Monday, 6 August 2018

अब्राहमिक रिलिजन एक पोलिटिकल आईडिया हैं

मूलतः अब्राहमिक रिलिजन एक पोलिटिकल आईडिया हैं, लोगों को मॉनसिक गुलाम बनाने का। 
ये मॉनसिक अवधारणा जन्म हुई है दुनिया के उन देशों में, जिनका इतिहास लूट डकैती और हत्या पवित्र पुस्तकों के माध्यम से उचित ठहराने का रहा है। Plunder Slavery through Militia Power, जिसको आज टेररिज्म के नाम से जाना जाता है।

ये उन गिरोह बाजों को एक झन्डे के नीचे लाकर एक डकैतों की फौज बनाने का पोलिटिकल आईडिया है जिसमे गिरोह में माले गनीमत को आपस मे बांटकर श्रम और बुद्धि से निर्मित लोगो की भौतिक धन दौलत और भूमि पर कब्जा कर लिया जाता है, इसी को रिलिजन और मजहब का नाम दिया गया है।

पूरा मुस्लिम और क्रिस्चियन देशों का इतिहास पढ़ लीजिये - इससे फ़र्क इतिहास नही मिलेगा।

#जऱ_जोरू_जमीन पर कब्जा करने की रणनीति है ये पोलिटिकल गिरोह बाजी - जिसको रिलीजन या मजहब कहा जाता है ।

जात को अगर समझना है तो मात्र क्षत्रिय वर्ण से समझिये ।

जात को अगर समझना है तो मात्र क्षत्रिय वर्ण से समझिये ।
इसमें सूर्यवंशी हैं, चंद्रवंशी हैं, राजकुमार हैं ,गौतम हैं , वैश हैं , गहरवार हैं , बत्सगोत्रीय चौहान , लोनिया वत्सगोत्रीय चौहान हैं । और भी अनेक हैं । ये सब वंश यानि फॅमिली ट्री हैं , कुल वृक्ष हैं । 

सबके गोत्र अलग अलग या मिक्स हैं , शादी विवाह की एक परंपरा है कि किसके यहाँ शादी हो सकती है , किसके यहाँ नहीं ।
इसी को Endogamy कहा गया है अंग्रेज और ईसाई संस्कृतज्ञों द्वारा।
यद्यपि ये बंधन क्षीण हो रहा है ।

परंतु ये caste नहीं है ।
ये वंश परंपरा है ।

अब ये उन ईसाईयों को समझ में न आया तो दोष किसका ?
मनुस्मृति को संदर्भित करके एक नश्लवादी ईसाई इंसान रिसले ने तीन वर्णो - ब्राम्हण क्षत्रिय और वैश्य को #सवर्ण और #आर्य के नाम पर तीन जातियों में तब्दील किया तो दोष किसका है ?

बाकी भारत के कारकुशीलव उत्पादक लोगों को शूद्र वर्ण में चिन्हित कर उनका 2000 जातियों में चिन्हित किया तो डॉ आंबेडकर किसका संहार करना चाहते थे ?
#Annihilation_of_Caste ।

इसी को संविधान में घुसेड़ दिया संविधान निर्माता ने।

बख्तियार ख़िलजी एक डकैत था जिसने नालन्दा का ग्रंथालय जलाया था।

उसको कोई शांति दूत भी आदर्श नही मानता अपना।

लेकिन डॉ आंबेडकर को क्या उपाधि मिलनी चाहिए जिन्होंने मनुषमृति जैसा ग्रंथ जलाया, जिसको पढ़ने और समझने की भी कूबत नहीं थी उनके अंदर।

ज्ञान को स्वाहा करके ही भारत से इंडिया बना है भारत।
उसी स्वाहा ज्ञान के नायक है ग्रंथ जलाने के अपराधी बाबा साहेब।

क्लैश ऑफ सिविलाइज़ेशन में "वसुधैव कुटुम्बकम" का औचित्य बचा भी है ?

