Sunday, 4 January 2015

जात और जाति का रहस्य : ऐतिहासिक तथ्य क्या कहते है ?? अगदी और पिछड़ी जाति का रहस्य क्या है ?? 24 Decmber 2014

उसी तरह पुर्तगालियों द्वारा ,, १६०० में जात के लिए के लिए Caste शब्द का प्रयोग किया गया / 1901 में जनगणनां Caste के आधार पर पहली बार करता है , और २००० से ज्यादा जातियां , "नेसल बेस इंडेक्स " और सोशल hiearchy , के आधार पर ./ उसने एक unfailing "लॉ ऑफ़ caste " बनाया और बताया कि "भारत में नाक की चौड़ाई किसी व्यक्ति के सामजिक हैसियत सामजिक स्टेटस के inversely proportionate होती है" / दूसरी मह्हत्वपूर्ण बात ये है कि सोशल hierarchy के क्रम जो उसने लिस्ट बनाई उसको अल्फबेटिकल क्रम में न रखकर सोशल hierarchy के आधार पर ऊपर से नीचे कि और लिस्टिंग किया / यहीं से उस ऊंची और निचली या अगड़ी और पिछड़ी जातियों के एक नए सिद्धांत की रचना होती है , जिसके आधार पर सरकारें आज भी काम कर रहीं है / हाल ही में जाटों को पिछड़ी जाति की लिस्ट में शामिल किया जाना सिर्फ इसी नजरिये से व्याख्यायित होता है /
 जात कि जाति ???
.................................................................................................................................
माँगी नावं न केवट आना ,कहत तुम्हार मर्म मैं जाना ...............................................................................................................

निषाद कहत सुनइ रघुराई ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई

हमरे कुल की रीति दयानिधि,संत मिले त करब सेवकाई \

रीति छोड़ उनरीति न करिहौं ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/

नदी नावं के हमहि खेवैया, औ भवसागर के श्री रघुराई /

तुलसी दास यही वर मांगू , उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /

--जात पांत न्यारी, हमारी न तिहारी नाथ ,

कहबे को केवट , हरि निश्चय उपचारिये

तू तो उतारो भवसागर परमात्मा

औ मैं तो उतारूँ , घाट सुर सरि किनारे नाथ /

नाइ से न नाइ लेत , धोबी न धुलाई लेत

त तेरे से उतराई लेत, कुटुंब से निकारिहयों /

जैसे प्रभु दीनबंधु ,तुमको मैं उतारयो नाथ /

तेरे घाट जैहों नाट मोको भी उतारियों

उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /

मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/.......चुन्नू लाल मिश्रा केवट राम संवाद /

 जात कि जाति ???
...एक जात शब्द को तुलसी दास ने बताया था ,,जिसमें केवट ने कहा कि
--रामचन्द्र जी आप और मैं एक ही जात के हैं ,,मैं नदी कि नावं खेता , और आप
भवसागर की नाव खेते हो , हमारी जात एक ही है ,जैसे नाउ नाउ से , और धोबी
धोबी से पारिश्रमिक नहीं लेता , तो वैसे एक केवट दूसरे केवट से कैसे
पारिश्रमिक ले सकता है / और लिया तो मुझे कुटुंब से बाहर कर दिया जाएगा
/यहाँ तक तो ठीक था /

लेकिन जब हमने जॉन मुइर ,मैक्समूलर ,और M A
शेरिंग पादरी , जैसे संस्कृतविज्ञों इंडोलॉजिस्ट से हम संस्कृत ग्रंथो को
संस्कृत - अंग्रेजी - अंग्रेजी , के क्रम में सीख कर, 1946 " शूद्र कौन थे "
, जैसे ग्रन्थ की रचना करते हैं , और उसकी उत्पत्ति वेदों में खोजने निकल
जाते हैं , तो हमारी मंशा पर भले ही सवाल न खड़े होते हों , लेकिन मेरे
तथ्यपरकता पर तो संदेह की सुई घूम ही जाएगी /

.......... आज न सही, कल सही .................................................

उसी तरह पुर्तगालियों द्वारा ,, १६०० में जात के लिए के लिए Caste शब्द का प्रयोग किया गया / 1901 में जनगणनां Caste के आधार पर पहली बार करता है ,
और २००० से ज्यादा
जातियां , "नेसल बेस इंडेक्स " और सोशल hiearchy , के आधार पर ./ उसने एक
unfailing "लॉ ऑफ़ caste " बनाया और बताया कि "भारत में नाक कि चौड़ाई उसके
सामजिक स्टेटस के inversely proportionate होती है / दूसरी मह्हत्वपूर्ण
बात ये है कि सोशल hierarchy के क्रम जो उसने लिस्ट बनाई उसको अल्फबेटिकल
क्रम में न रखकर सोशल hierarchy के आधार पर ऊपर से नीचे कि और लिस्टिंग
किया / यहीं से उस ऊंची और निचली या अगड़ी और पिछड़ी जातियों के एक नए
सिद्धांत की रचना होती है , जिसके आधार पर सरकारें आज भी काम कर रहीं है /
हाल ही में जाटों को पिछड़ी जाति की लिस्ट में शामिल किया जाना सिर्फ इसी
नजरिये से व्याख्यायित होता है /

 डॉ आंबेडकर खुद इस आधार को निराधार बताते हुए खंडन करते हैं , तो शायद एक ही
तथ्य स्पस्ट होता है , कि वे तात्कालिक समय के एंथ्रोपोलॉजी जैसे
विषयों में तो एक्सपर्ट थे ,लेकिन जब उन्होंने इतिहास की तरफ नजर उठाई तो ,
शायद कहीं फर्जी संस्कृत विदों के जाल में उलझ कर रह गये /

और जब हमारे देश के विद्वान जो कॉपी एंड पेस्ट के , आधार पर न जाने कितनी
पीएचडी ,लेते और देते रहते हैं , उन्होंने caste का अनुवाद जाति में करते
हैं , तो आधुनिक भारत की तस्वीर सामने आती है /

A L Basham जैसे लोग शायद इसी को जाति की तरलता और rigidity ऑफ़ caste सिस्टम के नाम से बुलाये //लेकिन ये तो किसका काम है , आपको बता ही दिया लेकिन OCD के मरीज तथाकथित
दलित चिंतक @.... इसको भी ब्राम्हण वाद के जिम्मे , ठोंक देते हैं /डॉआंबेडकर को ये छूट दी जा सकती है , की उनके पास सूचना के श्रोत सीमित थे ,
इसलिए जिस भी निष्कर्ष पर वे पहुंचे , अगर वे होते , तो शायद उसको
रेक्टिफी करते /

लेकिन ये OCD के मरीज ,,,,,इनको क्या कहा जाय ??

