभूतेषु जागर्ति तस्य संयमी"। 

इसी को कहा जा रहा है। उत्तिष्ठत जाग्रत। उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। बेहोशी का जीवन मत जियो। अब भी समय है। कबीर कहते हैं :
कहैं कबीरदास कब से बही।
जब से चेता तब से सही। 

जन्म के समय भी तुम्हे होश नहीं था। मृत्यु के समय भी बेहोश रहोगे। बीच में बचा जीवन। वह भी बेहोशी में बिता दोगे क्या। इसलिए उठ जाओ। जाग जाओ। चेत जाओ। 

प्राप्य - जो प्राप्त करने योग्य है। क्या प्राप्त करने योग्य है इस जीवन में? बचपन से ही हम बच्चों को सपने में जीने का, सपने देखने का शिक्षण और प्रशिक्षण देना शुरू कर देते हैं। #Dream_Big। बड़े सपने देखो। महत्वाकांक्षा पालो। आकांक्षा भी नहीं। महत्वाकांक्षा। 
बच्चा अभी विद्यालय की देहरी भी नहीं डांक भी नहीं पाया था कि माता पिता अडोसी पड़ोसी पूंछने लगते हैं कि क्या बनोगे? महत्वाकांक्षा का बीज बो दिया बच्चे के अंदर। सपने बो दिए गए उसके मन में। असंतुष्टि के बीज रोप दिया गया। तृष्णा के बीज उसके मन मे बो दिया गया। 

अब बच्चा लग गया जीवन के अंधी दौड़ में। गला काट प्रतियोगिता। अब बनेगा कुछ। जो है वह नहीं रह जायेगा। आवरण चढ़ने लगेगा उस पर। मुखौटा धारण करेगा। बनने की दौड़ में लगा तो बन गया डॉक्टर इंजीनियर आईएएस पी सी एस, थानेदार, ठीकेदार। अब उसे चाहिए धन मान सम्मान। डॉक्टर बना था सेवा करने के लिए। आईएएस बना था देश सेवा करने लिये। लेकिन बनते ही, सेवा पीछे रह गयी। धन कमाने की दौड़ में सम्मिलित हो गया। शादी व्याह प्रेम मोहब्बत बाल बच्चे की दौड़ में सम्मिलित हो गया। धन भी अब संतुष्ट नही कर सका उसको। अब उसे चाहिए राजनीति में जाने के लिए पार्टी का टिकट। लोक प्रतिष्ठा चाहिए उसे। लोग पहचाने सम्मान दें। प्रयागराज जैसे छोटे शहर में चुनाव का मौसम आते ही आठ दस डॉक्टर कुर्ता पजामा गांठकर टिकटार्थियों की लाइन में लग जाते हैं। 

धन और पद कमाते ही उसका मद सर पर चढ़कर बोलने लगता है।
शराब तो उतर जाती है कुछ घण्टे बाद। धन और पद का मद 24 ×7× 375 चढ़ा रहता है। मद बना है मद्य से। मद्य अर्थात शराब। पद का मद देखिये किसे तरह चढ़ता है।
प्रभुता पाइ काहि मद नाहीं।
को नर अस जन्मा जग माहीं।
- रामचरित मानस। 

 एक डीएम,  जो बचपन मे फैजाबाद पैसेंजर से आता था इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने, अब उन्ही लोगों को घास पात समझने लगता है, जिनके बीच से आया था। इसी को कहा जा रहा है बेहोशी में जीना, सपने में जीना। मद्य उतरती ही नहीं उसके मस्तिष्क से। 
ला पिला दे साकिया पैमाना पैमाने के बाद।
होश की बातें करेंगे होश में आने के बाद। 
पैमाने पर पैमाना पिये चला जा रहा है मनुष्य। धन का पैमाना, पद का पैमाना। होश है ही नहीं। बेहोश है व्यक्ति। 
पूरा जीवन बनने में, मुखौटा पहने हुए, असंतुष्टि में व्यतीत हो गया। तुष्टि क्या है इसका स्वाद भी न चखा। 

और इसी तरह एक समय आता है कि जिंदगी की शाम आ जाती है। बेहोशी में जन्मे, बेहोशी में जिये, बेहोशी में मर गए। होश क्या है इसका स्वाद ही न चखा जीवन में। 

क्या यही प्राप्य था जीवन का? क्या यही अभीष्ट था जीवन का। बच्चे को सिखाते गए कि होश से काम करो। ध्यान से काम करो। लेकिन ध्यान क्या है, होश क्या है इसको न सिखाया। सिखाते कैसे? स्वयं भी तो बेहोश ही जीवन जी रहे थे। 

तो मंत्र कह रहा है : प्राप्य वरानिबोधत। 
प्राप्य क्या है? प्राप्त करने योग्य क्या है? वह सद्गुरु जिसने बोध को प्राप्त किया हो। जिसने बोध को जाना हो ऐसा पुरूष। जिसने जागरण की कला जाना हो ऐसा सद्गुरु। वही प्राप्य है। वही बता सकेगा कि जागरण क्या है, होश क्या है, बोध क्या है। जिसने जाना है वही सिखा सकेगा यह कला। 

