Monday, 8 July 2019

फूली और अछूतपन

#फूली_और_अछूतपन:

आपने तीन पीढ़ी पहले इस बीमारी वाले लोगों को देखा होगा। फूली कहते थे गांव वाले। आंख की पुतली सफेद हो जाती है। अब नहीं दिखते इसके मरीज।
क्यों ? आप गुलाम नहीं रहे, शरीरिक रूप से। लेकिन मानसिक गुलामी अभी भी बरकरार है।  यह मूलतः ट्रेकोमा नामक वायरस से संक्रमित लोगों को होता था। वायरस आप जानते हैं कि संक्रामक रोग होता है।

इससे बचाव ही इसका इलाज है, और इसके प्रसार प्रचार की रोकथाम मात्र सैनिटेशन और हाइजीन से हो सकता है। जिसको हिन्दू धर्म में शौच कहते हैं। यह सर्वाधिक उन लोगों को प्रभावित करता है जिनके शरीर मे कुपोषण के कारण प्रतिरोधक क्षमता का अभाव हो जाता है।

लेकिन यदि इस बीमारी से संक्रमित होने के कारण किसी की आंख की रोशनी चली जाय तो आपको दोष किसको देना चाहिये?
ट्रेकोमा वायरस और कुपोषण को या उनको जिनके पास आंख बच गयी है प्रभु की कृपा से?

वही हाल किया है फर्जी इतिहासकारों ने। तथाकथित अशौच और भूंखमरी में जीने के लिए बाध्य किये गए हिंदुओं के दुर्दशा का कारण तथाकथित सवर्णों को दोषी ठहराया गया।
अब सैकङो प्रमाण आ चुके हैं जो यह बताते है कि भारत आज से मात्र 250 वर्ष पूर्व तक विश्व की 24%जीडीपी का उत्पादक था और ब्रिटेन मात्र 1.8% का। भारत के कृषि शिल्प वाणिज्य का ब्रिटिश दस्युवो ने सर्वनाश किया और भारत से खरबों की धन संपत्ति लूटकर अपने यहाँ यांत्रिक विकास किया। मैकाले तक यह कहता है कि ब्रिटेन का औद्योगीकरण भारत के लूटे हुए धन से हुवा था।

अभी हाल में उषा पटनायक नामक एक आर्थिक इतिहासकार ने ऑक्सफ़ोर्ड में एक पेपर पब्लिश कराया है जिसमे उन्होंने लिखा है कि ब्रिटेन भारत से 45 ट्रिलियन पौंड लूटकर ले गया जो आज ब्रिटेन के 17 साल की जीडीपी के बराबर होगा।

कल कहीं एक लेख पढ़ रहा था जिसमे मोदी जी ने दावा किया है कि 5 ट्रिलियन रुपयो का टैक्स कलेक्शन करेंगे जिससे पूरे भारत के गरीबों को लगभग मुफ्त भोजन टट्टी घर और 5 करोड़ मुसलमानों को वजीफा, विवाह में दहेज आदि आदि की व्यवस्था करेंगे।

आप सोच सकते हैं कि यदि ब्रिटिश दस्युवो के लूट का भारत पर क्या प्रभाव पड़ा होगा।
क्या प्रभाव पड़ा है इसके सीधे प्रमाण भी हैं।

- 1853 में कार्ल मार्क्स लिखता है कि 1818 में ढाका में 1,50,000 शिल्पी थे, जिनकी संख्या 1836 में घटकर मात्र 20,000 बची। ( गूगल में उसका आर्टिकल है) बाकी 1,30,000 कहाँ गए? पूरे भारत मे यही हुआ। उनकी संख्या जोड़ सकते हैं।

- अम्बेडकर जी की एक पुस्तक है " What Congress and Gandhi did to Untouchables". उसमें एनी बेसेन्ट के एक लेख का जिक्र है। ब्रिटिश भारत के लूटे हुए माल से अपने यहां कपड़ों की इंडस्ट्री लगा रहा था और अपने अकुशल लोगों को ट्रेनिंग देकर कुशल बना रहा था, फिर भी एक बहुत बड़ी संख्या थी जो उस समय भी ब्रिटेन में बेरोजगार थी। वहीं भारत के करोड़ो शिल्पी कृषक और वाणिज्यिक बेरोजगार कर दिए गए थे। भूंखमरी और संक्रामक बीमारियों से मरने के लिए बाध्य कर दिए गए थे। जिनके संकरण से बचने का मात्र एक ही तरीका था - शौच पूर्ण जीवन शैली। जिसको कालांतर में अम्बेडकर जी की सहायता से अछूत घोसित किया जाएगा जिससे कि भारत में " बांटो राज्य करो, झूंठा इतिहास और समाजशास्त्र लिखो और ईसाइयत में धर्म परिवर्तन का आधार तैयार करो", की नीति लागू किया जा सके। एनी बेसेन्ट लिखती हैं कि " भारत के छठवें जेनेरिक डिप्रेस्ड क्लास की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति ब्रिटेन के दसवें तलछट की आबादी जैसी है"।