 अतिशूद्र Outcastes kutumb से निकारिहों

इसीको ईसाई विद्वानों ने ..Outcasts का नाम दिया /, हिन्दू समाज में समाज को
नियंत्रित करने के लिए एक व्यवस्था थी - जो उन मान्यताप्राप्त परम्पराओं
का पालन नहीं करेगा उसको _"कुटुंब से निकारिहों " यानी जात-बाहर कर दिया
जाता था / यानि उनको भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करना पड़ता था / उनकी सारी व्यक्तिगत अधिकारों से वंचित कर कुटुंब और समाजबहिस्कृत कर दिया था /

इस बात का वर्णन डॉ बुचनन ने अपनी पुस्तक में १८०७ में भी किया है - कि
शूद्रों को अपने कुटुंब को संचालित करने के लिए ,उस समाज के बुजुर्ग आपसी
सलाह के उपरांत किसी को सजा भी दे सकते थे /
ये सामाजिक
व्यवस्था ईसाइयत फैलाने में सबसे बड़ी बाधा थी / इसबात का जिक्र संस्कृत
विद्वान मॅक्समुल्लर और पादरी M A शेरिंग दोनों ने लिखा है /
इस
लिए इस कुप्रथा का दानवीकरण करना ही पड़ेगा / और वही हुवा --इसी को
outcasts कहा डॉ आंबेडकर ने ,,और आगे चलकर वर्ण व्यवस्था में एक और अंग के
रूप में लिखा -"अवर्ण " /
अब बांटे प्रमुखता से -
(१)
जब इन -"कुटुंब से निकारिहों " को धनसम्पत्ति बाल बच्चे पत्नी ,सब का
त्याग करना पड़ता था ,तो इनके वंश कैसे आगे बढ़ेंगे / कैसे डॉ आंबेडकर के
द्वारा वर्णित पांचवे वर्ण का निर्माण होगा ??
(२)
ईसाई संस्कृत विद्वानों ने बताया वर्ण - यानि चमड़ी का रंग / तो ये नहीं
बताया कि कौन सा रंग गोरा काला नीला पीला या सतरंगी ?? किस रंग का सवर्ण
समाज था ??
(३)
....पांचवा वर्ण - अवर्ण / ये भी नहीं बताया कि इसका क्या मतलब होता है -
बदरंग कि बिना रंग का ?? या discouloured , जो ईसाई mythology
में
वर्णित अनंतकाल तक स्लेवरी में रहने के लिए नूह द्वारा श्रापित Ham के
वंशज - जिसके पाप के कारण गॉड ने उसके वंशजों को "काला" रंग दे दिया ???

 अभी मैं कल .@Chandra Bhan pRASAD जी जैसे एक विद्वान दलित चिंतक की timeline
पर गया , तो उनके अनुसार मैकाले --" भारतीय इतिहास में शूद्रो और दलितों की
शिक्षा का सूत्रधार था "/
मैं उनको अल्पज्ञ और अविज्ञ तो नहीं कह सकता , हाँ अनभिज्ञ या धूर्त और खड़ड़यंत्रकारी
अवश्य कह सकता हूँ / क्योंकि जिन अंग्रेजों के प्रति आप इतने कृतज्ञ हैं ,
वे इतने ईमानदार अवश्य थे की जो डेटा उन्होंने एकत्रित किये तात्कालिक
भारतीय समाजिक और सांस्कृत व्यवस्थाके सन्दर्भ में , वे इंडियन ऑफिस
लाइब्रेरी लन्दन में अभी भी संरक्षित हैं /
..............................वही डेटा ये भी कहता है की -" -
" १८३० के आसपास मैकाले की शिक्षा पद्धति लागू होने के पहले- भारतीय
स्कूलों में अंग्रेज कलेक्टरों द्वारा इकट्ठे किये डेटा के अनुसार - शूद्र
छात्रों की संख्या ब्राम्हण छात्रों से चार गुना थी" /................
@Chandra Bhan
prasad जी आप अपने स्वार्थ हेतु या अज्ञानतावश इतिहास के एक समयकाल और एक
समयखण्ड और कुछ भारतोद्धार करने की चाह वाले अंग्रेज चरित्रों से ऊपर उठने
को इच्छुक नहीं हैं /
आप तो बाबा साहेब की कृपा से उच्च पदासीन हैं , और डिक्की के नाम पे सैकड़ो
करोणों के सरकारी अनुदानों को चाम्पे बैठे है , लेकिन अपनी अनभिज्ञता या
धूर्तता के कारण इस तरह के तमाम ऐतिहासिक। तथ्य अपने अनुयाईओयों तक नहीं
पंहुचा रहे हैं /
@Chandra
Bhan Prasad जी और इनके जैसे तमाम दलितचिन्तको से मेरा आग्रह सिर्फ इतना
ही है कि आप अपनी स्वार्थ की रोटी जरूर सेंके , लेकिन आप अपनी अज्ञानता,
अनभिज्ञता या धूर्तता के कारण , आने वाली दलित सन्ततियो को घृणा और
अनभिज्ञता की आग में न झुलसायें / सादर

  In 1891 Risley published a paper entitled The Study of Ethnology in India.[10] It was a contribution to what Thomas Trautmann, a historian who has studied Indian society, describes as "the racial
theory of Indian civilisation". Trautmann considers Risley, along with
the philologist Max Müller, to have been leading proponents of this idea which
... by century's end had become a settled fact, that the constitutive
event for Indian civilisation, the Big Bang through which it came into
being, was the clash between invading, fair-skinned, civilized
Sanskrit-speaking Aryans and dark-skinned, barbarous aborigines.






 https://ia700407.us.archive.org/.../BookReaderImages.php... https://ia700407.us.archive.org/.../BookReaderImages.php... किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट / हमारे ख़्याल से तो जनगणना जिला , तहसील और फिर मोहल्ले में यान एक गांव में कितने निवासी हैं , सब कि एक जगह लिस्टिंग होती है / ये तो अजीब गणना है /देखिये किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट / हमारे ख़्याल से तो जनगणना जिला , तहसील और फिर मोहल्ले में यान एक गांव में कितने निवासी हैं , सब कि एक जगह लिस्टिंग होती है / ये तो अजीब गणना है /देखिये किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट /
  1921 Census, for ‘low castes’, the term ‘depressed classes’ was used for the
first time, but no standard list of such classes was available for want of an adequate
definition. Population data were collected and published for each individual castes and
tribes separately at the state and district levels. In 1931 Census, these figures were
confined to exterior castes and primitive tribes, besides all other castes except those
whose number fell short of four per thousand of the total population; and for those
whose figures were considered unnecessary by the then local government. The 1941
Census data on population of tribes were presented on a somewhat modest scale since
their compilation was restricted due to World War II. It was also felt by the then Census
Commissioner, Mr. Yeatts, that in the then prevailing circumstances, the scope of
enquiries on castes and tribes could be dissociated from the Census. The group totals
for Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Anglo-Indians were, however, brought out
for all the states. Figures were also compiled at the district level for 62 Scheduled
Castes and 14 Scheduled Tribes, included in the Scheduled Castes Order, 1936, and
56 other castes and three non-specified tribes. The term ‘primitive’ tribe was given up
during this Census.....P Pdmnabhan Registrar General Of India Xi congres of statistic and anthropology.