क्लैश ऑफ सिविलाइज़ेशन में "वसुधैव कुटुम्बकम" का औचित्य बचा भी है ?
ग्लोबल विलेज का नारा भी समुद्री डकैतों के वंशजों द्वारा डिज़ाइन किया गया नव उपनिवेश वाद ही है जिसको यंत्र बनाकर तथाकथित तीसरी दुनिया के लोगों का वेल्थ ड्रेन करना ही इस चित्ताकर्षक नारे का उद्द्देष्य है।

इतनी यातनाओं, इतने बड़े पैमाने पर नरसंहार झेलने के बाद भी यदि हम बचे हैं तो उसमें हमारी अद्ध्यत्मिक दर्शन का बहुत बड़ा हाथ रहा है। गुरु गोविंद सिंह अपने बच्चों के साथ आत्म बलिदान करने को प्रस्तुत हो जाते हैं क्योंकि वे जानते थे कि - "मृत्युर्ध्रुवो सत्यं जन्म मृत्यु तथैव च" : जन्म और मृत्यु तथा कर्मफल सिद्धांत से वे परिचित थे। वे जानते थे कि मृत्यु के बाद जन्म लेने की बाध्यता है इसलिए धर्म काज हेतु जीवन बलिदान करना सौभाग्य की बात है।
लेकिन शायद यही अध्यात्म हमारी कमजोरी भी बनी - क्योंकि "स्वभाव अध्यात्म उच्चयते",। हम अपने स्वभाव से ही दुनिया के हर मजहब और रिलीजन के व्यक्ति या व्यक्ति समूह को आकलित करते हैं। हमारे सॉफ्टवेयर में धर्म के जिन लक्षणों की अवधारणा थी, उसी से हमने उन लुटेरों के धर्म का भी आकलन करना चाहा जो अरब या यूरोप से आये। यही हमारी भूल और कमजोरी सिद्ध हुई और 1000 साल की गुलामी हमारे हिस्से में आई। अहिंसा धर्म का मूल है, लेकिन हिंसा रिलीजन और मजहब की आत्मा है , साधन है सिद्धांत है। झूंठ छल फरेब धर्म के विरुद्ध है लेकिन अलतकिया मजहब की मूलआत्मा है। मनसा वाचा कर्मणा एक होना धर्म का मूलमंत्र है जबकि मुख में अल्ला और जीसस, बगल में बाइबिल और कुरान तथा हाँथ में तलवार ये रिलीजन और मजहब की ताकत रही है। इसके लिए प्रमाण की आवश्यकता नही है। आज 120 देश मे ईसाइयत और 56 देशों में इस्लाम का प्रसार इन्ही नीतियों और इन्ही हथियारों से हुवा है।
ऐसे में जब हम नारा देते हैं कि -
"इयं निजः परोवेति गणना लघु चेतसाम।
उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम"।।
तो सोचना ये पड़ेगा कि जब हमारे महामानव ऋषियो ने इस मंत्र की रचना तब किया था जब दुनिया में छल झूंठ फरेब और "किताब" के कमांड्स पर संगठित डकैतों के गिरोहों का जन्म नहीं हुआ था जो धर्म को जऱ जोरू जमीन पर कब्जा करने की मैन्युअल से ज्यादा कुछ नहीं है।
ऐसा न होता तो शायद पृथ्वीराज चौहान ने गोरी को रणक्षेत्र में हराने के बाद भी बार बार क्षमा नहीं किया होता। क्योंकि पृथ्वीराज के सॉफ्टवेयर के मैन्युअल में वो एप्प्स नहीं डाउनलोड थे जिसको विशुद्ध हरामीपन कहा जाता है - अलतकिया। इसलिए उन्होंने ये मूर्खता किया था।
लेकिन परेशानी और चिंता की बात ये है कि ये मूर्खता आज भी जारी है।
जब हम "गोल्डन रूल ऑफ रेसिप्रोसिटी" या गोल्डन एथिकल रूल के बारे में लिखते हौ कि ये तो हमारे ऋषियों ने बहुत पहले लिखा था कि -
" श्रूयतां धर्मसर्वस्वम् श्रुत्वा चाप्यवधार्यात्म।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेशां न समाचरेत।।
अर्थात "धर्म का जीस्ट सुनो और उसको धारण करो। कि जो कर्म अपने विरुद्ध प्रतीत होता हो वह दूसरों के साथ व्यवहार न करो।
लेकिन यह तो दो सभ्य सुसंस्कृत आर्य लोगों के बीच होने वाले व्यवहार की बात की जा रही है। परंतु जब बात एक तरफ विश्वकल्याण की भावना वाले सॉफ्टवेयर वालों का मसला हो और दूसरी तरफ दुनिया के जर जोरू और जमीन पर किसी भी यंत्र तंत्र मंत्र से कब्ज करने वालो का गिरोह हो , तो "वसुधैव कुटुम्बकम" जैसे नारे सिर्फ भाषण के लिए ठीक हैं, व्यवहार के लिए नहीं ।