क्या अर्थ है इसका?
कोई भी मूर्ख इसका अर्थ समझ सकता है। लेकिन मैकाले के प्रशिक्षित मूर्ख पिछलग्गू इसका अर्थ नही समझ सके आज तक।

-1930 में विल दुरंत लिखता है कि भारत के लोगों दुनिया के सबसे सफाई पसंद लोग हैं। वे आज भी प्रतिदिन नहाते और अपने वस्त्र साफ करते हैं परंतु गरीबी इतनी अधिक है कि सामाजिक सुचिता बनाये रखना असंभव है।

- 1930 में ही विल दुरंत लिखता है कि " जिन किसानों की जमीन कुर्क हो जाती थी वे सौभग्यशाली थे। वे दिल्ली जैसे शहरों की ओर जाते थे, और यदि वहां कम्पटीशन कम हुई तो उनको गोरों का मेला साफ करने का काम मिल जाता था। गुलाम इतने सस्ते हों तो शौचालय कौन बनवाये"।

ऐसे सैकङो प्रमाण है जिनसे यह प्रमाणित होता है कि अछूतपन ब्रिटिश लूट के कारण भारत मे जन्मी एक सामाजिक संस्कृति थी न कि हिन्दू धर्म का अविभाज्य अंग।

लेकिन हुवा वही।
फूली के लिए ट्रेकोमा के बजाय आंख वालों को दोषी सिद्ध किया गया।

नीचे ऐतिहासकर अंगुस मैडिसन द्वारा विश्व की 2000 वर्षो की पूरे दुनिया भर की तुलनात्मक जीडीपी का चार्ट है। उसी चार्ट के आधार पर मैंने 1929 में जे सुन्दरलैंड द्वारा लिखित पुस्तक "इंडिया इन बाँडेज" से भारत की गिरती हुई जीडीपी और उसके कारण भुखमरी और संक्रामक महामारियों से मरने वाले भारतीयों का एक चार्ट तैयार किया है। उसको ध्यान से देखिए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।

Singh Tri Bhuwan
ॐ

Friday, 5 July 2019

डॉ आंबेडकर और उनका आत्मकथा एक फेक न्यूज़ ,

#कथावाचक_विद्वान

प्रसिद्ध कहानीकार बाबा साहेब का  कथा लेखक बाबा साहेब का भी बाप निकला।
पुस्तक के दूसरे अध्याय में ही लिखा है कि बाबा साहेब का परिवार गांव के सम्मानित परिवारों में आता था क्योंकि उसको गावँ की देवी की पालकी रखने का सम्मान प्राप्त था। इसलिए स्वाभाविक था कि वार्षिक त्योहार पूरे परिवार के लिए महान अवसर का समय होता था क्योंकि उस समय उनका परिवार पूरे गांव के आकर्षण का केंद्र बन जाता था।

आगे लिखता है कि उनका ब्राम्हण गुरु उनके साथ अपना लंच शेयर करता था।
ये बात जग जाहिर है कि उनकी पढाई लिखाई का पूरा खर्च एक क्षत्रिय राजा ने उठाया था।

फिर बीच बीच मे एक कथा गढ़ता है जिसकी सत्यता की जांच करना असंभव है कि वह अछूत थे इसलिए प्रताड़ित किया जाता था।
उस जमाने मे विदेश भेजकर पढ़ाने वाले राजा से दस साल नौकरी का वादा किया था बाबा साहेब ने। लेकिन उस वादे को भी नही निभाया। और एक कथा गढ़कर नौकरी छोड़ने को जस्टिफाई किया जाता है।
बीच बीच में छूत और बीच बीच मे अछूत।