भारत के ऊँची और नीची जातियों का आधार रिसले के १९०१ की जनगणना में प्रयुक्त "रूल ऑफ़ कास्ट"

उसी तरह पुर्तगालियों द्वारा ,, १६०० में जात के लिए के लिए Caste शब्द का प्रयोग किया गया / 1901 में जनगणनां Caste के आधार पर पहली बार करता है , और २००० से ज्यादा जातियां , "नेसल बेस इंडेक्स " और सोशल hiearchy , के आधार पर ./ उसने एक unfailing "लॉ ऑफ़ caste " बनाया और बताया कि "भारत में नाक की चौड़ाई किसी व्यक्ति के सामजिक हैसियत सामजिक स्टेटस के inversely proportionate होती है" / दूसरी मह्हत्वपूर्ण बात ये है कि सोशल hierarchy के क्रम जो उसने लिस्ट बनाई उसको अल्फबेटिकल क्रम में न रखकर सोशल hierarchy के आधार पर ऊपर से नीचे कि और लिस्टिंग किया / यहीं से उस ऊंची और निचली या अगड़ी और पिछड़ी जातियों के एक नए सिद्धांत की रचना होती है , जिसके आधार पर सरकारें आज भी काम कर रहीं है / हाल ही में जाटों को पिछड़ी जाति की लिस्ट में शामिल किया जाना सिर्फ इसी नजरिये से व्याख्यायित होता है /
जात कि जाति ???
.................................................................................................................................
माँगी नावं न केवट आना ,कहत तुम्हार मर्म मैं जाना ...............................................................................................................

निषाद कहत सुनइ रघुराई ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई

हमरे कुल की रीति दयानिधि,संत मिले त करब सेवकाई \

रीति छोड़ उनरीति न करिहौं ,मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/

नदी नावं के हमहि खेवैया, औ भवसागर के श्री रघुराई /

तुलसी दास यही वर मांगू , उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /

--जात पांत न्यारी, हमारी न तिहारी नाथ ,

कहबे को केवट , हरि निश्चय उपचारिये

तू तो उतारो भवसागर परमात्मा

औ मैं तो उतारूँ , घाट सुर सरि किनारे नाथ /

नाइ से न नाइ लेत , धोबी न धुलाई लेत

त तेरे से उतराई लेत, कुटुंब से निकारिहयों /

जैसे प्रभु दीनबंधु ,तुमको मैं उतारयो नाथ /

तेरे घाट जैहों नाट मोको भी उतारियों

उहवाँ न लागै प्रभु मेरी उतराई /

मैं न लेहूँ प्रभु तेरी उतराई/.......चुन्नू लाल मिश्रा केवट राम संवाद /



जात कि जाति ???
...एक जात शब्द को तुलसी दास ने बताया था ,,जिसमें केवट ने कहा कि
--रामचन्द्र जी आप और मैं एक ही जात के हैं ,,मैं नदी कि नावं खेता , और आप
भवसागर की नाव खेते हो , हमारी जात एक ही है ,जैसे नाउ नाउ से , और धोबी
धोबी से पारिश्रमिक नहीं लेता , तो वैसे एक केवट दूसरे केवट से कैसे
पारिश्रमिक ले सकता है / और लिया तो मुझे कुटुंब से बाहर कर दिया जाएगा
/यहाँ तक तो ठीक था /

लेकिन जब हमने जॉन मुइर ,मैक्समूलर ,और M A
शेरिंग पादरी , जैसे संस्कृतविज्ञों इंडोलॉजिस्ट से हम संस्कृत ग्रंथो को
संस्कृत - अंग्रेजी - अंग्रेजी , के क्रम में सीख कर, 1946 " शूद्र कौन थे "
, जैसे ग्रन्थ की रचना करते हैं , और उसकी उत्पत्ति वेदों में खोजने निकल
जाते हैं , तो हमारी मंशा पर भले ही सवाल न खड़े होते हों , लेकिन मेरे
तथ्यपरकता पर तो संदेह की सुई घूम ही जाएगी /

.......... आज न सही, कल सही ..........................................

 उसी तरह पुर्तगालियों द्वारा ,, १६०० में जात के लिए के लिए Caste शब्द का प्रयोग किया गया / 1901 में जनगणनां Caste के आधार पर पहली बार करता है ,
और २००० से ज्यादा
जातियां , "नेसल बेस इंडेक्स " और सोशल hiearchy , के आधार पर ./ उसने एक
unfailing "लॉ ऑफ़ caste " बनाया और बताया कि "भारत में नाक कि चौड़ाई उसके
सामजिक स्टेटस के inversely proportionate होती है / दूसरी मह्हत्वपूर्ण
बात ये है कि सोशल hierarchy के क्रम जो उसने लिस्ट बनाई उसको अल्फबेटिकल
क्रम में न रखकर सोशल hierarchy के आधार पर ऊपर से नीचे कि और लिस्टिंग
किया / यहीं से उस ऊंची और निचली या अगड़ी और पिछड़ी जातियों के एक नए
सिद्धांत की रचना होती है , जिसके आधार पर सरकारें आज भी काम कर रहीं है /
हाल ही में जाटों को पिछड़ी जाति की लिस्ट में शामिल किया जाना सिर्फ इसी
नजरिये से व्याख्यायित होता है /

 डॉ आंबेडकर खुद इस आधार को निराधार बताते हुए खंडन करते हैं , तो शायद एक ही
तथ्य स्पस्ट होता है , कि वे तात्कालिक समय के एंथ्रोपोलॉजी जैसे
विषयों में तो एक्सपर्ट थे ,लेकिन जब उन्होंने इतिहास की तरफ नजर उठाई तो ,
शायद कहीं फर्जी संस्कृत विदों के जाल में उलझ कर रह गये /

और जब हमारे देश के विद्वान जो कॉपी एंड पेस्ट के , आधार पर न जाने कितनी
पीएचडी ,लेते और देते रहते हैं , उन्होंने caste का अनुवाद जाति में करते
हैं , तो आधुनिक भारत की तस्वीर सामने आती है /

A L Basham जैसे लोग शायद इसी को जाति की तरलता और rigidity ऑफ़ caste सिस्टम के नाम से बुलाये //लेकिन ये तो किसका काम है , आपको बता ही दिया लेकिन OCD के मरीज तथाकथित
दलित चिंतक @.... इसको भी ब्राम्हण वाद के जिम्मे , ठोंक देते हैं /डॉआंबेडकर को ये छूट दी जा सकती है , की उनके पास सूचना के श्रोत सीमित थे ,
इसलिए जिस भी निष्कर्ष पर वे पहुंचे , अगर वे होते , तो शायद उसको
रेक्टिफी करते /


  अतिशूद्र Outcastes kutumb से निकारिहों
 इसीको ईसाई विद्वानों ने ..Outcasts का नाम दिया /, हिन्दू समाज में समाज को
नियंत्रित करने के लिए एक व्यवस्था थी - जो उन मान्यताप्राप्त परम्पराओं
का पालन नहीं करेगा उसको _"कुटुंब से निकारिहों " यानी जात-बाहर कर दिया
जाता था / यानि उनको भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करना पड़ता था / उनकी सारी व्यक्तिगत अधिकारों से वंचित कर कुटुंब और समाजबहिस्कृत कर दिया था /