क्लेश ऑफ सिविलाइज़ेशन में रहीम का ये दोहा एकदम सटीक है कि :
"कह रहीम कैसे निभै केर बेर के संग"
वह डोलत रस आपने उनके फाटत अंग"।
क्योंकि छल फरेब झूंठ धोखा ताकत तलवार के दम पर उन्होंने दुनिया की जऱ जोरू जमीन पर कब्जा किया है। ये उनका मोडस ऑपरेंडी है। इतिहास इस बात का गवाह है।
इसलिए वसुधैव कुटुम्बकम के साथ एक मंत्र और जोड़ लीजिये - "शठे शाठयम् समाचरेत"।

क्योंकि उनका नारा है -"Survival of Fittest". और फिटेस्ट की परिभाषा है - साम दाम दंड भेद से फिट फाट।
और आपका नारा है :
"आत्म मोक्षर्थाय सर्वभूतेषु हिताय च। न सिर्फ मनुष्यों वरण समस्त जीवों का हित ही मनुष्य धर्म है।

इसलिए नारा थोड़ा जोर शोर से लगाइये लेकिन सावधान इंडिया।

ग्रंथ जलाने की मानसिकता

 आंबेडकर ने मनुषमृति जलायी 1927 में। 

बख्तियार ख़िलजी ने नालन्दा विश्विद्यालय का ग्रंथालय। 

एक ने ग्रंथ जलाया दूसरे ने ग्रंथालय। 

दोनों के कृत्य एक ही हुए। 

ये मोडस ऑपरेंडी अब्राहमिक रेलिजन्स की मूल कार्यप्रणाली है। असहमति को सहन न करना। दरअसल आसमानी किताबों के पैगम्बरों ने विश्व के श्रम और मेधा से अर्जित धन वैभव और भूमि पर कब्जा करने के लिए जो विधान बनाया उसी को धर्म का नाम देकर एक गिरोह तैयार किया जो तीसरी शताब्दी में यूरोप और सातवी शताब्दी से अरब में पैदा हुवा।
इतने वर्षों में इसी मोडस ऑपरेंडी से विश्व के 122 देशों में ईसाइयों ने , और 56 देशों में मुसलमानों ने जर जोरू और जमीन पर कब्जा किया।

भारत शाश्त्रार्थ का देश है - 1030 में अलुबेरणी ने लिखा।
सैकड़ो दृश्टान्त है जब लोगों ने शाश्त्रार्थ से एक दूसरे को अपना अनुयायी बनाया। आदि शंकर और मंडन मिश्र का प्रसिद्ध शाश्त्रार्थ इसका उद्धरण है।

ये जाहिलियत भारत भूमि की धरती का कलंक है।

क्या डॉ अम्बेडकर को संस्कृत आती थी ?
नहीं आती थी।
तो कहां से पढ़ लिया उन्होंने।
पढ़ भी लिया और असहमति थी तो क्या किसी शास्त्री के पास जिज्ञासा लेकर गए कि ऐसा ही है या कि किसी ने क्षेपक घुसेड़ दिय्या है ?

दरअसल 1927 तक उनको कोई नही जानता था। ये कदम उन्होंने स्वयं के मन से राजनैतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति हेतु उठाया या फिर अंग्रेज आकाओं ने उनसे ऐसा करवाया - ये गहन जांच का विषय है।

क्योंकि 1928 में जब साइमन आया तो पूरे भारत ने उसका विरोध किया। लाला लाजपत राय ने अपने जीवन की कुर्बानी उसी का विरोध करते हुए दिया था।

लेकिन साइमन डॉ आंबेडकर को बहुत पसंद आया। और उसके साथ इन्होंने पहली बार अछूत शब्द को ब्रिटिश डॉक्यूमेंट का हिस्सा बनाया। आगे की कहानी आप जानते हैं।

https://sabrangindia.in/article/why-did-dr-babasaheb-ambedkar-publicly-burn-manu-smruti-dec-25-1927

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1892041780825880&id=100000602280268

Tribhuwan Singh's photo. #जंक_फ़ूड #नेगेटिव_एनर्जी का #स्रोत:



Tribhuwan Singh's photo.
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"अहमन्नमहमन्नम" मैं अन्न हूँ । ( तै. उपनिषद)
अन्न ब्रम्ह है। अर्थात अन्न ही एनर्जी है। अन्न ही प्राणरस है। अन्न न मिलने की स्थिति में प्राण पखेरू इस काया को त्याग देते हैं।
रहीम ने लिखा:
"रहिमन रहिला की भली जो परसत चित लाय।
परसत मन मैला करै सो मैदा जरि। जाय ।।"