राजनीति महत्वाकांक्षियों झुट्ठो और कपटी बुद्धि वालों का क्षेत्र है।
सफल होने के लिए आदमी केजरीवाल, लालू यादव और ममता बनर्जी बन जाता है।
नग्रेजो को एक "एलियंस और स्टुपिड प्रोटागोनिस्ट" चाहिए था।
और बाबा साहेब को राजनैतिक सफलता।

इतनी सीधी सी बात है।
त्रिभुवन सिंह

ॐ

Thursday, 4 July 2019

विश्व को ईसाइयत का उपहार

यूरोप के धर्मांध ईसाइयों ने पूरे विश्व को लूटकर उंनको दो उपहार दिए।
प्रथम - ईसाइयत का प्रचार प्रसार
दूसरा- लोकतंत्र।
दोनों ही एक दूसरे के सम्पूरक हैं।
लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि सत्ता परिवर्तन बिना खून खराबे के होता है।
लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इस लोकतंत्र में लोककल्याण का हल्ला बोल नारा देने वाले स्वकल्याण किस तरह करते हैं। कौन लोग हैं जो लोक कल्याण का नारा देकर सत्ता पर कब्जा करते हैं, और स्वकल्याण करते हैं ? और उनका सत्ता कब्जाने का माध्यम क्या होता है ?
भारत ही नहीं पूरे विश्व पर नजर डालियेगा तो पता चलेगा कि सत्ता कब्जाने की पहली शर्त होती है - कि आपका  एक शशक्त गिरोह होना चाहिए। जिसके पास माइंड मैनीपुलेशन करने के संसाधनों पर पकड़ होनी चाहिए।
थोड़ा गम्भीरता से विचार कीजिये - अपने ही देश या पड़ोसी देशों के 70 साल के इतिहास पर नजर डालिए और देखिये कि किस तरह मात्र कुछ गिरोहों ने कैसे सत्ता पर कब्जा बना रखा है।
अच्छा वह साधन कौन से हैं माइंड मैनीपुलेशन के -
एजुकेशन, यूनिवर्सिटीज, फ़िल्म, डॉक्युमेंट्रीज़, पत्रिकाएं, समाचार पत्र और टेलीविशन।

#सोशल_मीडिया के अवतरण ने इन गिरोहों और इन साधनों की नस काट दी है।

इसीलिए हवा में सनसनाहट है।

कैलिको एक्ट Vs गांधी का खादी निर्माण

ब्रिटिश पार्लियामेंट का Calico Act और गांधी का #स्वदेशी: कहाँ गायब हो गए भारत के रंगरेज और छिप्पीगर ?
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भारत मे आज से मात्र 200 वर्ष हर जिले मे छिपपीगार और रंगरेज नामक दो जातियाँ हुआ करती थीं - जो  छींट के कपड़े बनाते थे , और कपड़ों को रंगते थे।
कहाँ गए ये लोग ?
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गांधी के स्वदेशी आंदोलन को आप खाड़ी चरखा और स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था आदि से जोड़ कर देखते हैं http://www.gandhiashramsevagram.org/…/meaning-of-swadeshi.p…
लेकिन इसके भी पूर्व स्वदेशी आंदोलन और कानून ब्रिटेन ने बनाए थे calico act के नाम से 1700 एडी मे। लेकिन गांधी का स्वदेशी आंदोलन एक तरह से उनका ब्रिटेन के इतिहास से लिया गया था / मियां की जूती मियां के सिर।
क्यों ? और कैसे ?
क्योंकि ब्रिटेन और यूरोपियन जब भारत मे आए थे तो उनके यहाँ का मुख्य व्यवसाय #ऊन_के_कपड़ों का था बाद मे थोड़ा बहुत सिल्क के कपड़ो का उत्पादन करते थे । 2012 का ये एक रिसर्च पेपर है https://www.google.co.in/url…
जिसको यदि चाहे तो विस्तार से पढ़ें । वरना  मैं संछेप मे लिखता हूँ । ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों ने जब भारत से सूती छींट और चटकदार प्रिंटेड कपड़े ब्रिटेन मे ले जाकर यूरोप अफ्रीका और अमेरिका मे बेंचना शुरू किया तो यह कपड़े वहाँ बहुत लोकप्रिय होने लगे । जिसका असर वहाँ के ऊनी कपड़ों के उत्पादन को प्रभावित करने लगा क्योंकि ये कपड़े उनको बहुत सस्ते दाम पर मिलते थे , जिसको वो ऊंचे दाम पर बेंचते थे । इन कपड़ों को colicos के नाम से जाना जाता था क्योंकि ये उसे #कालीकट से खरीदते थे । ये कपड़े बहुत सुविधाजनक (comfortable ) सस्ते और रंगीन होने के कारण वहाँ खासे लोकप्रिय हो गए , खास तौर पर महिलाओं के बीच ,जो इन कपड़ों को पहनकर सिल्क और मलमल पहनने वाली , उच्च वर्ग की महिलाओं से स्पर्धा करना चाहती थी ।
1697 मे ऊन और सिल्क के बुनकरों ईस्ट इंडिया कंपनी के ऑफिस मे दंगा किया। http://www.jstor.org/action/showPublication…
इन घटनाओं और समाज और इन बुनकरों मे व्याप्त असंतोष के कारण ब्रिटिश संसद ने COLICO ACT को पास किया , जिसके अनुसार ब्रिटेन मे कलिकट से रंगीन और प्रिंटेड कपड़ों के बजाय बिना dye किए हुये कपड़े ही इम्पोर्ट हो सकते थे।
लेकिन  ईस्ट इंडिया कंपनी ने छींट और रंगीन कपड़ो को चोरी छिपे इम्पोर्ट करने लगी।
दूसरी समस्या यह हुई कि ब्रिटेन उस समय तक कपड़ों को डाई करने की तकनीक नहीं जानता था। अतः इस काम के लिए फ्रांस के लोग ब्रिटेन आकर नौकरी करने लगे।
ब्रिटेन के नागरिक पुनः बेरोजगारी से जूझने के लिए बाध्य हो गए।
इसलिए उन्होंने आंदोलन किया। रंगीन कपड़े महिलाओ में बहुत लोकप्रिय थे, वे उनको त्यागने को तैयार नही थी। उनको सार्वजनिक रूप से अपमानित और प्रताड़ित किया गया।
अतः बाध्य होकर ब्रिटिश संसद को 1720 में कैलिको एक्ट 1720 लाना पड़ा। जिसमें प्रावधान किया गया कि भारत से आयातित कपडे ब्रिटेन के नागरिक नहीं पहन सकते। वे सिर्फ यूरोप और अन्य देशों में एक्सपोर्ट करने के लिए आयातित किये जायेंगे।

