Tuesday, 17 October 2017
TRIBHUWAN UVACH - "त्रिभुवन उवाच" : शूद्रों से टैक्स न लिया जाय : #कर सिर्फ ट्रेडर्स य...
TRIBHUWAN UVACH - "त्रिभुवन उवाच" : शूद्रों से टैक्स न लिया जाय : #कर सिर्फ ट्रेडर्स य...: # मनु_महाराज का मनुवादी आदेश: # कर सिर्फ ट्रेडर्स यानी वाणिज्यिक लोगों से लिया जाय। उपकरणों से शिल्पकर्म रत # शूद्रों से कर न लिया ...
शूद्रों से टैक्स न लिया जाय : #कर सिर्फ ट्रेडर्स यानी वाणिज्यिक लोगों से लिया जाय - मनुस्मृति
#मनु_महाराज का मनुवादी आदेश: #कर सिर्फ ट्रेडर्स यानी वाणिज्यिक लोगों से लिया जाय।
उपकरणों से शिल्पकर्म रत #शूद्रों से कर न लिया जाय।
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टैक्स लेना राज्य का कर्तव्य और अधिकार दोनों है, लेकिन कैसी सरकार टैक्स ले सकती है और किससे कितना ले सकती है, इसके भी सिद्धांत गढे गए हैं, पहले भी और हाल में भी।
ब्रिटिश जब कॉलोनी सम्राट हुवा करता था तब वहां के कुछ बड़े विद्वानों ने गैर जिम्मेदार सरकार को टैक्स न देने की बात की, थी जिनका नाम आज भी उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।
आज के संदर्भ में सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति जिसने टैक्सेशन का सकारण विरोध किया, था वो था डेविड हेनरी थोरौ जिसके सिविल diobedience के फार्मूले को गांधी ने भारत मे दमनकारी कुचक्री क्रूर बर्बर और Hypocrite ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रयोग किया। लेकिन चूंकि हम अनुवाद के मॉनसिक गुलाम है तो भाइयो ने उसे हिंसा और अहिंसा से जोड़ दिया।
बहरहाल ये लिंक पढ़िए जिसमे सिविल disobedience का सिद्धांत वर्णित है ।http://historyofmassachusetts.org/henry-david-thoreau-arre…/
यदि आप ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट के बजाय भारतीय संस्कृत ग्रंथों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि वस्तुतः धर्मशास्त्र कहकर प्रचारित किये ग्रंथ सामाजिक शास्त्र है जो परिवर्तनशील जगत में जीने के दर्शन और सिद्धांत देते हैं। लेकिन चूंकि सनातन के अनुसार जगत परिवर्तनशील है इसलिए सामाजिक नियम और दर्शन भी परिवर्तित किये जाते रहे हैं समय समय पर - As and required टाइप से। कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ने वाले लोग जानते है कि कौटिल्य ने जब समाज के लिए नियम लिखे तो उन्होंने पूर्व के समाजशास्त्री ऋषियों के नियमो का उल्लेख करते हुए लिखा कि, उनके अनुसार ऐसा था लेकिन मेरे अनुसार ऐसा है। और भारतीय हिन्दू जनमानस उसको स्वीकार करता था।
यदि आप ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट के बजाय भारतीय संस्कृत ग्रंथों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि वस्तुतः धर्मशास्त्र कहकर प्रचारित किये ग्रंथ सामाजिक शास्त्र है जो परिवर्तनशील जगत में जीने के दर्शन और सिद्धांत देते हैं। लेकिन चूंकि सनातन के अनुसार जगत परिवर्तनशील है इसलिए सामाजिक नियम और दर्शन भी परिवर्तित किये जाते रहे हैं समय समय पर - As and required टाइप से। कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ने वाले लोग जानते है कि कौटिल्य ने जब समाज के लिए नियम लिखे तो उन्होंने पूर्व के समाजशास्त्री ऋषियों के नियमो का उल्लेख करते हुए लिखा कि, उनके अनुसार ऐसा था लेकिन मेरे अनुसार ऐसा है। और भारतीय हिन्दू जनमानस उसको स्वीकार करता था।