इस बात का वर्णन डॉ बुचनन ने अपनी पुस्तक में १८०७ में भी किया है - कि
शूद्रों को अपने कुटुंब को संचालित करने के लिए ,उस समाज के बुजुर्ग आपसी
सलाह के उपरांत किसी को सजा भी दे सकते थे /
ये सामाजिक
व्यवस्था ईसाइयत फैलाने में सबसे बड़ी बाधा थी / इसबात का जिक्र संस्कृत
विद्वान मॅक्समुल्लर और पादरी M A शेरिंग दोनों ने लिखा है /
इस
लिए इस कुप्रथा का दानवीकरण करना ही पड़ेगा / और वही हुवा --इसी को
outcasts कहा डॉ आंबेडकर ने ,,और आगे चलकर वर्ण व्यवस्था में एक और अंग के
रूप में लिखा -"अवर्ण " /
अब बांटे प्रमुखता से -
(१)
जब इन -"कुटुंब से निकारिहों " को धनसम्पत्ति बाल बच्चे पत्नी ,सब का
त्याग करना पड़ता था ,तो इनके वंश कैसे आगे बढ़ेंगे / कैसे डॉ आंबेडकर के
द्वारा वर्णित पांचवे वर्ण का निर्माण होगा ??
(२)
ईसाई संस्कृत विद्वानों ने बताया वर्ण - यानि चमड़ी का रंग / तो ये नहीं
बताया कि कौन सा रंग गोरा काला नीला पीला या सतरंगी ?? किस रंग का सवर्ण
समाज था ??
(३)
....पांचवा वर्ण - अवर्ण / ये भी नहीं बताया कि इसका क्या मतलब होता है -
बदरंग कि बिना रंग का ?? या discouloured , जो ईसाई mythology
में
वर्णित अनंतकाल तक स्लेवरी में रहने के लिए नूह द्वारा श्रापित Ham के
वंशज - जिसके पाप के कारण गॉड ने उसके वंशजों को "काला" रंग दे दिया ???


 अभी मैं कल .@Chandra Bhan pRASAD जी जैसे एक विद्वान दलित चिंतक की timeline
पर गया , तो उनके अनुसार मैकाले --" भारतीय इतिहास में शूद्रो और दलितों की
शिक्षा का सूत्रधार था "/
मैं उनको अल्पज्ञ और अविज्ञ तो नहीं कह सकता , हाँ अनभिज्ञ या धूर्त और खड़ड़यंत्रकारी
अवश्य कह सकता हूँ / क्योंकि जिन अंग्रेजों के प्रति आप इतने कृतज्ञ हैं ,
वे इतने ईमानदार अवश्य थे की जो डेटा उन्होंने एकत्रित किये तात्कालिक
भारतीय समाजिक और सांस्कृत व्यवस्थाके सन्दर्भ में , वे इंडियन ऑफिस
लाइब्रेरी लन्दन में अभी भी संरक्षित हैं /
..............................वही डेटा ये भी कहता है की -" -
" १८३० के आसपास मैकाले की शिक्षा पद्धति लागू होने के पहले- भारतीय
स्कूलों में अंग्रेज कलेक्टरों द्वारा इकट्ठे किये डेटा के अनुसार - शूद्र
छात्रों की संख्या ब्राम्हण छात्रों से चार गुना थी" /................
@Chandra Bhan
prasad जी आप अपने स्वार्थ हेतु या अज्ञानतावश इतिहास के एक समयकाल और एक
समयखण्ड और कुछ भारतोद्धार करने की चाह वाले अंग्रेज चरित्रों से ऊपर उठने
को इच्छुक नहीं हैं /


 आप तो बाबा साहेब की कृपा से उच्च पदासीन हैं , और डिक्की के नाम पे सैकड़ो
करोणों के सरकारी अनुदानों को चाम्पे बैठे है , लेकिन अपनी अनभिज्ञता या
धूर्तता के कारण इस तरह के तमाम ऐतिहासिक। तथ्य अपने अनुयाईओयों तक नहीं
पंहुचा रहे हैं /
@Chandra
Bhan Prasad जी और इनके जैसे तमाम दलितचिन्तको से मेरा आग्रह सिर्फ इतना
ही है कि आप अपनी स्वार्थ की रोटी जरूर सेंके , लेकिन आप अपनी अज्ञानता,
अनभिज्ञता या धूर्तता के कारण , आने वाली दलित सन्ततियो को घृणा और
अनभिज्ञता की आग में न झुलसायें / सादर


 In 1891 Risley published a paper entitled The Study of Ethnology in India.[10] It was a contribution to what Thomas Trautmann, a historian who has studied Indian society, describes as "the racial
theory of Indian civilisation". Trautmann considers Risley, along with
the philologist Max Müller, to have been leading proponents of this idea which
... by century's end had become a settled fact, that the constitutive
event for Indian civilisation, the Big Bang through which it came into
being, was the clash between invading, fair-skinned, civilized
Sanskrit-speaking Aryans and dark-skinned, barbarous aborigines


 In 1891 Risley published a paper entitled The Study of Ethnology in India.[10] It was a contribution to what Thomas Trautmann, a historian who has studied Indian society, describes as "the racial
theory of Indian civilisation". Trautmann considers Risley, along with
the philologist Max Müller, to have been leading proponents of this idea which
... by century's end had become a settled fact, that the constitutive
event for Indian civilisation, the Big Bang through which it came into
being, was the clash between invading, fair-skinned, civilized
Sanskrit-speaking Aryans and dark-skinned, barbarous aborigines

  Its Census based on Caste . You can see list of bramhins takeb from gifferent places

 https://ia700407.us.archive.org/.../BookReaderImages.php... https://ia700407.us.archive.org/.../BookReaderImages.php... किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट / हमारे ख़्याल से तो जनगणना जिला , तहसील और फिर मोहल्ले में यान एक गांव में कितने निवासी हैं , सब कि एक जगह लिस्टिंग होती है / ये तो अजीब गणना है /देखिये किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट / हमारे ख़्याल से तो जनगणना जिला , तहसील और फिर मोहल्ले में यान एक गांव में कितने निवासी हैं , सब कि एक जगह लिस्टिंग होती है / ये तो अजीब गणना है /देखिये किस तरह जनगणना हुई है ...पहले जाति फिर व्यक्ति फिर डिस्ट्रिक्ट और फिर अन्थ्रोपोमेट्रिकल मेज़रमेंट /
 In 1921 Census, for ‘low castes’, the term ‘depressed classes’ was used for the
first time, but no standard list of such classes was available for want of an adequate
definition. Population data were collected and published for each individual castes and
tribes separately at the state and district levels. In 1931 Census, these figures were
confined to exterior castes and primitive tribes, besides all other castes except those
whose number fell short of four per thousand of the total population; and for those
whose figures were considered unnecessary by the then local government. The 1941
Census data on population of tribes were presented on a somewhat modest scale since
their compilation was restricted due to World War II. It was also felt by the then Census
Commissioner, Mr. Yeatts, that in the then prevailing circumstances, the scope of
enquiries on castes and tribes could be dissociated from the Census. The group totals
for Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Anglo-Indians were, however, brought out
for all the states. Figures were also compiled at the district level for 62 Scheduled
Castes and 14 Scheduled Tribes, included in the Scheduled Castes Order, 1936, and
56 other castes and three non-specified tribes. The term ‘primitive’ tribe was given up
during this Census.....P Pdmnabhan Registrar General Of India Xi congres of statistic and anthropology.