ये कानून मात्र देशी ऊन और सिल्क व्यवसाय को बचाने के लिए ही नहीं पास हुआ बल्कि इसका एक और पहलू भी है । The Calico Acts were created and passed in part because of strong national
sentiment that viewed the cotton trade as a threat to the nation.
ब्रिटेन के एकोनोमिस्ट के अनुसार एक्सपोर्ट को इम्पोर्ट के ऊपर तरजीह देनी थी जिससे देश की आर्थिक इकॉनमी का नुकसान न हो । तो जब तक ब्रिटेन भरता से कपड़े इम्पोर्ट कर यूरोप और फ़्रांस को पुनर्निर्यात करता रहा तब तक तो ठीक था , लेकिन जब Colico Act 1700 का आया तो अर्धनिर्मित सूती और उंप्रिंटेड कपड़ों के प्रिंटिंग और एंड प्रॉडक्ट बनाने हेतु कारकुशीलव लोगों का ब्रिटेन मे उस समय तक अकाल था । ऐसे मे फ़्रांस से इन कार्यों मे कुशलता प्राप्त लोग ब्रिटेन मे migrate करना शुरू कर दिये । और ब्रिटेन में रोजगार प्राप्त करने लगे । अंत मे ब्रिटेन के लोगों मे रानी से शिकायत की कि ये लोग वहाँ के मूलनिवासी अंग्रेजों की रोजी रोटी छीनकर उनको उनके परिवारों को बर्बाद कर रहे हैं / अंत मे राष्ट्रीय भावना से उद्वेलित होकर अंग्रेजों के न सिर्फ ऊन निर्माताओं वरना सामान्यजन इतना विक्षुप्त हुआ कि उसको Xenophobia से ग्रसित होकर colico / सूती वस्त्र को एक राष्ट्रीय खतरा मानकर उनके खिलाफ कई जगहों पर आयोजित दंगे किए गए । ये भावना इस हद तक पहुँच गई कि न सिर्फ वे इस सूती वस्त्रों से नफरत करने लगे ,  बल्कि अपने ही देश की उन #औरतों को #देशद्रोही मनाने लगे जो इन सूती वस्त्रों को पहनती थी ।