लेकिन गुलाम मानसिकता के स्वतंत्र भारतीय चिंतक, अब्राहमिक मजहबों के उन सिद्धांत से प्रभावित रहे है जो ये कहते है कि होली बुक्स में लिखे गए पोलिटिकल मैनिफेस्टो अपरिवर्तनीय हैं, और उसी चश्मे से भारत को देखने समझने के अभ्यस्त हैं।
यहां कर यानी टैक्स के सिद्धांतों का अतिप्राचीन संस्कृत ग्रंथ से उद्धारण देना चाहूंगा- जिसका समयकाल आप स्वयं तय कीजिये।
"स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात परांमुखः।
शस्त्रेण वैश्यान रक्षित्वा धर्मयमाहरतबलिम्।।
शस्त्रेण वैश्यान रक्षित्वा धर्मयमाहरतबलिम्।।
राजा का धर्म है कि कि वह युद्ध मे विजयप्राप्त करे। पीठ दिखाकर पलायन करना उसके लिए सर्वथा अनुचित है। शास्त्र के अनुसार वही राजा प्रजा से कर ले सकता है जो प्रजा की रक्षा करता है।
धान्ये अष्टमम् विशाम् शुल्कम विशम् कार्षापणावरम।
कर्मोपकरणाः शूद्रा: कारवः शिल्पिनः तथा।।
कर्मोपकरणाः शूद्रा: कारवः शिल्पिनः तथा।।
संकटकाल में ( आपातकाल में सामान्य दिनों में नहीं) राजा को वैष्यों से धान्य के लाभ का आठवां भाग, स्वर्णादि के लाभ का बीसवां भाग कर के रूप में लेना चाहिए। किंतु शूद्र, शिल्पकारों, व बढ़ई आदि से कोई कर नहीं लेना चाहिए क्योंकि वे उपकरणों से कार्य करके जीवन यापन करते हैं।
#मनुषमृति : दशम अध्याय ; श्लोक संख्या 116, 117।
#मनुषमृति : दशम अध्याय ; श्लोक संख्या 116, 117।
नोट: स्पष्ट निर्देश है कि श्रमजीवी या श्रम शक्ति से कर संकटकाल में भी नही लेना चाहिए।
कर सिर्फ वाणिज्य करने वाले वाणिज्य शक्ति से ही लेना चाहिए।
कर सिर्फ वाणिज्य करने वाले वाणिज्य शक्ति से ही लेना चाहिए।
यूनिवरसिटी और विश्वविद्यालय का अंतर
एक प्रश्न Sumant Bhattacharya सर निरन्तर उठाते आये हैं कि विश्वविद्यालय की परिभाषा क्या है ?
मुझे नही लगता कि पत्रकारिता के जगत में पद्मश्री अवार्डी पत्रकार भी इन मूलभूत महत्वपूर्ण विषयो पे अपनी बात रखने की हिम्मत रखते हैं ।
क्यों ? क्योंकि वे आसक्त भाव की पत्रकारिता करते हैं।
ये प्रश्न कोई निरासक्त जिज्ञासु पत्रकार ही उठा सकता है ।
मैं इस विषय पे सुमन्त दा द्वारा उठाये प्रश्नो को लाइक करके चला आता हूँ। कभी कमेंट नहीं करता।
लेकिन जो कमेंट आते हैं उनसे ये लगता है कि ये लोग विश्विद्यालय को, यूनिवर्सिटी का ठीक उसी तरह समकक्षी समझते हैं, जैसे आमजन धर्म को रिलीजन और मजहब का समकक्षी समझते हैं।
लेकिन मेरा ज्ञान नही, अनुभव बताता है कि यूनिवर्सिटी ट्यूबलर ज्ञान की एक ऐसी प्रयोगशाला है, जहां कुछ विशेष लोगों को, किसी विषय विशेष का, विशेषज्ञ बनने की डिग्री दी जाती है - जिससे आप रोजी रोटी के एक्सपर्ट बन सकें।
लेकिन विश्वविद्यालय एक अंतरिक्षीय ( related to cosmos) संस्था है, जिसमे विश्व को बसुधैव कुटुम्बकम समझते हुए , विश्व और अंतरिक्ष को, खुद से जोड़ने की, और स्वयं को अंतरिक्ष और विश्व से जोड़ने की तकनीक समझाई जाती है।
अर्थात स्वयं को समझने का ज्ञान वितरित किया जाता था, जिसको अध्यात्म के नाम से जाना जाता है। इसी को विदेशी भारत के संदर्भ में Centre of higher learning बोलते आये है। इसी को विश्वविद्यालय कहते हैं।
कबीर तुलसी मीरा बाई विश्वविद्यालय के छात्र थे।
अम्बेडकर नेहरू आदि यूनिवर्सिटी स्टूडेंट थे।
कबीर तुलसी मीरा बाई विश्वविद्यालय के छात्र थे।