Saturday, 3 January 2015

सवर्ण अवर्ण और असवर्ण की खोज

वर्ण का अर्थ चमड़ी का रंग होता है , ये ईसाई संस्कृतज्ञों ने हमे पढ़ाया था / लेकिन आज एक नई जानकारी कि caste का अर्थ भी चमड़ी का रंग होता है , एक ईसाई संस्कृतज्ञ के मुह से सुनें /


1776 के अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटेन का अमेरिका में लूटी जा रही धनसम्पत्ति से हिस्सा मिलना बंद हो गया ।उसके बाद अमेरिका में बसने वाले ईसाई यूरोप के गोरे ईसाई थे । उनको अपने सफ़ेद रंग पर इतना घमंड था कि भारत के 1947 में आजादी के 13 साल बाद  1960 तक,  ‪#‎काले‬ और ‪#‎गोरों‬ को स्कूल और बसों में,  अलग अलग ग्रुप में रहने को बाध्य किया जाता था । जिसको हम अखबारों के जरिये #रंगभेद या Apartheid के नाम से जानते थे / इसका सबसे वीभत्स रूप डच और ब्रिटिश शासन मे अफ्रीका मे देखने को मिला /
जबकि भारत में चमड़े के रंग और रूप का कोई महत्व नहीं रहा कभी भी वरना ‪#‎अष्टवक्र‬ राजा ‪#‎जनक‬ के गुरु न हुए होते और ‪#‎वेद_व्यास‬ कुरु राज्य के गुरु न रहे होते ।भारत के  पूज्य  आदर्श  राम और  कृष्ण   #श्याम  वर्ण  के   ही   थे/ 
लेकिन जब यूरोप ने पूरे विश्व को गुलाम बना लिया तो चमड़े के रंग और वाह्य शारीरिक संरचना के आधार पर,  बाइबिल के थेओलॉजी के अनुसार दुनिया के लोगो को विभिन्न समूहों और नश्लों में बांटा , जिसका परिणाम भारत आज भी भुगत रहा है ।।।

र्जॉन मुइर जो एक ईसाई विद्वान था , जो 19 साल की उम्र में भारत आता है इंडियन सिविल सर्विसेज में , और जो इलाहाबाद  और फ़तेहपुर  में अंग्रेजी सरकार मे एक ऑफिसर  था ,वही  जॉन मुइर 29  साल की उम्र में मत्परीक्षा नामक एक पुस्तक लिखता है, और ईसाइयत को हिंदूइस्म से श्रेष्ठ साबित करता है / सरकारी नौकरी में रहते हुए वो संस्कृत का इतना बड़ा विद्वान बन जाता है कि " ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट्स " नामक एक किताब लिखता है , जिसका डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक "शूद्र कौन थे " , में बहुतायत रूप से उद्धृत किया है /
                   उसी पुस्तक के पार्ट -२ सी कुछ ओरिजिनल टेक्स्ट्स पेश करा रहा हूँ , अंग्रेजी में जिसको कहते है - " Right From Horses mouth "---
"ये नॉन आर्यन नश्ल के लोग अमेरिका के रेड इंडियन कि तरह कमजोर नश्ल के थे / दूसरी तरफ Arians ज्यादा organisesed enterprising और creative लोग थे, धरती पर अर्वाचीन जन्म लेने वाले ज्यादा सुदृढ़ पौधे और जानवरों कि तरह वे ज्यादा सुदृढ़ लोग / अंततः दो विपरीत राजनैतिक लोगों की तरह ही अलग दिखने वाले / तीन ऊपरी वर्गों को जिनको द्विज या आर्य के नाम से भी जाना जाता है , एक अलग विशेष क्लास के लोग / Arian इस तरह से एक सुपीरियर और विजेता नश्ल साबित हुई / इसको सिद्ध करने के लिए complexion को एक और सबूत के तौर पर जोड़ा जा सकता है / ( यही 3 तथाकथित वर्णो को सवर्ण मान लिया गया/ जाति के क्रम मे भी इन्हे ऊंची जाति के नाम से जाना जाता है आज / बाकियों को शूद्र मानकर उनको OBC SC और ST मे विभाजित कर दिया गया )

 संस्कृत में Caste को मूलतः रंग (कलर ) के नाम से जाना जाता है / इसलिए caste उनके रंग (चमड़ी के रंग ) से निर्धारित हुई / लेकिन ये सर्विदित हैं कि ब्राम्हणों का रंग शूद्र और चाण्डालों से ज्यादा फेयर था / इसी तरह क्षत्रियों और वैश्यों के भी इसी तरह फेयर complexion रहा होगा /
      इस तरह हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि कि एरियन -इंडियन मूलतः काले मूल निवासियों से भिन्न थे; और इस अनुमान को बल मिलता है कि वे किसी उत्तरी देश से आये थे /
अतः एरियन भारत के मूल निवासी नहीं थे बल्कि किसी दूसरे देश से उत्तर (भारत) में आये , और यही मत प्रोफेसर मैक्समूलर का भी है / "

 From- Original Sanskrit Texts Part Second P. 308-309 ; by John Muir 

जो संस्कृत विद्वान वर्ण और caste के भेद को भी नहीं समझ सकते /वो चमड़ी के रंग के आधार पर सवर्ण अवर्ण  और असवर्ण जैसे शब्दों से समाज को विभाजित करते है , उन्होंने किस संस्कृत ग्रन्थ को पढ़कर ये वाग्जाल फैलाया है ?? 

आप स्वयं देख सकते हैं कि रंगभेद के चश्मे से दुनिया को बांटने वाले और गुलाम बनाने वाले , 1500 से 1800 के बीच अमेरिका के 200 million मूल निवासी रेड इंडियन का क़त्ल करने वाले ईसाई विद्वान कितने शाश्त्रों का अध्यन कर इस निर्णय पर पहुंचे है ?
 आजकल ईसाइयत फैलाने के लिए एक नयी शाजिश ये ईसाई फिर रच रहे है - AFRO_DALIT प्रोजेक्ट के नाम से , जिसके भारत के न जाने कितने क्षद्म ईसाई , दलित के वेश मे इस कार्य को आगे बढ़ा र्हए हैं / इन्ही संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानो के गढे  हुए कुतर्कों के अनुवादों के अनुवादों के अनुवाद को  आधार बना कर जब डॉ आंबेडकर "शूद्र कौन थे " की  खोज में वेदों कि सैर पर निकल जाते हैं , तो उनकी मंशा पर उंगली उठे न उठे लेकिन उनके सूचना के श्रोतों की विश्वसनीयता पर प्रश्चिन्ह अवस्य लग जाएगा /
 जिस देश के भगवान राम कृष्ण और शंकर श्याम वर्ण के हों वहां डार्क complexion के आधार पर सिर्फ ईसाई संस्कृत विद ही बाँट सकते है।शंकर जी अर्जुन को एक किरात के वेश मे दर्शन देते हैं जब वह वनवास के समय आयुध की खोज मे जाते हैं / हमारे ऋषि मुनि यहाँ तक कि मनुस्मृति के रचनाकार जंगल मे tribal जीवन व्यतीत कर धर्मग्रंथों की रचना करते हैं ; अब यही tribal ईसाई बनाए जा रहे हैं , अंग्रेजों की कार्यपद्धति को अपनाकर / 
संस्कृत ग्रंथों में तो इसका कहीं जिक्र मिलता नहीं / ??