चित लगाकर बनाये और परोसे गए भोजन में प्राण होता है। प्राण यानी सात्विक या पॉजिटिव एनर्जी। मां के हाँथ का बनाया गया रूखा सूखा भी दुनिया का स्वादिष्ट व्यंजन लगता है। क्योंकि उसमें मां के मन का भाव भी भोजन में ट्रांसफर हो जाता है। और उस भोजन से सात्विक ऊर्जा या पॉजिटिव एनर्जी मिलती है।

इसीलिए कृष्ण ने दुर्योधन के राजसी आतिथ्य का त्यागकर विदुर के घर साग रोटी खाया था। इसीलिए भोजन वही करना चाहिए जो प्रेम से पकाया और परोसा गया हो। ये भोजन का मनोवैज्ञानिक पक्ष है ।

ताजे भोजन में भी सात्विक या पॉजिटिव एनर्जी मिलती है। भागवत गीता के अनुसार एक प्रहर यानी 3 घण्टे से ज्यादा बासी भोजन तामसी हो जाता है। तामसी अर्थात नेगेटिव एनर्जी।

"यातयामम् गतरसम् पूति पर्युषितं च यत।
उच्छिष्टमपि चामेध्यम् भोजनं तामसप्रियम्।।"
( भाग गीता 17.10)
अर्थात " खाने से तीन घण्टे पूर्व पकाया गया, रसहीन, बिगड़ा एवं दुर्गन्धयुक्त जूठा एवं अश्पृश्य वस्तुओं से युक्त भोजन तामसी लोगो को प्रिय होते हैं। "
तामसी अर्थात नेगेटिव एनर्जी से युक्त पर्सनालिटी।
जितने भी जंक फूड हैं वे नेगेटिव एनर्जी के स्रोत होते हैं। यदि उनमे presrvative न मिलाया जाय तो वे सड़ जायँ।
( आजकल ऑर्गनिक का बड़ा जोर है। भारत मे सिरका अचार आदि जो भी बनते थे वे बिना preservative के बनते थे।
अब मॉडर्न युग के लोगों को वो सब उपलब्ध नहीं है। )
नेगेटिव एनर्जी स्ट्रेस का प्रबल स्रोत होता है और स्ट्रेस से आप जानते है कि मॉनसिक अवसाद होता है उससे - डायबिटीज ब्लड प्रेशर आदि होता है।
सात्विक भोजन से आयु, सत्व ( अस्तित्व), बल, आरोग्य, सुख और संतोष बढ़ता है। यानी स्ट्रेस कम होता है।

पश्चिमी जीवन पद्धति नेगेटिव एनर्जी का संचय करती है और मन मे असंतोष, भय, संशय और कुंठा पैदा करती है क्योंकि उनका भोज्य प्रायः नेगेटिव एनर्जी वाला ही होता है।

पैक्ड फ़ूड = जंक फूड = स्ट्रेस युक्त जीवन = ब्लड प्रेशर डायबिटीज, मॉनसिक अवसाद।

#जैसा_खाय_अन्न #वैसा_बने_मन्न।

हिन्दुओ को टुकडे टुकड़े में बांटने की अंग्रेजों की शाजिश को संविधान में जगह क्यों दी गयी ?

हिन्दुओ को टुकडे टुकड़े में बांटने की अंग्रेजों की शाजिश को संविधान में जगह क्यों दी गयी ?

जाहिर सी बात है कि पूरी दुनिया में अपना परचम लहराने वाले यूरोपीय ईसाईयों को जितनी संपत्ति भारत में मिली उतना ही कड़ा मुकाबला भी उनको भारत की धरती पर ही मिली ।

प्रामाणिक सूत्र आज बताते हैं कि अमेरिका में इन्होंने 1500 से 1800 AD के बीच वहां के सोने चांदी के खदानों और वेयरहाउस के मालिकों का कत्ल करके उस पर कब्जा किया और वही सोना चांदी बहुत बाद में भारत में आकर व्यापार किया ।
लेकिन इस दौरान उन्होंने 20 करोड़ रेड इंडियन का ईसाइयत का परचम गाड़ने के लिए उनका क़त्ल कर दिया ।

लेकिन भारत जैसे विकसित तकनीक के देश में वे ऐसा न कर पाए ।
क्यों ?