अंत मे 1720 मे COLICO ACT II बनाया जिसके तहत लगभग कॉटन के सभी उत्पादों के इम्पोर्ट को बैन कर दिया गया और सूती कपड़ों को पहनने को भी बैन कर दिया सिवा कुछ ऊपरी वर्ग और निचले तबके के लिए कुछ चुनिंदा आइटम को छोड़कर जिससे ट्रेड में imbalance को खत्म किया जा सके ।
खैर बाद मे कच्चे माल का आयात कर जब अंग्रेजों ने खुद सूती वस्त्र बनाना सीख लिया तो 50 साल बाद इस कानून को खत्म कर दिया ।


नुनिया और नमक आंदोलन

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2025008640862526&id=100000602280268

#रेपोस्ट:

#कहाँ_गए_नुनिया

#लोनिया

नुनिया या लुनिया (लोनिया) "कोली या कोरी | " जात और जाति " का फर्क
आज कोरी या कोली भारत के एस सी हैं , 1872 मे M A Sherring के अनुसार - " कोली बैस राजपूतों के सम्मानित वंशज हैं "  , जो बुनकर हुआ करते थे /
मुसहर आज सबसे गरीब कुनबा है भारतीय समाज का , जो अंग्रेजों के नमक कारोबार पर मोनोपोली कायम करने के पूर्व  नमक का निर्माता हुआ करता था / वो भी आज S C है / यानि depressed class = अछूत /
क्या है रहस्य इन सच्चाईयों का , जो इतिहास के पन्नो मे दफन है /

नुनिया या लुनिया (लोनिया)

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अंग्रेजों के लूट का व्योरा देते हुये आर्थिक इतिहासकर अमिय बघची लिखते है  -  "बिहार और बंगाल की  GDP से  1793 से 1807  तक का एवरेज सालाना लगभग ४७४,२५०,००० (47 करोड़ 42 लाख 50 हजार प्रति वर्ष )  रुपया भारत से ब्रिटेन जाता था ।इसमें भारत के अंदर बाकी हिस्सों पर कब्ज़ा करने में लगने वाला खर्च शामिल नहीं है लेकिन वो भी विहार और बंगाल के ही रेवेनुए से आता था जो लगभग एक मिलियन पौड सालाना था । इसका अर्थ हुवा कि बिहार और बंगाल की  7.07  प्रतिशत जीडीपी को देश के बाहर भेज दिया जाता था जो लौट के नहीं आता थी ।

हमको ये भी याद रखना चाहिए कि इंग्लैंड में औद्योगीकरण  में होने वाला इन्वेस्टमेंट  7 प्रतिशत जीडीपी से ज्यादा नहीं था खास तौर पे शुरुवाती दशकों में जब भारत मैन्युफैक्चरिंग के दिशा में 15 से 20  प्रतिशत का हिस्सेदारी से नीचे जा रहा था और उन्नीसवीं शताब्दी में यह इकॉनमी घटकर १० प्रतिशत के नीचे आ गयी थी ।

                  लगातार होने वाले disinvestment या ड्रेन के कारन , जिस पर ब्रिटिश ओब्ज़र्बेर और भारत के राष्ट्रवादी दोनों एक मत थे , प्रोडक्शन घटता जा रहा था ,इसलिए जो लोग जिन्दा बचे इस क्षेत्र में ( मैनुफेक्चुरिंग  के क्षेत्र मे ) ,उन्होंने उसी तरह काम करना शुरू किया जैसे बिना उर्वरक मिलाये खेती , जिसके कारण उनको घटिया स्तर के उत्पाद बनाने को मजबूर होना पड़ा, जिसकी घरेलू खपत तो थी लेकिन अंतराष्ट्रीय बाजार में कोई पूंछ नहीं थी, खास तौर पर तब जब यूरोपियन इस क्षेत्र में आगे जा चुके थे /"