 अनुमानों पर आधारित बायस्ड उनपढ़ कुतर्की और कट्टर  ईसाई संसकृतविदो  को आधार बनाकर लिखा गया भारत का इतिहास हम ढो रहें हैं न जाने कितने वर्षों से।
  गलती उसकी नहीं थी जिसने इस कपोल कल्पना से भरी पुस्तक को #ओरिजिनल_संस्कृत_टेक्स्ट लिख के पेश किया।
गलती उनकी है जो इसको ओरिजिनल मान बैठे और उन  Bigot ईसाइयों  के फैलाये जाल में भहरा के गिर पड़े।

 जब गीता कहती है
 चातुस्वर्ण मया शृष्टि  गुण कर्म विभागसह : अर्थात गुण और कर्म के अनुसार जो मनुस्य जो कार्य करेगा उसी वर्ण मे उसको वर्गीकृत किया जाएगा / आज उसको एप्टिट्यूड टेस्ट के नाम से जाना जाता है , कि कौन सा बच्चा किस प्रॉफ़ेशन के लिए फिट है ? 
 देश का आज तक का सबसे विद्वान ब्रम्हाण और अर्थशास्त्री कौटिल्य उसको कहता है - शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलम शूद्रस्य कर्मम / वार्ता विद्या का एक अंग है : अंवीछकी त्रयी वार्ता दंडनीति इति विद्या / ये विद्या की कौटिल्य की परिभाषा है /
तो डॉ आंबेडकर और दलित साहित्य में शूद्रों को menial जॉब अलॉट करने का काम मुइर जैसे Bigot ईसाई की ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट से पढ़कर लिखा होगा।


आंबेडकर साहित्य में वर्णित सवर्ण अवर्ण और असवर्ण की खोज इन्ही ईसाई bigot विद्वानों की रंगभेद और रंग से जुड़े उनके पूर्वाग्रह से उपजे शब्द है / क्योंकि कुछ शब्द तो संस्कृत में हैं भी नहीं जैसे अवर्ण / सवर्ण और असवर्ण शब्द जरूर हैं लेकिन वो उन अर्थों में प्रयुक्त नहीं होते जिन अर्थों में इन संस्कृत विदों ने प्रयोग किया हैं , और जहाँ से डॉ आंबेडकर ने कॉपी पेस्ट किया है /
वर्ण और कास्ट को चमड़ी के रंग से परिभाषित करने वाले लोग बाइबल के Genesis मे नोह द्वारा Ham को दिये श्राप से उद्धृत है जिसको ईसाई थेओलोगीस्ट ऑर्गन ने तीसरी शताब्दी मे प्रतिपादित किया था /

Friday, 2 January 2015

भारतवर्ष में मॉडर्न Caste सिस्टम का कोई ऐतिहासिक इतिहास और लेखन 1857 के पहले नहीं मिलता , हाँ वर्ण व्यवस्था अवश्य थी /

भारतवर्ष में Caste सिस्टम का कोई ऐतिहासिक इतिहास और लेखन 1857 के पहले नहीं मिलता , हाँ वर्ण व्यवस्था अवश्य थी /
अंग्रेजों के शाशन काल में Caste सिस्टम एक आयातित सोच और फलसफा है / आज जो लोग भी आधुनिक लेखक है उनको Caste सिस्टम और वर्ण व्यवस्था में कोई अंतर हैं शायद उससे अवगत नहीं है /
भारतवर्ष कि प्राचीनतम और आज तक चलने वाली मूल भाषा संस्कृत है/ संस्कृत ग्रंथों में जाति शब्द का कोई उल्लेख नहीं है , लेकिन अमरकोश के अनुसार जाति शब्द का अर्थ कुछ वन औसधि और सामान्य जन्म भर है  / लेकिन क्या सामान्य जन्म से आधुनिक जाति व्यवस्था की व्याख्या संभव है ? अगड़ी पिछड़ी , ऊंची नीची जाति किस भारतीय ग्रंथ से उद्धृत है ? मनुस्मृति से ? जरा प्रमाण दिखाएँ / अगर आज आप कहीं किसी शिक्षा संस्थान मे दाखिला लेते है , या किसी नौकरी के लिए आवेदन देते हैं , तो आप से पूंछा जाता है - आपकी जाति क्या है ? आप लिखते है सामान्य जाति - ब्रामहन क्षत्रिय वैश्य / लेकिन भारतीय ग्रन्थों और परंपरा के अनुसार ये तो वर्ण हुवा करते थे / तो आज जाति कैसे हैं ? कोई व्यतिक्रम , कोई शाजिश , कोई छेडखानी नहीं दिखती आपको ?
                             तो जाति तो नहीं ,    हाँ जात का वर्णन अवश्य है , और १६ संस्कारों में जातकर्म भी एक कर्म कांड का हिस्सा है / जात शब्द का अर्थ उत्पाती पैदाइश कुल परिवार, क्षेत्रीय सम्बद्धता , और गोत्र आदि होता है , साथ ही साथ ये व्यवसाय या पेशे का भी द्योतक होता है , जिनकी शादी व्याह आपस मे हुआ करते थी , और आज भी प्रायः हो रही है / इसको अगर सही शब्दों मे व्याख्यायित किया जाय , तो पता चलेगा कि -"जात एक मैनुफेक्चुरिंग इकाई थी समाज की , जिसमे हर वर्ण के लोग शामिल हो सकते थे / उदाहरण स्वरूप: नूनिया यानि नमक निर्माता और विक्रेता / भारत मे अंग्रेजों ने सबसे पहले इस व्यवसाय पर कब्जा किया और इस व्यवसाय से जुड़े लोगो को बेरोजगार किया ; अब इस व्यवसाय मे कौन कौन लोग जुड़े थे ? 
देखें जरा :
(1)वत्स गोत्रीय चौहान क्षत्रिय
(2) औधिया (अवध के निवासी )
(3) मुसहर (पालकी ढोने वाले )
(4)बिन्द
(5) भुईहार
(6) लोध
( M A Sherring पेज 347)
आज मुसहर की क्या दशा है ; सर्व विदित है / और गांधी का नमक आंदोलन भी सर्व विदित है /
 जात एक परिवर्तन शील व्यवस्था थी /

कौटिल्य के अनुसार एक ही माँ  के चार पुत्रों में ब्राम्हण क्षत्रिय वैस्य या शूद्र किसी भी वर्ण में व्यक्ति शामिल हो सकता था , और जीवन यापन के लिए अपने स्वभाव के अनुकूल (स्वधर्मों)  व्यवसाय चुन सकता था /

लेकिन जब 1901 कि जनगणना में रिसले ने सोशल hierarchy को नशल शास्त्र यानि अन्थ्रोपोलोजी से जोड़कर के  2000 से ज्यादा ज्यातियों (Castes) और 40 से ज्यादा नश्लों को चिन्हित और सूचीबद्ध किया तो आप व्यवास चाहे जो चुन लें लेकिन जाति / caste आपका पीछा नहीं छोड़ेगा / ज्ञातव्य हो कि 1807 में फ्रांसिस बुचनन ने caste या ट्रेड के नाम पर मात्र 182 castes कि लिस्ट बनाई थी /

'वंडर देट  वाज  इंडिया ' के लेखक A L Basham के अनुसार -" Caste शब्द का उल्लेख होते ही हिन्दू समाज कि व्यवस्था अपने आप ही मस्तिस्क में तिरोहित होने लगती है /बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्रयों ने स्पस्ट रूप से लिखा है कि Caste सिस्टम यूरोपीय समाज का आवश्यक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण अंग था / लेकिन कालांतर ने लेखकों ने इस तथ्य को चालकीपूर्वक छिपा दिया इस तरह Caste सिस्टम मात्र भारतीय हिन्दू समाज का चरित्र बन गया / अब दो बातें :
(1) A L Basham के अनुसार सोलहवीं सदी में जब पुर्तगाली भारत में आये तो उन्होंने देखा कि भारतवासी कई समूहों में बनते हुए हैं जिनको उन्होंने Castas के नाम से सम्बोधित किया जिसका एकमात्र मतलब था ट्राइब कुल परिवार / लेकिन ये शब्द ऐसा हिट हुवा कि जैसे हिन्दू समाज के साथ चिपक गया / caste शब्द का प्रयोग वे वर्ण और कास्ट दोनों ही के लिए सामान भाव से करते थे / प्राचीन भारत में वर्ण का स्पस्ट उल्लेख मिलता है लेकिन caste का नहीं / यदि caste कि परिभाषा एक ऐसे मानव समूह का वर्णन करना है जो रहन सहन खान पान शादी व्याह तथा व्यवसाय कि दृस्टि से समान है तो इसका वर्णन प्राचीन भारतवर्ष में नहीं मिलता है / :