क्योंकि भारत के लोगों ने उनका सशस्त्र विरोध किया ।

1857 इसका एक उदाहरण है जिसको mutiny का नाम दिया उन्होंने ।

मुघलो ने राज्य किया लेकिन वे भारत के निर्माण कला और सशस्त्र भारतियों को खत्म न कर पाए ।
न वे इस देश में लुटे धन को देश के बाहर ले गए।
इसलिए 1750 तक भारत पूरी दुनिया के 25% जीडीपी का मालिक बना रहा ।

1500 तक भारत पूरी दुनिया की 35% जीडीपी का मालिक था ।

लेकिन जब उन्होंने भारतीय शिल्प को नष्ट करना शुरू किया तो 1857 में भारतीयों ने उनका सशस्त्र विरोध किया।

इसीलिए 1860 में उन्होंने Indian Arms Act बनाकर भारतियों को निशस्त्र किया ।

फिर उसके बाद भी विरोध जारी रहा तो उन्होंने भारतियों को , विशेषकर हिंदुओं को कई टुकड़ों में बांटने का सफल प्रयास किया ।
1932 में उन्होंने हिंदुओं की एक लड़ाकी कौम सिख को हिंदुओं से अलग मान्यता दिया।
उसके पहले उन्होंने वन वासी और पहाड़ वासी हिंदुओं को #Animist के नाम से अलग किया ।

फिर 1935 में भारत के इस 25% जीडीपी के निर्माताओं के वंशजों को कंगाल , बेरोजगार, और बेघर करने के उपरांत #एनिमिस्ट को शेड्यूल ट्राइब और बेरोजगार लोगों को शेड्यूल कास्ट में बाँट कर अलग हिंदुओं को अलग अलग बाँट दिया।
अपनी शाजिश को भारतीय पक्ष बनाने हेतु उन्होंने #फुले#आंबेडकर और #पेरियार को उसी तरह प्रयोग किया जिस तरह 1757 में #मीरजाफर का प्रयोग किया था ।

यही ईसाइयत की शाजिश संविधान में भी घुसेड़ दिया , संविधान निर्माताओ ने ।

देखिये आज कितने ST और SC ईसाई बन गये हैं और निरन्तर बनते जा रहे है ।

रोमन और ग्रीक सभ्यता को किस तरह नष्ट कर उन्होंने ईसाईयत फैलाई , उस अनुभव को भारत में execute किया ।

और ओबीसी उसी शाजिश की स्वतंत्र भारत में एक्सटेंशन है वरना कोई कमीशन पुरे भारत का मात्र 6 महोने में सर्वेक्षण करके किसी निर्णय पर पहुँच सकता है ?
वो भी 1989 में ?
जब लोगों के पास एक लैंडलाइन भी एक उपलब्धि थी ?

टोटल फ्रॉड विथ भारत that is India .

वर्ण व्यवस्था शाजिश या आधुनिक लोकतन्त्र की जननी


varna system ?? colour of skin or more than modern democratic institutions / It is classification of duties
वर्ण व्यवस्था शाजिश या आधुनिक लोकतन्त्र की जननी
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#पूर्वपक्ष :

जब यूरोप के ईसाई विद्वानों ने संस्कृत ग्रंथो का अदध्ययन किया तो विलियम जोहन्स ने 19वी शताब्दी के अंत मे बताया कि संस्कृत latin और ग्रीक से भी भव्य भाषा है / बाद मे इस को सारी यूरोपीय भाषाओं कि जननी घोषित किया / बाद मे अनेक ईसाई विद्वान आए जिनहोने संस्कृत ग्रन्थों से भारतीय परंपरा को समझने कि कोशिश की और फिर उसका विश्लेषण किया लेकिन मासूमियत मे या शाजिसन उसको अपनी रीति रिवाज और बाइबल के धर्मसिद्धांतों के अनुरूप उसकी व्याख्या भी की /