अमिय कुमार बागची ;कोलोनिअलिस्म एंड इंडियन इकॉनमी : प्रस्तावना पेज xxix -xxx"
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अब एक क्षेत्र था नमक के निर्माण का जिसको ईसाई अंग्रेजों ने नूनिया या लोनिया कास्ट से वर्णित किया है / नमक का व्यवसाय वो पहला व्यवसाय है जिस पर अंग्रेजों ने सबसे पहले एकाधिकार जमाया। 1780 मे नमक पर टैक्स मात्र 3 पैसे प्रति मन / मोन्द ( 40 सेर = 1 मन ) था जिसको बढ़ाकर ईस्ट इंडिया के वाइस रॉय ने 3 रुपये 25 पैसे प्रति मन कर दिया । 6 व्यक्तियों के परिवार के लिए प्रतिवर्ष नमक का खर्च 2 रुपये आता था , और एक मजदूर की उस जमाने मे 2 रुपये कमाने के लिए 2 माह मेहनत करना पड़ता था । जिन लोगों को इस बात पर आपत्ति हो कि मॉडर्न हिएयरची आधारित कास्ट सिस्टम अंग्रेजों ने नहीं बनाई , भारत मे पहले से थी , तो उनको बता दूँ कि -- जात का अर्थ भारत मे मैनुफेक्चुरिंग इकाई हुआ करती थी जिसमे समाज का कोई भी वर्ण शामिल हो सकता था , आपस मे ही शादी व्याह करते थे , जिसमे कोई ऊंच नीच नहीं थी / नीचे उद्धृत लेख से ये बात स्पस्ट हो जाएगी / बाकी नमक के इतिहास को प्रेमचंद के "नमक का दारोगा " गांधी के दांडी मार्च और नमक आंदोलन से समझा जा सकता है /

M A Shering की पुस्तक से उद्धृत (1872)

"नुनिया शब्द नून या लोन (नमक) से उद्धृत है इसलिए नुनिया शब्द से ही इनके व्ययसाय का पता चल जाता है के ये नमक के उत्पादक यानि मैन्युफैक्चरर है।लेकिन अब यह व्यवसाय दूसरे लोगों के हांथों में चला गया है।
इस cast के लोग इस व्यवसाय को पूरी तरह से त्यागने को बाध्य है अन्यथा वो भूख से मर गए होते ।भारत सरकार ने इस पर मोनोपोली कर के कब्जा कर लिया है । और अब वह कुछ जिलों को छोड़कर , किसी को भी इसके निर्माण की अनुमति नहीं देती यद्यपि यह जमीन में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।उदाहरण के लिए बनारस प्रान्त के विभिन्न भागों की जमीन saltpetre से भरी पड़ी है ।इसलिए इन जिलों में नमक की मैन्युफैक्चरिंग आसान बात है परंतु नमक के व्यवसाय का कोई स्कोप न होने के कारण इन लोगों ने बुद्धिमानी का परिचय दिया और दूसरे क्षेत्रों में लेबर का काम करने लगे है । वो अब कुवां पोखर और तालाब खोदने लगे हैं ।ईंट और टाइल बनाने का भी वो काम करने लगे हैं ।
इस क्षत्र के नुनिया लोग सम्भल से आये हैं । इनके ट्राइब के 7 सब devision हैं जो एक दूसरे से अलग हैं ।मेरे पास दो सुंचिया हैं , एक बनारस से और एक मिर्जापुर से , जिनमे काफी भिन्नता है।
बनारस के नुनिया लोगों का सब devision
1.चौहान
2.औधिया (अवध के निवासी )
3.मुसहर
4. बिंद
5.भुइँहार
6. लोढ़ा
मिर्जापुर के नुनिया ट्राइब का सब devision
1.बक्ष गोत्र चौहान (जनेऊ धारी )
2.बक्ष गोत्र चौहान ( बिना जनेऊ वाले )
3.भुइँहार
4. पंचकौता
5.लोध
6. मुसहर "
सोर्स : Caste and tribes of India ; M A Sherring

Note: अब ये देखें कि आधुनिक भारत में एक ही व्यव्साय से जुड़े कुल और वंशज आज किस कास्ट में विभाजित हैं ?  उनकी आर्थिक और सामजिक स्थिति क्या है ?? और इसके लिए जिम्मेदार कौन है ?
मनुस्मृति ??