(२)  अब एक प्रश्न है कि यदि caste System भारत कि एक्सक्लूसिव व्यवस्था है तो पुर्तगाली और बाद में अन्य यूरोपियों को इस शब्द और सिस्टम  का ज्ञान कैसे हुवा था /हिन्दुओं और हिन्दू धर्म को ईसाइयत से नीचे साबित करके शाषित वर्ग का मनोबल गिराने का यूरोपीय और ईसाई लेखकों का ये अन्यायपूर्ण और बर्बर दृष्टिकोण था /
तथ्यात्मक तौर पर caste System यूरोपीय और रोमन सभ्यता का एक आवश्यक अंग था ,लेकिन उसको भारतीय समाज पर आरोपित करने का जो खड़यन्त्र रचा गया , आज वीभत्स रूप में आपके सामने खड़ा है / कुछ यूरोपीय लेखको को ही उद्धृत करना चाहूँगा इस लेख के प्रमाण में :
1907 में John Oman Campbell - ने caste System के नाम पर हिन्दुओं को नीचे दिखने कि आलोचना की / ये गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में सोशल साइंस के प्रोफेसर थे / उन्होंने अपनी पुस्तक -" Brahman Theism and Muslims of India " में लिखा -" जिस caste System को यूरोपियन आश्चर्य और गर्व के साथ आलोचना करते घूम रहे हैं कि यह अत्यंत बकवास और अस्वस्थ सामजिक परंपरा है ,जिसका विश्व में कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता , वे भूल जाते हैं कि वे जिस पक्षपात पूर्ण caste System की आलोचना वो कर रहे हैं ,वह भारत के बाहर भी पायी जाती है , और वो अति सभ्य समझे जाने वाले पश्चिमी देशों में institutionalized है / हमें अपने मस्तिस्क को साफ़ रखना पड़ेगा कि ये एक undeniable तथ्य है कि यूरोप में भी कुछ hereditary caste distinctions हैं , जो पूर्व में कानूनी रूप से मेन्टेन की जाती थी , और वे वहां आज भी विद्यमान हैं / हिन्दू caste System की विशेषता इसका वंशानुगत होना है / इस सन्दर्भ में हमें अपनी याददाश्त को जगाना काफी रोचक होगा कि एक जमाना ऐसा भी था कि यूरोप में वंश दर वंश लोगों को अपने पैतृक पेशे को अपनाने को बाध्य कर दिया जाता था और उनको अपना पेश बदलने का अवसर ही नहीं दिया जाता था /
इंग्लॅण्ड के पुराने कानून के अनुसार लोगों को कोयले कि खदानों में या Dry salting के पेशे में पीढ़ी दर पीढ़ी काम करना पड़ता था / इस कानून को George iii ने अठारवीं शताब्दी में ख़त्म किया यानि जो अंग्रेज हमारे साथ काम कर रहे है उनके पितरों कि आँखों के सामने की बात है / उससे भी ज्यादा वंशानुगत पेश करने कि बाध्यता रूस में थी जहाँ पिछली शताब्दी तक गुलाम खेती किया करते थे / यूरोप में वंशानुगत गुलामी का बहित लम्बा एयर घृणित इतिहास रहा है / इसका और गहरा अध्ययन करने पर पता चलता है कि एरोप में "Rigid और Tyrannical caste System " था जिसको चर्च और कानून दोनों से सुरक्षा प्राप्त थी /
(३) Edward Alsworth Ross ने यूरोप में प्रचलित रिजिड कासते सिस्टम को काफी विस्तार से वर्णित किया है जो कि उन्नीसवी शताब्दी के शुरुवात तक जारी थी /वे बताते हैं कि यूरोप में caste System रोमन साम्राज्य का एक हिस्सा था ,लेकिन यूरोप में उसका विस्तार रोमन सभ्यता के कारण नहीं बल्कि सामजिक ताकतों के आपसी टकराव के कारण हुवा था /
 (४) प्रूसिया में व्यक्ति की ही नहीं जमीन पर भी जाति का अधिकार था / ऊँची जाति के लोगों कि जमीन नीची जाति के लोग नहीं खरीद सकते थे / लेकिन इस व्यवस्था को 1807 में Emancipation of Edict के द्वारा ख़त्म किया गया /(५)
ओमान ने इंग्राम को क्वोट करते हुए लिखा कि -" रोमन साम्राज्य में वंशानुगत पेशा अपनाने की बाध्यता पूर्व भारत में प्रचलित व्यवस्था से भिन्न नहीं थी / शासक वर्ग के लोग शासन के अनिवार्य अंग थे , और उनको दूसरे समूह (Collegia ) की लड़कियों से शादी की इजाजत नहीं थी / उसी तरह मुनिसिपल्टी और सैनिकों को भी वंशानुगत पेश अपनाने की बाध्यता थी /(६)
Reference :
(1) AL Basham -Wonder that was India P.148
(2)AL Basham -Wonder that was India P.149
(3) John Campbell Oman : "Caste in India " in his book : Bramhan Theist and Muslims in India 1907 P.63-64
(4) Ross 1922 P.322
(5)Ross 1922 P.182
(6) Ingram P.75

Direct Evidence to prove correctness of my underwritten post from "Imperial Gazetteer of India 1885 " ,From Volume - 1 of the same "The Indian Empire : Descriptive" .Chapter-6 Ethnology and Caste . Page 311
The word 'Caste' which has has obtained such a wide currency in the literature of sociology, comes from the Portuguese adventurers who followed Vasco De Gama to the west coast of India .The word itself is derived from the Latin Castus and implies purity of breed .In his article on the caste in Hobson-Jobson , Sir Henery Yule quotes a decree of the sacred council of Goa, dated 1567, which recites how ' the Gentoos divide themselves into distinct races or castes (castas) og greater or lesser dignity , holding the Christian as of lower degree , and keep these so superstitiously that one of a higher caste can eat or drink with those of of a lower caste'.
(P.S. Superstition was defined by European Christian , as a culture or tradition , which does not fit in Biblical and European Social framework , where ever they interacted with the people of other culture )