उनका पहला शिकार बना वर्ण व्यवस्था / उन्होने बताया कि वर्ण अर्थात चमड़ी का रंग / और उसी के साथ साथ दक्षिण भारत मे ईसाई अधिकारियों और मिशानरियो ने एक विवेचना की और स्थापित किया कि दक्षिण भारतीय तमिल एक अलग नश्ल थे जिनको #द्रविड़ की संज्ञा दी गई /
अब एक नयी परिकल्पना मैक्स मुलर ने गढ़ी कि आर्य अर्थात संस्कृत बोलने वाले लोग बाहर से आए और द्रविणों को दक्षिण मे विस्थापित कर दिया / ये आर्य गोरों अंग्रेजों से निम्न थे परंतु काले द्र्विनों से उच्च थे / अब फिर उसमे बताया कि पूरे भारत के तीन वर्ग क्षत्रिय ब्राम्हण वैश्य आर्य अर्थात साफ रंग के थे और शूद्र और द्रविन काले थे / तो जो साफ रंग के थे वो हुये सवर्ण बाकी सब असवर्ण / लेकिन कौटिल्य के अर्थशास्त्रम और अन्य ग्रन्थों के अनुसार सवर्ण और असवर्ण मात्र शादी विवाह के संदर्भ मे ही उद्धृत है/ अर्थात एक ही और समान कुल समुदाय मे हये विवाह को सवर्ण और पृथक पृथक कुल समुदाय मे होने वाले विवाह को असवर्ण की संज्ञा दी गई/
लेकिन आज समाज मे और राजनीति मे इसका अर्थ किस रूप मे प्रयोग होता है , आप सब लोग उससे अवगत हैं /

ये तो हुआ संक्षिप्त सारांश : अब इसी आधार पर भारत के जो लोग आर्य थे वो हुये सवर्ण और जो काले शूद्र और द्रविण थे वो हुये असवर्ण बाद मे एक और वर्ण भी जोड़ा गया अवर्ण / तो सवर्ण ; असवर्ण : और अवर्ण

#उत्तरपक्ष :

अलुबेर्नी ने 1030 AD मे संस्कृत के बारे मे लिखा कि ये ऐसी भाषा है जिसमे किसी शब्द का अर्थ समझने के लिए उस वाक्य मे उस शब्द के पहले और बाद के शब्दों को , और किस संदर्भ और प्रसंग मे उसका प्रयोग किया जा रहा है ; इसको यदि नहीं समझा गया तो उस शब्द का अर्थ समझ मे नहीं आएगा , क्योंकि एक ही शब्द के कई अर्थ हो सकते हैं /
ईसाई संस्कृतज्ञों ने बताया कि वर्ण यानि चमड़ी का रंग / ठीक है हो सकता है, क्योंकि श्याम वर्ण भारत मे काफी श्रद्धा से जुड़ा हुआ रंग है भगवान राम और कृष्ण दोनों ही श्याम वर्ण के थे /
लेकिन वर्ण का एक अर्थ शब्द भी होता है / तुलसीदास की रामचरीत मानस का प्रथम श्लोक है :
वर्णनामर्थसंघानाम रसानाम छन्दसामपि /
मंगलनाम च कर्तारौ वंदे वाणी विनायकौ //
अर्थात – अक्षरों अर्थसमूहों रसों छंदो और मगल करने वाली सरस्वती और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ /
वर्ण का अर्थ अगर चमड़े का रंग है तो वरणाक्षर का क्या अर्थ है ? वर्णमाला का क्या अर्थ है ?
वर्णध्रर्मआश्रम का क्या अर्थ है ?
वर्ण व्यवस्था मे और वर्णध्रर्मआश्रम मे वर्ण का अर्थ होता है वर्गीकरण / तो किस चीज का वर्गीकरण ?
वर्णधर्मआश्रम में जीवन को चार चरणों मे व्यतीत करने का वर्गिकरण है वर्ण का अर्थ ब्रांहचर्य गृहस्थ वानप्रसथा तथा सन्यास , ये चारा आश्रम हैं /
वर्ण-व्यवस्था : मे भी वर्ण का अर्थ है वर्गीकरण / क्लासिफिकेसन
तो प्रश्न उठता है कि किस चीज का वर्गीकरण ??