कबीर कहते हैं : कर्म करे निष्काम रहे जो ऐसी जुगति बतावे सो सद्गुरु कहावे। हर व्यक्ति सद्गुरु नहीं हो सकता। जो प्रवचन दे निष्काम कर्म का वह लेकिन युक्ति नहीं जानता है उसकी। वह है पंडित। वह सद्गुरु नहीं है। सद्गुरु तो वही है जो उसकी युक्ति सिखाता हो।

क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गं पथः तत् कवयो वदन्ति। 
कवयो अर्थात सद्गुरु ऋषि - जिसने उस बोध को प्राप्त किया है। जो जाग्रत है। वह बताता है कि उस बोध को प्राप्त करने का पथ बड़ा दुर्गं है। कठिन है। असम्भव नहीं। कठिन - तीक्ष्ण क्षुरे के धार पर चलने जैसा कठिन। क्षुरे की धार पर चलना हो तो बेहोशी में नही चल सकते। पैर कट जाएगा। अत्यंत होश में ही , अत्यंत बोध के साथ ही क्षुरे की धार पर चलना संभव हो सकता है। 

©त्रिभुवन सिंह

Sunday, 9 August 2020

मूलनिवासी:

इसाई मिशनरियों और शासन में ऊपरी तरह से तारतम्य नही था , लेकिन आतंरिक रूप से उनका उद्देश्य एक ही था - हिन्दुओ का धर्म परिवर्तन , भारत को लूटना , उसके घर घर पसरे गृह उद्योगों को नष्ट कर भारतीय समृद्धि को नष्ट कर इसे मेनचेस्टर से बने कपड़ो का एक बाजार बनाना , तथा हिन्दू समाज को छोटे छोटे टुकड़ों में बांटना।
यदि इतिहास को ठीक से देखें तो ब्रिटिश शासन ने 1872 में जब जनगणना की तो बनवासी भारतीयों को एनिमिस्ट यानि प्रकृति पूजक या जीव जंतुओं का पूजक के रूप में अलग कर उनको भविष्य में ईसाइयत के लिए टारगेट किया जा सके । और वही हुवा भी । स्वतंत्र भारत में उनको ST के नाम से चिन्हित कर मूल हिन्दू समाज से अलग पहचान दी गयी । क्या पूरा हिन्दू समाज प्रकृति पूजक या जीव जंतु पूजक नही है ?
1991 तक भारत में हिन्दुओ की जनगणना 4 वर्ण के रूप में होती रही ।
लेकिन यदि हिन्दू समाज मात्र 4 वर्णों या वर्गों में रहता तो इसको विभाजित कर इसायत की ऒर लक्षित करना आसान होता ? 
शायद नहीं ।
इसीलिये 1901 में 3 वर्ण ब्रम्हाण क्षत्रिय वैश्य 3 वर्णों को 3 जातियों के रूप में चिन्हित किया गया और भारत के 2000 वर्षो से अर्थजगत के निर्माण करता रहे शूद्र कर्मी कुल परिवारों को हजारों जातियों में चिन्हित कर के  भारत की आधुनिक जाति व्यवस्था का निर्माण होता है । इस तरह 4 वर्णों को हजारों अलग अलग जाति समूहों में चिन्हित करने में सफल रहे। 
दूसरी तरफ इन बेरोजगोर लोगों का एक विशाल जान समूह 19 शताब्दी के उत्तरार्ध और 20वीं शताब्दी के शरुवात में 22 करोड़ जनसँख्या में से 2.5 से 3 करोड़ लोग भूंख से मर जाते हैं । और बाकी बचे लोग दयनीय स्थिति में जीने को बाध्य होते हैं। वरना कोरी और कोली जो सम्मानित वैश राजपूत की वंशज थे , जो बुनकरी का पेशा करते थे , उनको आज SC में किस तरह शामिल किया गया ?
या मुसहर जो नमक का उत्पादकर्ता था उसकी आज समाज में सबसे ज्यादा जर्जर स्थिति कैसे होती ?
खैर 1921 की जनसंख्या के समय एक नए शब्द को बिना परिभाषित किये जनगणना में स्थान दिया जाता है ? 
1928 में साइमन कमीशन ने डॉ आंबेडकर को इन्ही डिप्रेस्ड क्लास को परिभाषित करने का काम दिया गया ।
1932 में डॉ आंबेडकर ने लोथिअन कमिटी की रिपोर्ट सौंपते हैं जिनमे वे डिप्रेस्ड क्लास को अछूत घोसित करते हैं , और छूने योग्य व्यक्ति को भी अछूत घोसित करते हैं - Notional Untouchable ।
फिर 1936 में ऑप्रेससेड क्लास एक्ट आता है और इनकी सचेदुलिंग होती है यानि SC का जन्म ।
हमारे संविधान निर्माताओं को ये इसाई शाजिश समझ नही आई ।
परंतु परिणाम आपके सामने है ।
सारे ST को अलग चिन्हित कर उनको इसाई बना चुके है ।
SC इनके दूसरे टारगेट हैं और वहां पर भी वो सफल होते आये हैं। ढेर सारे तथाकथित दलित चिंतक इनके गूढ़ पुरुष यानि जासूस हैं ।
अगला टारगेट उनके OBC हैं जिसको BP मंडल ने मात्र 5 महीने के कठोर मेहनत से पूरे भारत का सर्वेक्षण करके तैयार किया था जिसमे कई राजघराने भी आज OBC में शामिल हैं ।