अम्बेडकर नेहरू आदि यूनिवर्सिटी स्टूडेंट थे।
अपनी समझ के अनुसार लिखा।
अंतिम सत्य नहीं है ये।
ग्रंथ या ग्रंथालय जलाने की मानसिकता ही bigotry है: बख्तियार खिलजी हो या अंबेडकर
ग्रंथ या ग्रंथालय जलाने की मानसिकता ही bigotry है:
बिगोट्री शब्द से बहुसंख्यक भारतीय परिचित नही है । इसको अरबी या फ़ारसी में क्या कहते है ये मुझे नहीं मालूम और उनको भी नही मालूम जो बिगोट्री का अनुवाद धर्मान्धता में करते हैं।
जो इस बिगोट्री शब्द का भारत के संदर्भ में, धर्मान्धता में अनुवाद करते और समझते है, उनके लिए सिर्फ यही कहा जा सकता है कि उनको मॉनसिक गुलामी ( Mental servitude) की बीमारी है, जो न उनको समझते है जिनकी पवित्र पुस्तकों में ये शब्द और सिद्धांत वर्णित है और न ही भारत को समझते हैं।
ये काफिरता का सिद्धांत ( Theology of Infidelism) है जो ये कहता है कि मेरा गॉड या अल्लाह ही सच्चा गॉड/ अल्लाह है, और मेरा रिलीजन या मजहब ही सच्चा रिलीजन/मजहब है। जो इस बात को स्वीकार नहीं करता वो काफ़िर (Infidels) है। और उसको इस धरती पर जीने का अधिकार नही है। इसलिए इनका कत्ल करके इनकी जर जोरू और जमीन पर कब्जा करना ही गॉड या अल्लाह के आदेश का पालन करना है। और इस सिद्धांत का पालनकरने वाला ही इन मजहबों का सच्चा बन्दा है।
2000 वर्षों से इसी सिद्धांत को अपनाते हुए पूरे विश्व मे कत्ले आम हुए। इसी सिद्धांत के तहत दूसरे विश्वयुद्ध में 60 लाख यहूदियों और 40 लाख जिप्सियों का कत्ल किया गया।
जेरुसलम और अरब के तीन टोलों ( ट्राइब्स) की मानसिकता को आधार बना कर पूरे विश्व में मानवता की हत्या करके उनके जर जोरू जमीन पर कब्जा किया गया। अमेरिका ऑस्ट्रेलिया इराक ईरान भारत सहित पूरा विश्व इस सिद्धांत का भुक्तभोगी है।
जर जोरू जमीन पे कब्जे के साथ साथ पुस्तको को जलाना भी इसी मानसिकता का परिचायक है।
हमको तो सिखाया जाता है कि पुस्तक यानी विद्या माई। गलतो से भी पुस्तक की तो बात ही छोड़िए, किसी कॉपी पर भी पैर पड़ जाय तो तुरंत उसको उठाकर माथे से लगाना और सरस्वती मां से क्षमा मांगना। हमने तो आज तक किसी की पुस्तक नहीं जलायी।
तो नालंदा का ग्रंथालय जलाने वाला चाहे बख्तियार ख़िलजी रहा हो या फिर मनुषमृति जलाने वाले डॉ अम्बेडकर, इतिहास दोनों का आकलन एक बिगोट के रूप में ही करेगा।
Why India Needs Different Policies from rest of the world
कुछ भारतीय विद्वानों के लिए:
जो हर बात में भारत को अमेरिका इंग्लैंड और सिंगापुर के तराजू से तौलने की बीमारी से ग्रसित है, उनको ये बात पता भी है कि भारत विश्व की मात्र 4% धरती का मालिक है, लेकिन उसको विश्व की 20% आबादी को पालित पोसित करना है।
तो जमाना चाहे बैलगाड़ी का रहा हो चाहे हवाई जहाज और ग्लोबल विलेज का - जिनसे आप भारत की तुलना करते हैं, उनके बनाये नियम कानून, सामाजिक दृष्टि और दृष्टिकोण, आर्थिक दर्शन और नीति, भारत के संदर्भ में लागू करना निहायत ही मूर्खता है।
तो जमाना चाहे बैलगाड़ी का रहा हो चाहे हवाई जहाज और ग्लोबल विलेज का - जिनसे आप भारत की तुलना करते हैं, उनके बनाये नियम कानून, सामाजिक दृष्टि और दृष्टिकोण, आर्थिक दर्शन और नीति, भारत के संदर्भ में लागू करना निहायत ही मूर्खता है।
भारत को अपने जीवन के हर क्षेत्र में अपने स्वयं के नियम कानून दर्शन और सिद्धांत बनाने होंगे।
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