आइये समझते हैं / किसी भी समाज के उत्थान के लिए ज्ञान का उद्भव और उसका प्रसार और उसका समाज के हित मे जीवन राज्य और राष्ट्र की समृद्धि के लिए उपयोग आवश्यक है - जो इन कार्यों मे रुचि रखेगा और ज्ञान प्राप्त करेगा -- उसको ब्रामहन की संज्ञा दी जाएगी / लेकिन ज्ञान को प्राप्त करने वाले को अपरिग्रही जीवन व्यतीत करना होगा/
किसी राज्य या राष्ट्र मे जीवन उपयोगी वस्तु अन्न पशु पालन व्यवसाय और सर्विस सैक्टर की आवश्यकता होती है - जो इन कार्यों मे रुचि रखेगा और इन कार्यों को संपादित करेगा उसे शूद्र की संज्ञा दी जाएगी - आज की तारीख मे सर्विस सैक्टर इंजीनियर टेक्नोक्रटे आदि आदि /
किसी भी राष्ट्र मे निर्मित वस्तुओं को देश विदेश मे ले जाकर क्रय विक्रय की आवश्यकता होती है - जो व्यक्ति स्वरूचि के अनुसार ये काम करेगा - उसे वैश्य कहा जाएगा /
किसी भी समाज मे सुशासन हेतु समाज ज्ञान विज्ञान , निर्माण और व्यवसाय के उन्नति के लिए इन तीन वर्गों और राज्य और राष्ट्र की रक्षा करने की आवश्यकता होती है - जो व्यक्ति इस कार्य को स्वरूचि के अनुसार करेगा उसको क्षत्रिय की संज्ञा दी गई /

अब इस कर्म आधारित धर्म यानि कर्तव्य के वर्गीकरण को संस्कृत ग्रन्थों से समझने की कोशिस करते हैं /

गीता मे कृष्ण कहते हैं कि – चतुषवर्ण मया शृष्टि गुणकर्म विभागसः
अर्थात मैंने चारो वर्णों की रचना की है लेकिन गुण और कर्मों के अनुसार / अर्थात जिसके जैसे कार्य होंगे उन्हीं गुणों के आधार पर उनको उस श्रेणी मे रखा जाएगा /
आचार्य कौटिल्य कहते है – #स्वधर्मो ब्रांहनस्य अध्ययनम अद्ध्यापनम यजनम याजनम दानम प्रतिगहश्वेति /
क्षत्रियस्य अद्ध्ययनम यजनम दानम शस्त्राजीवो भूतरक्षणम च /
वैश्यस्य अध्ययनम यजनम दानम कृशिपाल्ये वाणिज्या च/
शूद्रश्य द्विजात्शुश्रूषा वार्ता वार्ता कारकुशीलवकर्म च /
बाकी तो सबको सब पता ही है मैं सिर्फ स्वधर्मों और शूद्र पर लिखूंगा /
स्व धर्मो अर्थात अपने धर्मानुसार ,अपनी इच्छा से , अपने विवेक से ,अपने एप्टिट्यूड के अनुसार अपने धर्म का पालन करें /ज़ोर जबर्दस्ती नहीं है, न समाज की तरफ से सरकार की तरफ से क्योंकि ये कौटिल्य का G O हैं यानि सरकारी परवाना छपा है/
धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं है ये आप सब जानते हैं और अगर नहीं जानते तोhttps://www.facebook.com/…/difference_between_dharma_and_re… पढे /
जब आप मातृधर्म पित्रधर्म राष्ट्रधर्म पुत्रधर्म जैसे शब्दों का प्रयोग कराते है तो धर्म का अर्थ कर्तव्य होता है /

आज लोकतन्त्र मे जब न्यायपालिका संसद सेना और कार्यकारिणी हैं सबके कर्तव्य ही तो निर्धारित किया गए हैं संविधान ने / तो वर्ण व्यवस्था आधुनिक लोकतन्त्र की जननी ही तो है /
और जहां तक जन्मना किसी वर्ण को धारण करने की बात है तो ये कम से कम कौटिल्य के समय तक तो नहीं था /
जन्मना जायते शूद्रः कर्मणाय द्विजः भवति " एक मिथ नहीं एक सच ; प्रमाण कौटिल्य अर्थशास्त्रम्
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आंबेडकर जी के पूर्व के क्रिश्चियन मिशनरियों के लेखक और इतिहासकारों ने ऋग्वेद के पुरुष शूक्त को आधार बनाकर समाज में राजनैतिक और धर्म परिवर्तन के लिहाज से प्रमाणित करने की कोशिश की कि वैदिक काल से ये समाज का वर्गीकरण कर्म आधारित न होकर जन्म आधारित रहा है /
उसी विचार को बाद में मार्क्सिस्टों ने और आंबेडकर वादियों ने आगे बढ़ाया / 1901 की के पूर्व जाति आधारित जनगणना भी नहीं होती थी (पहली जनगणना 1871 में हुयी थी ) बल्कि वर्ण और धर्म के आधार पर होती थी/ 1901 में जनगणना कमिशनर रिसले नामक व्यक्ति ने ढेर सारे त्रुटिपूर्ण तथ्यों और एंथ्रोपोलॉजी को आधार बनाकर 1700 से अधिक जातियों और 43 नाशलों में भारत के हिन्दू समाज को बाटा / वही जनगणना भारतीय हिन्दू समाज का आजतक जातिगत विभाजन का मौलिक आधार है / जाति के इस नियम को उसने "कभी गलत न सेद्ध होने वाला जाति का नियम " बनाया जिसके अनुसारे जिसकी नाक जितनी चौणी वो समाज के हैसियत के पिरामिड मे उतना ही नीचे होगा / और उसले अल्फबेटिकल लिस्ट न बनाकर इसी नाक के सुतवापन और चौड़ाई को मानक मानकर इसी हैसियर के अनुसार लिस्ट बनाई / जो इस लिस्ट ऊपर दर्ज हैं वो हुये ऊंची जाति और जो नीचे हैं वो हुये निचली जाति /