नोट : अब इस पोस्ट के आर्थिक पहलु को देखें और समझें।नमक व्यवस्साय और उसकी मैन्युफैक्चरिंग एक स्वतंत्र व्यापार था ।जिसमे समाज के कई वर्ग भाग लेते थे जिनका ऊपर वर्णन है। इन वर्गों को अंग्रेज और यूरोपीय ईसाई कभी caste कभी ट्राइब या कभी clan यानि कुल परिवार के नाम से पुकारते थे।
ये लोग नमक मैन्युफैक्चरिंग का काम कितने वर्षों से करते थे इसकी जानकारी नहीं है ।लेकिन जब अंग्रेजों ने नमक व्यवसाय पे कब्जा किया तो ये सब बेरोजगार और बेघर होकर कुछ अन्य कार्य करने लगे जैसे मजदूरी। ऊपर वर्णित है।
जे सुन्दरलैंड लिखता है कि किसी भी देश मे नमक वह वस्तु है जिस पर टैक्स नही लगाया जाता है या बहुत कम टैक्स लगता है क्योंकि वह सबसे अधिक उनकी आवश्यकता है जो श्रम करते हैं, पसीना बहाते हैं।
गांधी को इस बर्बर सिस्टम को खत्म करने के लिए नमक आंदोलन चलाना पड़ा, जो अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ बनी। प्रेमचन्द नमक का दरोगा नामक कानून बनाते हैं।
लेकिन इन कथाओं और अत्याचारों की बात कोई नही करता जिनके कारण करोड़ो भारतीय लोग बेरोजगार हुए जिनको राजनैतिक हन्थियार बनाते हुए अंग्रेजो ने अछूत और schedule Caste का अलग वर्ग तैयार किया।

रंगरेज कहाँ गायब हो गए?

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=2038592346170822&id=100000602280268

हमरी न मानों रंगरेजवा से पूँछो जिसने रंग दीना दुपट्टा मेरा : कहाँ बिला गया वो रंगरेज ?

How The Fluid Indian "Jaat Pratha" was changed into Alien / European Rigid Caste System : Part- 3

"मॉडर्न caste सिस्टम एक सनकी रेसिस्ट ब्रिटिश ऑफीसर H H RIESLEY की देन  है जिसने 1901 में नाक की चौड़ाई के आधार पर "unfailing law of Caste" का एक सनकी व्यवस्था के तहत एक लिस्ट बनाई , जिसमे उसने नाक की चौड़ाई जितनी ज्यादा हो उसकी सामाजिक हैसियत उतनी नीचे होती हैं , इस फॉर्मूले के तहत सोशियल hierarchy के आधार पर जो लिस्ट बनाई वो आज भी जारी है और संविधान सम्मत है । यही भारत की ब्रेकिंग इंडिया फोर्सस का , और ईसाइयत मे धर्म परिवर्तन का आधार बना हुवा है ।
ऐसा नहीं है कि भारत मे जात प्रथा थी ही नहीं । ये थी लेकिन उसका अर्थ था एक कुल या वंश , जिसके साथ कुलगौरव और एक भौगोलिक आधार के साथ साथ एक पेशा भी जुड़ा हुवा था ।"
अब MA शेरिंग की 1872 की पुस्तक -"caste आंड ट्राइब्स of इंडिया " से उद्धृत उस प्रथा की रूपरेखा समझने की कोशिश करें ।

"MA SHERING शृंखला -5 " जात और जाति (Caste) में क्या अंतर है ?
"Caste and Tribes of India "
चॅप्टर xiii पेज- 345
Caste of weavers , thread spinners ,Boatmen नुनिया / लूनिया beldars Bhatigars
कटेरा या धुनिया
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रुई की धुनाई करने वाली एक caste है जिनको धुनिया कहा जाता है। ढेर सारे मुसलमान और हिन्दू इस व्यवसाय से जुड़े हुये हैं। रुई की धुनाई और सफाई के लिये जिस यंत्र का ये प्रयोग करते हैं , वो एक साधारण धनुष के समान होता है।जमीन पर उकडूं बैठकर ताज़े रूई के ढेर पर , जिसमें धूल और तिनके और अन्य गंदगी भरी होती है, बायें हाथ में धनुष पकड़कर और दाहिने हाँथ में लकड़ी के mallet से कटेरा लोग जब धनुष की रस्सी पर प्रहार करते हैं तो रूई के ढेर के उपरी सतह पर हलचल होने लगती है । और रूई के ढेर से ह्लके रेशे इस रस्सी से चिपक जाते हैं । ये प्रक्रिया लगातार जारी रहती है जिससे रूई की रूई की बढिया और सुन्दर धुनाई हो जाती है और सारी गंदगी अपने भार की वजह से रूई से अलग होकर जमीन में गिर जाती है । ये caste बनारस दोआब और अवध के पूर्वी जिलों मे पायी जाती है ।

कोली या कोरी
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ये बुनकरों (weavers ) की caste है । इनकी पत्नियाँ भी इनके साथ साथ काम करती हैं और इनकी मदद करती हैं । ये समुदाय छोटा है और आगरा तथा प्रांत के पश्चिमी जिले मे पाया जाता है ।