अनुवाद :
'Caste' शब्द जो समाजशास्त्र के साहित्य में इतनी व्यापकता पा चुका है , वो पुर्तगाली साहसिक यात्रियों की देन है जो वास्को डे गामा के साथ भारत के पश्चिमी तट पर आये थे / ये लैटिन शब्द Castus से लिया गया है , जिसका तात्पर्य होता है ब्रीड (नश्ल) की शुद्धता / Hobson-Jobson में अपने caste के ऊपर लिखे लेख में Sir Henery Yule ने गोवा के पवित्र परिषद के सन १५६७ के एक निर्णय को उद्धृत करते हुए लिखा है ,'हिन्दू (Gentoos ) लोग अंधविस्वास पूर्वक अपने आपको ज्यादा और काम महत्व के हिसाब से अलग अलग नश्लों या caste में बांटते हैं , जिसमे वे क्रिस्चियन को सबसे निचला स्थान देते हैं , और इसको ऊंचीं और नीची caste के साथ अन्धविस्वासपूर्वक खाने और पीने से भी जोड़ते हैं /
(PS : यूरोप के ईसाई जब अपने देश से निकलकर दूसरे देशों के लोगों से मिले , तो उन देशों की प्रचलित रीत रिवाजों को , जो उनकी बाइबिल और यूरोपियन समाज के रीति रिवाजों के फ्रेमवर्क में फिट नहीं होती थी , अंधविस्वास के नाम से सम्बोधित किया )

Thursday, 1 January 2015

फ्रैंकोसिस बेर्नियर ने खोली caste क़ी सच्चाई - ये भारत को अंग्रेजी हुकूमत क़ी गिफ्ट है , न क़ी भारतीय संस्कृति का हिस्सा

आज का भारत  सामजिक रूप से इतनी Castes में बंटा हुवा है कि कोई भी व्यक्ति बता नहीं सकता कि संविधान में उन  Castes की कुल संख्या क्या है / हर  एक  Caste  सत्ता के शीर्ष पर उच्चासीन होने के लिए एक राजनैतिक हथियार भर बन के रहा गया है / और सरकारें हर साल कुछ खास  कास्ट को SC या OBC लिस्ट में शेडूल करके अपने कर्तव्यों कि इति समझ लेती है /  और इन  Castes के ठेकेदार इन टुकड़ों में बंटे लोगों को भावनात्मक उभार देके सत्ता के गलियारों में प्रवेश करते हैं , फिर वे  भी उन्ही में से एक भेड़िया बन के रह जाते हैं जो जनता के लिए घोषित जनकल्याण की योजनाओं के लिए आवंटित राशि में अपना हिस्सा लेकर, अपने ही लोगों का हांड  मांस चबाने में यकीन रखता है /
  भारत में जब  डॉ आंबेडकर ने "Annihilation ऑफ़  Castes " की योजना बनाई होगी तो उन्हें मालूम नहीं था की वे एक औपनिवेशिक शासन और bigot ईसाईयों के शाजिश का शिकार होने जा रहे है / आजाद भारत में Castism  को ब्राम्हणवाद ' मनुवाद , सवर्णवाद , और न जाने कितने गढ़े हुए शब्दों के  सर पर ठीकरा फोड़कर सत्ता हथियाने  का खेल जारी है / लेकिन जब आप हकीकत की तरफ नजर घुमाते हैं तो पाते हैं की सच्चाई तो कुछ और है / कुछ दलित चिंतक जो निरंतर न जाने कितने वर्षों से यही गरियाने वाली मोडस ोपरांडी अपनाये हुयें है , यदि उनसे इन कटु सच्चाई पर संवाद करना चाहो तो या तो आपको ब्लॉक  कर देंगे , या शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुहं छिपा लेंगे कि शायद ये आँधी उनको प्रभावित न करे /
नीचे पेश है औरंगजेब के समयकाल का एक तथ्य जो इस बात को खुले आम चुनौती दे रहा है कि Caste भारतीय समाज का अभिन्न अंग नहीं था इसे आपको गिफ्ट किया गया है --
फ्रैंकोसिस बेर्नियर जोकि एक फ़्रांसिसी फिजिशियन था जिसने अपने जीवन का 12 साल भारत में बिताया  था , 1656 - 1568 तक / पहले वो दारा शिकोह की सेवा में था , लेकिन औरंगजेब ने जब अपने सगे बड़े भाई दारा उसके ऊपर काफ़िर होने का इल्जाम लगते हुए उसका कत्ल  कर दिया  तो बेर्नियर औरंगजेब का फिजिशियन बन जाता है  / उसने एक पुस्तक लिखी - " Travels in the Mogul Empire " , जिसमे उसने काफी विस्तार से मुग़ल शासन और तात्कालिक समाज के बारे में लिखा है / उसी पुस्तक से उद्धृत है निम्नलिखित लेख, जिसमे वो हिन्दुओं (GENTILES ) के बारे में लिखा है -------------------------------------------------------------------------
"हिन्दू जिस गॉड में यकीन करते हैं उसको वो "अचर", अर्थात जो अचल है , के नाम से जानते है / उसने इनको ४ पुस्तकें भेजी हैं जिसको ये वेद (BETHS ) के नाम से पुकारते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है विज्ञानं (साइंस ) , क्योंकि इनके अनुसार इन पुस्तकों में समस्त विज्ञानं भरा पड़ा है / इन पुस्तको में पहली पुस्तक का नाम अथर्वेद (Atherbabeth ) है , दूसरी का नाम है यजुर्वेद (Zagerbeth ) ,तीसरी का नाम ऋग्वेद (rekbed ) और चौथी का नाम सामवेद है / इन पुस्तकों में लिखा है कि लोगों को चार श्रेणियों (Devision ) में रखा जाय / पहली ट्राइब ब्राह्मण , जो कि ज्ञान को परिभासित करने वाले ( इंटरप्रेटर ऑफ़ लॉ ) , दूसरा क्षत्रिय (Quetterys ) या योद्धा ट्राइब , तीसरी ट्राइब वैश्य (Beuscue ) की है जो मर्चेंट्स या ट्रेड्समैन हैं और चौथी ट्राइब सूद्र (Seydra ) कि है जोकि अर्टिसन और labourers हैं / ये अलग अलग ट्राइब वाले एक दूसरे ट्राइब्स में शादी ब्याह नहीं कर सकते , अर्थात ब्राम्हण क्षत्रियों से शादी नहीं कर सकता / और यही बात हर ट्राइब के लिए लागू होता है / "
इसको फ्रेंच से अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले लेखक का इंटरप्रिटेशन --" अचर कि जो परिभाषा बेर्नियर ने दी है वो इस बात का प्रमाण है कि उसने इस विषय में गहरा अन्वेषण किया है, इसका अर्थ ही होता है अनंत (Iternal ) , या जो जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त हो चुका हो / बेर्नियर को पर्शियन भाषा का अच्छा ज्ञान था इसलिए उसने ट्रांसलिटरेशन के नियमों का अच्छी तरह से पालन किया है /
हिन्दू समाज के वर्गीकरण से ये स्पस्ट है कि जिस पंडित ने उसको संस्कृत या हिंदी में बताया होगा, उसको उसने पहले पर्शियन में फिर फ्रेंच में लिखा होगा / बेर्नियर ने जो ट्राइब शब्द का प्रयोग किया है ,वो Caste शब्द से ज्यादा साइंटिफिक है जिसको एल्फिंस्टोन भी लिखना पसंद करता है / Caste जोकि Portuguese शब्द Casta से लिया गया है जिसको Creed Race या kind के नाम से भी जाना जाता है / आधुनिक समय में ये चार devision ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र के नाम से जाना जाता है /" --
From "Travels in the Mogul Empire"
AD 1658-1668
by Francosis Bernier
Second Edition Revised by Vincent A smith MA
Author of "The Early Histiry of India "
Oxford University Press 1916 Page 325