पुनश्च : गीता के -"जन्मना जायते शूद्रः कर्मण्य द्विजः भवति " को इतिहासकार प्रमाण नहीं मानते क्योंकि उनके अनुसार महाभारत एक मिथ है /

लेकिन अभी मैं कौटिल्य अर्थशाश्त्रम् पढ़ रहा था तो एक रोचक श्लोक सामने आया / " दायविभागे अंशविभागः " नामक अध्ह्याय में पहला श्लोक है -"एक्स्त्रीपुत्राणाम् ज्येष्ठांशः ब्राम्हणानामज़ा:, क्षत्रियनामाश्वः वैश्यानामगावह , शुद्रणामवयः "
अनुवाद : यदि एक स्त्री के कई पुत्र हों तो उनमे से सबसे बड़े पुत्र को वर्णक्रम में इस प्रकार हिस्सा मिलना चाहिए : ब्राम्हणपुत्र को बकरिया ,क्षत्रियपुत्र को घोड़े वैश्यपुत्र को गायें और शूद्र पुत्र को भेंड़ें /
दो चीजें स्पस्ट होती हैं की वैदिक काल से जन्म के अनुसार वर्ण व्यस्था नहीं थी क्योंकि कौटिल्य न तो मिथ हैं और न प्रागैतिहासिक / ज्येष्ठपुत्र को कर्म के अनुसार ही हिस्सा मिलता था/ और एक ही मान के पुत्र कर्मानुसार किसी भी वर्ण में जा सकते थे /
https://www.blogger.com/blogger.g…
अब शुद्र् के कर्तव्यों के बारे मे जानना हो तो शुश्रूषा यानि सर्विस सैक्टर , और वार्ता जो की विद्या का ही एक अंग है उसमे एक्सपर्ट होना / वार्ता का अर्थ है -https://www.blogger.com/blogger.g…
अब अंत मे सवर्ण असवर्ण और अवर्ण जैसे शब्दों को जानना चाहते है तो पढ़ें -https://www.blogger.com/blogger.g…
ईसाई विद्वानों ने ये तो बताया कि वर्ण यानि चमड़ी का रंग ।लेकिन ये न बताया कि कौन सा रंग ? काला सफ़ेद की पीला ।
तो सवर्ण किस रंग का ?
और असवर्ण किस रंग का ?
अगर असवर्ण माने काला रंग तो हमारे भगवान् राम और कृष्ण तो काले / साँवले ही थे न
तो वो भी असवर्ण ??
यानि पेंच कही और है ।
हाँ सही सोचा आपने ये बाइबिल का लोचा है।

संविधान मे खडयंत्र : ऊपर वर्णित तीन वर्ग ब्रामहन क्षत्रिय और वैश्य , जिनको कि मक्ष्मुल्लर ने आर्य ( पीले या गहए रंग का : सफ़ेद रंग से नीचे ) होने की कहानी गढ़ी - उनको 1901 मे वर्ण के बजाय 3 जातियों का नाम दिया गया / बाकी एन वर्ग शूद्र मे से 1700 से ऊपर जातिया खोजकर , बाद मे उनको SC ST और OBC बनाकर संविधान मे घुशेड दिया गया /

भारत के संविधान मे ये फर्जी #Aryan_Invasion_Theory घुसेड़ी गई है / जब तक इसका निरीक्षण परीक्षण और शोधन और संशोधन नहीं होगा, भारत खंड खंड मे बंटा रहेगा , और राजनीतिज्ञो कसाइयों इसाइयों और मर्कसियों का #भारत_तोड़ो_भारत_लूटो अभियान चलता ही रहेगा /