"कोली वैस राजपूत के सम्मानित वंशज है।"
महामहिम राष्ट्रपति जी संज्ञान लें। उन्हीं की कास्ट की बात हो रही है।

नोट - शेरिंग ने 1872 मे #caste शब्द का प्रयोग किन अर्थों मे किया है , जिसमे एक #व्यवसाय में #हिन्दू और #मुसलमान सब सम्मिलित हैं ।

और मॉडर्न caste सिस्टम जो Risley की 1901 की जनगणना की देन है , आज किन अर्थों में प्रयुक्त होता है , आप स्वयं देखें । कोली या कोरी कैसे जो कभी एक संम्‍मानित क्षत्रिय व्यवसायी थे , जब सारे व्यवसाय नष्ट हो गये तो , शेडुलेड़ caste और OBC में लिस्टेड हो जाते है , आप स्वयम् देखें । आभाषी दुनिया के मित्र श्रीराज कोली ने स्वयं यह बात स्वीकार किया है ,की उनके वंशज कहते हैं कि वे क्षत्रिय थे । आपको ये समाज का विखंडन और बंटवारा समझ मे आ रहा है न ?

"MA SHERING शृंखला -6
"Caste and Tribes of India "
चॅप्टर xiii पेज- 346

तांती
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बुनकरों की एक कॅस्ट , जो , सिल्क का किनारा (बॉर्डर) aur भांती भांती प्रकार के धातु बनाते हैं । ये किंकबाब या सोने चांदी से मढ़े हुये महन्गी ड्रेस , जिसमें इन्हीं महन्गी धातुओं की embroidary हुई होती हैं , बनाते हैं । बताया जाता है कि ये गुजरात से आये हुये हैं । बनारस में इस ट्राइब का मात्र एक परिवार है जो धनी हैं और शहर के एक विशाल भवन में निवास करता है ।

तंत्रा (Tantra)
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तंत्रा एक अलग clan (वंश) है जो सिल्क के धागों का निर्माण करता है । बताया जाता है कि ये दक्षिण से आये है , और इनको निचली कॅस्ट मे माना जाता है क्योंकि ब्राम्हण इनके घरों मे खाना नही खाते हैं ।

कोतोह (Kotoh)
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अवध के जिलों मे पे जाने वाली थ्रेड स्पिन्नर्स की की एक छोटी परंतु सम्मानित caste है ।
Page- 346

#रँगरेज
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कपड़े डाइ करने वालों की caste है ये ।ये शब्द रंग से उद्धृत है , और रेज यानी ये काम करने वाला । ये caste प्रांत के लगभग सभी जिलों मे पायी जाती हैं ।

#छिप्पी
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कपड़ों पर प्रिंटिंग करने वालों की caste । इनका विशेष कार्य कपडो पर क्षींट स्टाम्प करना है ।ये लोगों का ये लोग ज्यादा नही हैं , लेकिन ये प्रांत के लगभग सभी जिलों मे पाये जाते हैं । बनारस में ये एक अलग caste के अंतर्गत आते हैं ।

"छिप्पी अपने आपको राठौर राजपूत कहते हैं "

मल्लाह
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सभी नाविकों को मल्लाह कहा जाता है चाहे वो जिस भी caste के हों । इसके बावजूद मल्लाहों की एक विशेष ट्राइब जो कई कुलों (क्लॅन्स) में बंटे हुये हैं । वो निम्नलिखित हैं :-
१- मल्लाह
२- मुरिया या मुरीयारी
३- पनडुबी
४- बतवा या बातरिया
५- चैनी चैन या चाय
६- सुराया
७- गुरिया
८- तियर
९- कुलवाट
१०- केवट
ये नाविक भी हैं , fisherman (मछली मारने वाले ) भी हैं , और मछली पकडने के लिये जाल की manufacturing भी करते हैं । पहले ये एक दूसरे में शादी करते थे लेकिन अब वो बंद हो चुका है । हिन्दुओं की कई और castes भी मल्लाही का पेशा करते हैं ।

नोट : कोई बताए कि ऊपर वर्णित समुदायों मे कौन अगडी थी कौन पिछड़ी थी ? ये किस ग्रंथ मे लिखा है - कि फलाना जात अगड़ी और फलाना जात पिछड़ी ?
और अगर नहीं लिखा तो ये आया कहाँ से ?
अंबेडकर के चेलों से ये प्रश्न है ।

कहाँ गए छिप्पी तांती तंत्रा कोताह रंगरेज ?
मर गए ?